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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

शब्दावली

(५६९)

लोकालोक अकाश नहिं, झूठे लोका लोक । कहैं कवीर आस जिन बांधो, छांडो जीका सोक ॥

रमैनी ९३-सुन पंडित तैं बचन हमारा । करता सबका सिर- जन हारा ॥ कंथ भामिनी कंथ सनेहा । पिताको रूप पिताको देहा ॥ माताको रुधिर पिताको नीरू । दो संयोग मिल धरो शरीरू ॥ पांच तत्त्व गुन तिनके संग। अष्टधात के जिव रंग रंगा ॥ माटी ते उपज अबहुं किन होई । कारण कौन पुरुष संग जोई ॥ मनसा शब्दका होय अकारा । तजो कंथ भामिनि व्योहारा ॥

समै-ब्रह्म कुलाल हर जग मट्टी, रुधिर करे सिंगार ।

मानसिक रचना जग रचा, पंडित कहो विचार ॥

प्रथम उत्पत्त मानसी, फिर भय पुरुष औ जोय ।

कहे कवीर सृष्टिक सबकी, विरला बूझे कोय ॥

तेहि नारी घर मबके, चार बरण जग कीन ।

तेरह ते तेरह भई खानी, वेद साख अस दीन ॥

रमैनी ९४-कर्म बस ब्रह्मा पिंड संवारा । करम बस विस्तू पाले संसारा ॥ कर्म बस रुद्र करे संहारा । कर्म बस विष्णु लेंय औतारा ॥ कर्म बस चंद्र सूर्य भरमाना । कर्म बस नारद भोग अस्थाना ॥ कर्म बस रावण औ गये कंसा । कर्म बस रुधर भये निरवंसा ॥ कर्म बस मरा सकल संसारा । करता करम करम बिस्तारा ॥

समै-करता ते कर्म निहकर्म ते कर्ता, झूठा कर्म सनेह ।

कहैं कवीर जैसा पड़ा मेला, तैसा जगत करेह ॥

रमैनी ९५-ब्रह्म पाडी सबकी बांटा । सबे लगे अस औघट घाटा ॥ पांच देवका थापना कीन्हा । चारों वेद मंत्र लिख दीन्हा ॥ देव पांचकी कीन्हा सेवा । तैतिस कोट और किय देवा ॥ तिनहुं

(५७०)

कबीरपंथी—

कीन्ह सेवा बहु भाई । अगम अगोचर रहा समाई ॥ कोई ब्रह्म रहा लौ लाई । कोई सुन्यमें रहा समाई ॥ कोई बैठ आसन मारी । कोई ध्यान धर लाया तारी ॥ कोई सक्ति ठहरावत माया । कोई सूरज ते ध्यान लगाया ॥ और जो तैंतीसो कौरी । सब जग सेवा करे कर जोरी ॥

समै-बिब अक्षर माया जन भाषो, ताते रचो सतंत । चार वेद षट् दससन, बुध बल नित निचंत ॥ अंथ रचा गुण कर्म लगाया, नरक सरग विस्तार । कहैं कवीर करता नहिं चीन्हो, ये उरले व्योहार ॥

रमैनी ९६-गनपत विष्णु महेश्वर देवा । सूर्य भवानी तिनकी सेवा ॥ कर स्नान पवित्र होय आया । चौका करि आसन विछाया ॥ चंदन गार तिलक कियो छापा । देव नहवाय करन लग जापा ॥ चंदन घस नैवेद चढ़ाई । पुष्प सुगंध अर्पन कियो भाई ॥ अगम अगोचर ध्यान लगाया । कर आवाहन सर्गते बोलाया ॥ दो कर जोरके विनती कराई । कीन सुमरण जन दीन पठाई ॥

समै-देव न देखा सेवको, सेवक देव न दीख । कहैं कवीर मरे ते देखो, यही गुरु दइ सीख ॥ तेरी गति तैं जाने देवा, हममें सामरथ नाहिं । कहैं कवीर यह भूल सबनकी, सब पर संशय माहिं ॥

रमैनी ९७-ज्ञान गूदरी गुरु विछाई । हरी आसन पर बैठे आई ॥ तिलक छाप कंठी औ माला । बैठे आप धर रूप गोपाला ॥ मूढ़ मुड़ाय मुडियनमें आया । भगत कहाय महंत कहाया ॥ मूढ़ मुड़ाय गुरु होय खेला । नर नारी सब कीन्हे चेला ॥ मूढ़ मुड़ाय महंत कहाया । प्रन उपान उपदेश कराया ॥ चोला पहरा सेल्ही डारी । टोपी देके पाग उतारी ॥

शब्दावली

(५७१)

समै-जेई पान पनवारिया, तेई तम्बोली हाट । तेई पान गुरुवा दीन्हा, लायसि औघट घाट ॥ औघट घाटी नर गया, गुरुवाके उपदेश । कहै कवीर कोउ नाही लावे, उनका बहुर संदेश ॥

