कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी-
बताई ॥ देखव देवी देवत बानी ॥ वात न कछु उन कहिवत जानी ॥
समै-नारायन वैदा भया, रोगी नवा संसार ।
राम २ करि पचि सुआ, कीन्ह न अपन विचार ॥
रमैनी ७०-घर सब सोवे कोउ न जागा । रैन चोर घर सूसन लागा ॥ पंडित माते पढे पुराना । ज्ञानी माते कथ २ ज्ञाना ॥ जोगी माते कान फराई । संन्यासी माते जटा बंधाई ॥ जंगम माते घंट बजाया । सेवडा माते दया बताया ॥ अघोर माते मल सुत खाई । भगत माते तिलक लगाई ॥ बैरागी माते सब कछु नासी । जिंदा माते भये उदासी ॥ कामिन माती करी सिंगार । पुरुष माते पठ राम ककहार ॥
समै--मठ अकाश बैठत हैं जोगी, चोरवा मूसे भंडार । वह चोरवाको कोई न चीन्हे, चोरवा ठाढ हुवार ॥ चोरवाको हम चीन्हा, चोरवा हमे न चीन्ह । कहें कवीर वह चोर अपरबल, सबकी वसुधा लीन्ह ॥
रमैनी ७१--चेतन रहे न चोरवा पावे । अचेत पिंड को सदा सतावे ॥ चोरवा एक जुगतते मूसे । चेतन रहे अचेतन विनसे ॥ चोरवाकी बात न जाने कोई । चोर बिडारे सब घर खोई ॥ हम चोरवाको जाननहारे । हम चोरवाते रहें निनारे ॥ जो चोरवाका जाने भेवा । आपुहि करता आपुहि देवा ॥
समै--अछै पुरुषका बीज यह, वृच्छ न जाने कोय । ताते चोरवा मूस अब, कछु ओ कहे न होय ॥ आगे हमारे साथ था, अब भा जिवका काल । कह कवीर यह चोरवा चीन्हो, मिटे जीव जंजाल ॥