रमैनी ९८-षट् दर्शन मिल देखे संदेशा । कोइ न रूप करताके भेसा ॥ हता अकेलकी हता वहि नारी । अकाश हताकी हता संसारी ॥ गृहस्थ हताकी हता वैरागी । गुनवंत हताकी हता गुन त्यागी ॥ सुखी हताकी हता दुखि भाई । देह धरेका विदेह कहाई ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर देवा । संयोग वियोग कहो यह भेवा ॥

समै-निरगुन पुरुष निरंतर देवा, निराकार है सेव । यहि बानमें वह नाही, बिरला बूझे भेव ॥ पांच तत्त्व गुन तीन धरि, सब गुन धरे शरीर । प्रत्यक्ष जगतमें देत दिखावा, कहहि पुकार कवीर ॥

रमैनी ९९-जप तप पूजा मंत्र बताया । सुन्य मण्डलमें मन ठहराया ॥ पूजा करत करत गये हारी । जोग जुगति ले आसन मारी ॥ संध्या तर्पण आरति गावें । देव न रीझे देव मनावें ॥ जो धंधा नित मन बस भाई । स्वप्ने सूझे धंधा आई ॥ जेहि धंधामें जीव लगाया । अंतकाल तेहि धंध समाया ॥

समै-जप तप दीखा थोथरा, तीरथ बरत बिस्वास । सुवना सेम्हर सेइके, उड़ फिर चला निरास ॥ सुवना सेम्हर सेइके, बैठा पलासे जाय । चौंच टकोरे सिर धुने, वो उसही का भाय ॥

रमैनी १००-पांच तत्त्व नहीं त्रिगुन देवा । चंद्र न सूर वेद न भेवा ॥ पाप न पुण्य पुरुष न जोई । अस्थान भंग जोहै कर्ता न

(५७२)

कबीरपंथी—

कोई ॥ तेहि घर कर्ताको ठहराया । जो नाहीं कछु तासों लौ लाया ॥ अगम अगोचर सिरजन हारा । रूप न रेखा वार न पारा ॥

समै-सुमरन सुरतिकी गम नहीं, बहुत विकट वह पंथ ।

सुरति निरति तहवाँ नहि पहुँचे, अस कथि भाषत ग्रंथ ॥

रमैनी १०१-षट् दरशन सुनो बात हमारी । छिनमें पुरुष वह छिनमें नारी ॥ छिनमें तरुन छिनमें बाला । छिनहि दयाल छिनहि होय काला ॥ छिन सुच्छम छिन होय अस्थूला । यह गुण देख जगत सब भूला ॥ चंचल चपलकी खबर न पाई । यह वह रूप ठग जग आई । यहीके छंद भूला सब कोई ॥ गति नहि पाई पुरुष औ जोई ।

समै-मनहरवा नगरवा, घट घट रहा समोई ।

यह तो काम नाही करताकै, बिरला बूझे कोई ॥

जो बूझे सो थीर है, बिन बूझे भरमाय ।

कह कवीर एक बूझे बिन, चले रंक औ राय ॥

रमैनी १०२-जगत पुजेरी बिस्तु सो देवा । सब कोइ करे बिस्तुकी सेवा ॥ प्रथम बिरंच सेव चितलाई । फेर रुद्र ध्यान लगाई ॥ सनक सनंदन नारद सेसा । सुखदेव नारद व्यास गनेसा ॥ दन्त्रात्रय जनक विदेही । पारासर आदिक विस्तु सनेही ॥ इनहि देख सब जग भरमाना । करता आपन नाही जाना ॥

समै-षट् दरशन तहवाँ चले, जहाँ न ससि औ भान ।

प्रेमधाम वैकुंठ बिस्तु को, कथत ज्ञान विज्ञान ॥

चलते चलते धाम गा, वहाँ ते फिरा निरास ।

कहे कवीर बिस्तु ना मिला, सेवा करत निरास ॥

रमैनी १०३-सेवा करत गये जुग चारी । सेवा करत गये नरनारी ॥ सेवा करत गये तिर देवा । सेवा कीन्ह लखा नहि

शब्दावली

(५७३)

भेवा ॥ सेवा करत गये औतारा । सेवा करत गये संसारा ॥ षट् दृशन सेवा चितलाई । सेवा का कछु भेद न पाई ॥ सेवा पूजा रहा लौलाई । सेवा लेके सुन्न समाई ॥

समै-स्वामी ते दृशन नाहीं, सेवक सेवा लाग ।

कहे कवीर पृथिवि यह मरगई, हरि ही के बैराग ॥

जीवत मिलना नहिं होय ज्ञानी, मरे न होय सनेह ।

कहे कवीर मिले हरि भाई, जो ना होय बिदेह ॥

रमैनी १०४-छूँछा भरा भरा ढरकाना । आपहि में जग आप हिराना ॥ सात सरग पर सुन्य एक पोरी । तहां बसे छतिसो कोरी ॥ सुन्य नगर जहँ बसे न कोई । बसन चले तहँ पुरुष औ जोई ॥ ऊजर बसि भई वस्ति उजारी । वस्ती छोड चले नरनारी ॥ सुर औ नर मुनि बसे सब कोई । उजर बसेकी खबर न होई ॥ सुन्यकी धुन सुन जगत समाना । क्या पंडित क्या चतुर सयाना ॥

समै-जहां न वस्ती सो बसा, बस्ती भई उजार ।

सुर नर मुनि सब गये विगूचे, कहें कवीर पुकार ॥

सहर बसंता छोडके, उजर बसाया गांव ।

ना वह बस ना ऊजरा, भया बसेका नांव ॥

रमैनी १०५-सुतके घर माता पटरानी । तुम किन बूझो पंडित ज्ञानी ॥ बिन पुरुष उन तिरगुण जाये । होय जोइ तीनों सुत खाये ॥ यह संसार जीते औ हारे । इन पापिन सब जगहिं संहारे ॥ तिरगुन गये जात नहिं जाने । राजा रंक सब गये सयाने ॥ जोगी जपी तपी संन्यासी । सुंडित चुंडित बैराग उदासी ॥ सुन्य नगरकी राखे आसा । रंकार धुन कीन विनासा ॥

समै-अगनी पानी खाइया, अंतर पटको पाय ।

यों जगको माताने खाया, जियरा गया हेराय ॥

(५७४)

कवीरपंथी-

अगिन बुझानी बुझ गई, दूध बिनासा घीव ।

कहैं कवीर इन आस ने, ऐसा बिनासा जीव ॥

रमैनी १०६-पुरुष आदिकी नारी माया । तिन नारी पुरुष दोय जाया ॥ एक बसा जहां बसे न कोई । एक दुनियामें सब कहुं होई ॥ और तीन गुण जन्मे भाई । उन फिर चार बरन उपजाई ॥ उन फिर जंत्र मंत्र किया पूजा । जोत निरंजन और न दूजा ॥ उन फिर नाटक चेटक कीन्हा । निरगुन मंत्र पाठ लिख दीन्हा ॥ उन फिर जप औ तप अनुसारा । नेम धर्म तीरथ व्रत न्यारा ॥ सब संसार परा इन माहीं । करता पुरुष लखो है नाहीं ॥

समै-कहा हमार न माने कोई, उनको कहो परवान ।

ये जिव चल धोखे मिला, मिट गया जीव निदान ॥

रमैनी १०७-हम करता हम सबके सही । चार युग हम सत्ते कही ॥ कोई न माने कहा हमारा । मैं जगते कहि कहि हारा ॥ जो कछु माया दिया उपदेसा । सोई उपनिषद दिया संदेसा ॥ जो कछु वेद पाठ लिखवाया । सब जीवन तासो लौ लाया ॥ एक होय तो कहि समझाऊं । सकल रिषि ते कहा कराऊं ॥ जो नाहीं तासो लौ लाया । जौ है ताको सबै मिटाया ॥

समै-जहां पवन नहि संचरे, रवि ससि उदय न होय ।

कहैं कवीर जहां हरि नहीं, तहां जात सब कोय ॥

रमैनी १०८-नगर एक बसैं दोय नारी । सब जीवन डहका-वनहारी ॥ इनते हारे तपी मुनि देवा । इनका कोई लखा न भेवा ॥ इन लीना जीवनको खाई । इनको जीते बिरला भाई ॥ गण गंधर्व मुनि बचा न कोई । इनको जाने ज्ञानी सोई ॥

समै-बीच ते आई दोय नारी, बीचे कीन अकाज ।

कहैं कवीर दोनों जग लूटा, यह करताको साज ॥

शब्दावली

(५७५)

जहां बसें ये दोनों नारी, तहां नहीं विश्राम । कहें कवीर इनको संग छाड़ो, यही तुम्हारो काम ॥

रमैनी १०९-षट् दर्शन सुनो चितलाई । करताके गुण चेतो भाई ॥ दयावंत शीतल मुख बैना । धर्मसरूप सदा सुख चैना ॥ निहकर्मो निरद्वंद सुधर्मा । सदा संतोषी कर्म सुकर्मो ॥ सब जीवनकी करे नित चिंता । मतबादी धीरज अतिवंता ॥ सदा अनंद धीरज दुख संसा । कोमल बचन सरब गुण हंसा ॥ चेतन सदा सरब कछु सूझे । परगट गुपुत सब ज्ञाने बूझे ॥

समै-अनखाया खानीको पीवे, देखे सुने हजर । नख सिखते पूर्ण बना, तासो कहत जग दूर ॥ सब गुन भरा सृष्टिका करता, निरगुन कहो नकोय । कहें कवीर प्रगट जग भीतर, भर्मत पुरुष औ जोय ॥

रमैनी ११०-षट् दर्शन सुनो बचन हमारा । उनके गुन हैं अगम अपारा ॥ मिथ्या बचन संसा विपरीता । खज अखजसे बहुत प्रतीता ॥ निर्दया अमती अकर्मो । सदा अधीरज सदा अधर्मा ॥ कामवंत तामसकी खानी । नाटक चेटक अगमठानी ॥ सदा निलज्ज दयामें हीना । छल औ छिद्र महा प्रवीना ॥ चञ्चल चपल निरमती माया । अधिक गिरामनी सब जग खाया ॥

समै-सुर नर मुनि पशु पंछी मारत, डार आपने जाल । कहें कवीर यह महा अपर्वल, विरले बांचे विचार ॥

रमैनी १११-करता सबका सिरजनहारा । जान बूझके होते न्यारा ॥ जलगी सदा जलहिमें रहते । उडरान सदा जल मध्य दिखते ॥ जलगीरी पकड़ जाल जब आये । जब जलगीरी यहै सब चितलाये ॥ हम जानीकी साथ हमारे । अब हम जाना हते ।

(५७६)

कवीरपंथी-

निनारे ॥ ज्यों कंवला जल परसत नाहीं । त्यों साधू रहते जग माहीं ॥

समै-जग बांधा जंजीर कर्मके, छूटा नाहीं कोई । कहैं कवीर बंधा नहीं, साध जानिये सोई ॥

रमैनी ११२-गुरुवा सिधु राम कहाई । इन संसार ठगा सब भाई ॥ बैठ एकंत पाखंड बताया । निरगुन सरगुन दोय भेद बताया ॥ निरालम्ब आलम्ब न सांगा । कहैं जलाते हम बितरागा ॥ अंतर भरम मिटे नहीं भाई । निसदिन रहो निरंकार समाई ॥ सब जग मिलके सीस नवावे । तब गुरुवा एक बचन सुनावे ॥ यहि जगते हरि रहा निनारा । विरला कोई बूझन हारा ॥ ब्रह्मा विस्तु महेश्वर देवा । तिनहु लखा नहीं यह भेवा ॥ ऐसा बचन कह जग भरमाया । यहि गुरुवाका भेद न पाया ॥

समै-रामनगर गुरुवा बसा, माया नगर संसार । कहैं कवीर यहि दो नगरते, विरले बचे विचार ॥ पाप पुन्य गुरु कर्म हरि, वैकुंठ लोक निजधाम । ये तो सब ऊपर परे, बूझो आतमराम ॥

रमैनी ११३-जात पांत तज मूँड़ मुँडाया । तिलक छाप दे भगत कहाया ॥ मूँड़ मुँडाय गुरु होय खेला । नर नारी सब कीन्ही चेला ॥ भये महंत सिखापन कीन्हा । निरगुण मंत्र पाठ लिख दीन्हा ॥ सेवा पूजा बहुत बताई । तन मन धन लीन्हो अरपाई ॥ करताको अकरता बतलाया । अकरता सो करता लौ लाया ॥

समै-करता ते यहि भयो अकरता, गुरुवाके उपदेश । कविरा कोइ लावे नहीं, करता केर संदेस ॥

रमैनी ११४-जो ब्रह्माको दियो संदेशा । सो विरंच गुरु दियो उपदेशा ॥ धाती चौका मंत्र असनाना । फूलसुं भूषण देव रचाना ॥

शब्दावली

(५७७)

काष्ट पषाण धात ले आये । तिनकी प्रतिमा आप बनाये ॥ गुरु होय फिर चेला होई । पूजे प्रतिमा पुरुष औ जोई ॥ धातू पूजे धात होय भाई । पषाण पूजे पषाण होय भाई ॥ जलके पूजे जल होय जाई । अगिनो पूजे अगिन समाई ॥

समै-रमता रामे छोड़के, जो पूजे पाषाण ।

तिन करता नहि चीन्हिया, अंत पषाण समान ॥

जैसा गुरु सिखापना, सिक्ख चला सोह चाल ।

कविरा इन सब खोइया, वे सब भये निहाल ॥

रमैनी ११५-कहो पंडित जो आहि अकरता । तो कैसे भयो जगतका करता ॥ कर नाहीं कैसे जग कीन्हा । रसना नहीं कैसे रस लीन्हा ॥ पांव नहीं कैसे कहि जाई । उदर नहीं कैसे कुछ खाई ॥ सरवन नहीं कैसेक सुनाई । हिया नहीं कैसेक गुनाई ॥ नैन नहीं देखत कैसाही । जीव नहीं कस जीवत गोंसाई ॥

समै-जाके पंडित प्रान है, जग कीन्हो बिस्तार ।

जो रूप धरे करता अहै, ताको कीन निनार ॥

जो करता तेहि नहि सेवे, यह लोगोंकी बूझ ।

कह कवीर आरसी अंदर, परा अंधेरे सूझ ॥

रमैनी ११६ हता आप दूजा परमाना । देख आपको आप बुलाना ॥ उझका सिंह कूपमें जाई । कांच मंदिलमें स्वान घहराई ॥ फटिक सिलामें जग अरुझाना । प्रतिबिंब देख आप भरमाना ॥ हता आप दूजा ठहराया । आप तजि दूसर लौ लाया ॥ यह तन जीव अकारथ खोया । यह नर चरित्र देखके रोया ॥

समै-समाधि लाय सब जग बैठा, चला संग ले प्रान ।

कविरा तब भ्रम ऊपजा, देखा और निसान ॥

कवीरपंथी शब्दावली १९

(५७८)

कवीरपंथी-

रमैनी ११७-संग बूझो तुम आपन योगी । संग बूझे बिन भयल बियोगी ॥ संग बूझे बिन चढो ले प्राना । घर आपनमें देखु निदाना ॥ पांचवों ले चढे अकाशा । कहु जोगी क्या होय तमासा ॥ सुखमन घाट उतर जब जाई । ब्रह्मंड प्राण ले रहा ठहराई ॥ कछु एक दिन तुम वहाँ खराने । आपन मठी ले आप उड़ाने ॥ दूठी डोर चले पंच प्राना । दूँदत दूँदत आप हिराना ॥

समै-बूझो जोगी आपको, बूझब सो यह देश ।

कह कवीर न जाय न ऐवै, बहुर न मिल संदेस ॥

बहुत गये सो कोइ न आया, कासो पूछो बात ।

कहे कवीर बिना हरि परचे, सकल सृष्टि बही जात ॥

रमैनी ११८-समझो योगी आपन भेसा । छोड़ नगर यह चले केहि देसा ॥ पूरक कुंभक रेचक पौना । सोहं साथ चले कर गौना ॥ दस नारी तज सुखमन घाटा । सहस्रदल पंकज बैठ निराटा ॥ अनहद सुन प्रतीत जिय आई । रंकार धुन दीन सुनाई ॥ आप देख दूजा कर माना । चक्र बेध त्रिभुवनको जाना ॥

समै-खलबल पड जोगी नगर, छोड़ चला जब गांव ।

तेतिस आप रहे न्यारे, सुन्न पडा सब ठाँव ॥

रमैनी ११९-पंच सुद्राका आसन कीन्हा । जोग जुगत करि निरगुन चीन्हा ॥ त्रिवेनी घाट उतर जब गयऊ । प्रतिबिम्बका दर्शन भयऊ ॥ बाजा बाजे अनहद बानी । कुंडलनी सकती तहां पटरानी ॥ धरनि अकासते लागी डोरी । चला दिसंतर होर बहोरी ॥ पंच चार तज बैठ निराटा । योगी उतरा अजपा घाटा ॥ सोहं तजि मन धर निरबाना । सुन्य नगरजी आय तुलाना ॥

समै-खालि देखके भर्म भय, दूंद फिरा चहुँ देस ।

दूंदत दूंदत मर गया, मिला न निरगुण भेस ॥

शब्दावली

(५७९)

बूझ आपको थिर रहे, योगी अमर सो होय । आप बूझे भरम तजे, आपइ और न कोय ॥

रमैनी १२०—पैतापुरकी लुंवठ रानी। तिन ब्रह्माते कही कहानी ॥ अनहद अपजा जोग अभ्यासी। सुन्न नगर आसन चौरासी ॥ पंच वायुमें जग अरुझाना। षट चक साधि कीन पयाना ॥ तीनसौ साठ स्वास ठहराई। कुंडलनी सकती साध ले जाई ॥ प्राणायाम धारना साथी। जोग जुगति तेहि करे समाधी ॥ दस अंगा दस करे जो भंगा। पंच चार नौ सोरह संगा ॥ छ पर संग दोय पर भाई। आठ बहतर बावन आई। दो हजार सत्रहसौ साता। चार चार चारकी बाता ॥ एक्रीस हजार छै सौ तेहि डोरी। चले दिसंतर होर बहोरी ॥ बारहे नासुक सोरहे सेसा। चार ब्रह्म नाभ नौ परदेसा ॥ आठ अकाश परम तहँ पाई। ग्यारह भक्ति तेरहे ठहराई ॥ एक सौ बीस साठको योगा। तैतिस कोटि डेढसौ भोगा ॥ समाध लायके चला हरि तीरा। जुगत नेत्र त्रिवेनी तीरा ॥

समै-जोग करे ते मर गये, दसो दिसा भइ सुन्न। कहें कवीर जुगति चीन्हले, जो छूटे वह धुन्न ॥ घट फूटा निकसा कुंभते, ढरक गया सब नीर। घट राखे जल घट रहे, कहहिं पुकार कवीर ॥

रमैनी १२१—यह घट रत रतनकी खानी। घटमें आप आप घट ठानी ॥ घट बिन जल कहो कहाँ रहाई। बिन घट जल नहीं है भाई ॥ घटमें जल जल घटते न्यारा। घट बूझे घट बूझनहारा ॥ घट फूटे जल जाय हेराई। जब लग घट तब लग जल भाई ॥ घटको खोजो पंडित ज्ञानी। बिन घट जाने रहे न निसानी ॥ घट खोजे घट माहिं समाई। बिन घट खोजे जल बह जाई ॥ चेतन

(५८०)

कवीरपंथी-

करो घट जाय न फूटी । सुरतकी डोर जाय न टूटी ॥ गुन टूटे औ घट बह जैहै । औघट गये घाट न पैहै ॥

समै-सहस्र घाट जल भर रखो, फूटे सहस्सर घाट । घट फूटा तो फूट भय, भया न नर तल पाट ॥ घट बाहर घट अंदर, घट है जीवन मूर । घटमें जल पूर रहे, औघटमें जल दूर ॥

रमैनी १२२-जुग २ जोगी जुगत कराई । जुगत लखे विन जम ले जाई ॥ जोगी सोई जुगत सो माने । जुगत जान अलख पहिचाने ॥ उवाव अनंत जाने भाई । तेहि जोगीको काल न खाई ॥ सोहं हंसा हमही भाई । सोहं मिले सोई हम पाई ॥ नगरी अपनी सुवस बसावे । प्रजा लोग दुख नहीं पावे ॥ प्रजाके बस होवे ना राऊ । राजा दुख न देवे काऊ ॥ सो जोगी सो जुगत सयाना । आप जान दूजा नहि जाना ॥

समै-जेहि पारस ते पारस भये, पारस जानो सोय । पारस कनक लोहा भया, सो पारस ना होय ॥ वह पारस तुम खोजो, जेहि पारस सब खान । कहैं कवीर सुन पंडिता, पारस ले पहिचान ॥

रमैनी १२३-काया नगर सो नगर हमारा । घर अपना हम कीन्ह संसारा ॥ घरही में है देव औ देवी । घरहीमें है भेव औ भेवी ॥ पाप पुन्य घरहीमें रहते । घरहीमें रैयत औ महते ॥ घरहीमें वृच्छ बीज अंकुरा । घरहीमें चंदा औ सूरा ॥ तीन लोक घरहीमें छाया । घरते बाहर किनहु न पाया ॥

समै-जो घर जावे आपना, करता पड़े तेहि सूझ । कहैं कवीर सुन पंडिता, घर अपनेको बूझ ॥

शब्दावली

(५८१)

गुह कहते जस ब्राह्मण चले, ग्रह पड़ा नहिँ चीन्ह ।

यहां वहांकी दोउ गंवाई, जीव अकारथ दीन्ह ॥

रमैनी १२४—सब संसार समाधि लगाई । निराकार लो कोइ न जाई ॥ रहिगो पंथ थकित भौ पौना । दशो दिशा उजार भौ गौना ॥ बस्ती छोड जेहो नर कहवों । जेहो तो नहि छेहो जहवों ॥ खेहोका वहां अन्न न पानी । बोलिहो कासो वहां नहि बानी ॥ सुख नहि भोग दिवस नहि राती । पांच तत्त्व निरगुन बैदाती ॥ जीव न सीव कर्म न काया । पाप न पुन्य वृच्छ न छाया ॥

समै-चेतो किन तुम चेतो अबहुँ, जहाँ नहीं वहाँ गाँव ।

कहे कवीर अबहीं मिल करते, अब न मिटावो नाम ॥

रमैनी १२५—ब्रह्मा कुलाल गढे संसारा । तिनमा जीव दिये करतारा ॥ जीव देके लिखे बनाई । सोई भोगता भुगते भाई ॥ परालबध संचित कर्माना । अक्षर तीन लिखे भगवाना ॥ चाहे सुता चाहे करबारी । श्रीरामकी बातें न्यारी ॥ चहता सोई कीन्हा करता । चहिये सो दूरम सो हरता ॥

समै-मातु न होती पिता न होता, होता रुधिर औ नीर ।

कहैं ते आवत पंडित, ऐसा अनूप शरीर ॥

तत्त्व भये संयोग दोउ, निहतत नाही कोय ।

कह कवीर सो फल उपजे, तत्त्व अधिक जो होय ॥

रमैनी १२६—सुन्य न हता सुन्य सब कीन्हा । जीव न हता जीव सिव दीन्हा ॥ पाँचों तत्त्व हता न कोई । दिवस न रजनी पुरुष न जोई । निरगुन पुरुष हता निरंकारा । तिन सिरजा यह सब संसारा ॥ निराकार निरगुन कस देवा । कैसे सुन्य कहो किन भेवा ॥ लौटके कथा कहें ब्रह्म ज्ञानी । निरालम्ब निरगुनकी बानी ॥ निराकार आकार न कोई । निरगुनते गुनना होई ॥ सुन्य हते

(५८२)

कवीरूपंथो-

नहिं देखन हारा । यह विध रचा सकल संसारा ॥ जो बीजामें लखा सरीरा । वो था साहेब सुनो कवीरा ॥

समै-जो अकार गुण कर्म धरे है, सो निराकार नहिं होय ।

फल फूल पत्र औ साखा, बिरला देखे कोय ॥

यही सरूप करताको, ज्ञानी अंते नाहिं ।

कहैं कवीर परो जन संशय, गगन मंडल कछु नाहिं ॥

रमैनी १२७-पवन सरूपी अगम अपारा । सब घट पूरन सबते न्यारा ॥ पुहुषकी वास दियाकी जोती । पवन सरूप पिरे तन होती ॥ शब्दके रूपमें हरदिकी लाली । विस्तुका रूप ज्ञान गुणचाली ॥ काशीकी धुन करो बिनाना । निराकार निरगुन तिन जाना ॥ सोहं हंसा जाने सोई । सोहं हंसा सोइ जिव होई ॥

समै-बिना पुहुष नहिं वास है, बिना बीज नहिं कोय ।

बिना तन सोहं शब्द नहीं, बिरला बूझे कोय ॥

जीव ब्रह्म परब्रह्म नहीं, सुंदर धरे सरूप ।

कहैं कवीर जाव घट एके, ऐसा ख्याल अनूप ॥

रमैनी १२८-ज्ञानी आपन करो विचारा । जो तुम मानो कहा हमारा ॥ चार शरीरको छोड़ो ज्ञानी । करताका कछु करो बीनानी ॥ सूच्छम अस्थूल न कारन महा कारन । चार अवस्था नाहिं निहारन ॥ गुण औ कर्मकी करो न संसा । तुम करता निह केवल हंसा ॥ देव आद तुम कहो ब्रह्मज्ञानी । करता पुरुषकी साज समानी ॥ बूझ विचार गहो अस्थाना । निरगुन पुरुषका करो न ध्याना ॥

समै-निवृत्त परवृत्ति दोय मारग, तेहि अटका संसार ।

कहैं कवीर दोनों नहीं, समझो बूझ विचार ॥

रमैनी १२९-चार फल कौन कहां तुम देवा । अवस्था चार कहां तुम भेवा ॥ कौन बूच्छ जेहि यह फल लाग। जेहि कारन

शब्दावली

(५८३)

तुम भये अनुरागा॥ अरथ धर्म काम मोच्छ भाई। जाग्रित स्वप्न श्रुपोपत ताई॥ अच्छे वृच्छ एक पुरुष अपारा। तहां यह फल है चार निनारा॥ मारग कठिन न कोई जावे। गगन चढे सोई फल खावे॥

समै-केहि कारण करनी करे, कहाँ वृच्छ फल चार।

सबे पड़े भ्रम जालमें, कहैं कवीर पुकार॥

रमैनी १३०-दिनके रैन विषै जब सोई। भूले आप भूले सब कोई॥ नाना विधिके उठे तरंगा। अदभुत ख्याल दिखे बहुरंगा॥ इन बातनकी खबर न जानी। पार ब्रह्म कैसे पहिचानी॥ कैसे खबर वहांकी पावे। अपने घटकी लखे न लखावे॥ औघट घाटी अगम अपारा। सो पावे जो उतरे पारा॥

समै-मन जिवका संजोग तन, मनके अद्भुत रूप।

जाग्रित स्वप्न भरमावे, लीला रचो अनूप॥

जाग्रित जाग्रत सांच है, सोवत सपना सांच।

कहैं कवीर मन ना बसे, जहां तत्त्व नहीं पांच॥

मन यह जागत है नहीं, यह मन यही शरीर।

रैयत होय तिनमें रहे, कहैं पुकार कवीर॥

रमैनी १३१-यह है गगन जापर बहु रंगा। नाना विधि को उठे तरंगा॥ चौरासी कहो कौन विधि भाई। कौन अस्थान जीव ठहराई॥ पांच तत्त्व कहो किन भेवा। भेला बांधे निनारे देवा॥ त्रिगुनकी उत्पत्ति कहो सोई। निराकार कस करता होई॥ दोमें को जग सिरजनहारा। नांदे बिदे क्या ब्योपारा॥ सहस्रका कहो का अर्थ बूझ। निराकार निरगुन कैसे सूझ॥ ऐसा ख्याल अनूप हमारा। जो बूझे सो सिरजनहारा॥

समै-सबरा आतम आप हमारा, इनमें नाहिं विसेख।

हम जाने सो यह गुन बूझे, पावे पुरुष अलेख॥

(५८४)

कवीरपंथी—

जिन जाना यहि भेदको, रहे सोई ठहराय । कहँ कवीर सो रहे निनारे, लिया जिन्हे जम खाय ॥

रमैनी १३२—राम कहा यह कहे जो कोई । जो करता सो यहु होई ॥ करता रहा जो सबै समाई । वोकर राम रहा बिलमाई ॥ पंच तत्त्व करताको बासा । यह विध राम न होय बिनासा ॥ बीजमें बृच्छ रहे ठहराई । त्यों यह बूझ एक है भाई ॥ सो कत होय यह कहे जो कोई । जल पाषाण अगिनको होई ॥ सुरत मरे तो यह मर जाई । दोहरा नौतम कैसे पाई ॥ संजोगी जो सृष्टि उपाई । अद्वुत तन जिव कहँसे आई ॥ राम न करता करता काहा । यह करता तो बूझन माहा ॥ दे शब्द उत्पन सुस्थाना । दोऊकी बूझ एक घर जाना ॥ बूझ दोऊकी सुन्न समानी । तत्त्व अधिक इच्छा कित मानी ॥ जो यह करता सृष्टिको होई । प्रगट गुप्त कहे सब कोई ॥

समै—यह करता बिन बूझ हेराना, ताते भया अकास । तत्त्व न मिला मत समुझा, लीन्हा तहाँ निवास ॥ जो गुन पावे तत्त्वको, तत्त्वे जाय समाय । कहँ कवीर अमर तब होवे, कहीं न आवे जाय ॥ तन जियरा यह तेरा, कबहुँ नास न होय । कहँ कवीर सुरति मिले, यह गुण बूझे सोय ॥

रमैनी १३३—परकाया प्रवेस कराया । बाल बृद्ध तन दिख- लाया ॥ एक रूपमें धरे अनंता । पर दिलकी पहेचाने चिंता ॥ पूरवमें परिचय दिखलाई । पृथ्वीते अकास सिधाई ॥ धरन ते बाढी जाय अकासा । लीला अनूप रचे बहु पासा ॥ ऊँ बीज मैघ दिखलावे । धरती बूडे पवन चलावे ॥ चाहे जो ले आवे सोई । चाहे पुरुष चाहे होय जोई ॥ दसो दिसाकी बातें करई ।

शब्दावली

(५८५)

चाहे करे जोई चित धरई ॥ जो कोइ मांगे सोई देई । जहाँ ते जो चाहे सो लेई ॥

समै-अस्थान न जाने जीवका, भगति परी नहीं चीन्ह। यही विडम्बना भरमके, जीव अकारथ दीन्ह ॥ स्वारथ इनमें कोइ नहीं, ताते रामहि जान। कहँ कवीर यह भगती बूझले, बहुर न रहे बंधान ॥

रमैनी १३४-जैसे खर औ तैसे गार्ई। जैसे नारी तैसे माई ॥ जैसे सोना तैसे लोहा। जैसे मोहा तैसे निरमोहा ॥ जैसे क्रूर तैसे हस्ती। जैसे ऊसर तैसे बस्ती ॥ जैसे पंडित तैसे चंडाला। जैसे करता तैसे काला ॥ जैसे मुत्र है तैसे पानी। जैसे चेरी तैसे रानी ॥ जैसे पाथर तैसे मोती। जैसे आंधर तैसे जोती ॥ जैसी नदी औ तैसे नारा। जैसे हलाल तैसे सुरदारा ॥ जैसे मीठा तैसे विष होई। जैसे अन्न तैसे मल सोई ॥ जैसे फल है तैसे माटी। जैसे सक्कर तैसे चांटी ॥ जैसे सिंह तैसे बकरी होई। जैसे गुरू तैसे सिख सोई ॥ जैसे असुर तैसे देवा। जैसा फल है तैसे देवा ॥ जैसे बास तैसे कुवासा। जैसे बरहा तैसे धरन अकाशा ॥

समै-एके भया एक कहाया, एके रहा समाय।

कहैं कवीर नहीं करता पाया, जियरा दिया गँवाय ॥

रमैनी १३५-गुन कर्म बिहुना राम न सोई। यह गुन जाने विरला कोई ॥ काया इच्छक दया सरूपा। मन उपमान स्वेत नहीं धूपा ॥ समै पाय बिन तत्त्व न देई। पर चोरी कर बस्तु न लेई ॥ सत् कहे औ धरमहि जाने। पर निंदा नहीं जीमें आने ॥ पांचो पवन एक घर लावे। नौ दस बारह तीन मिटावे ॥ तीन राखके तीनों मारे। पचीस पांच षट सात उचारे ॥ सुखमनमें जब बास कराई। प्रगट गुप्त सब अजमत पाई ॥

(५८६)

कवीरपंथी-

समै-अजमत कछु हांसी नहीं, अजमत कर्म अधीन। करामात करम चीन्हें, सो ज्ञानी परबीन॥ करना हता सो कर चुका, सब दिखलावे सोय। कहैं कवीर करता नहि जाना, अजमत करे क्या कोय

रमैनी १३६-अजोध्या नगर बसे एक राई। तिनके राम औतरे आई॥ जनक सुताते कीन विवाहा। कैकई बचन गये बन माहा॥ कनक पुरीका रावन दूता। सो बनमें हर लैगा सीता॥ कनक मिरगा राम भुलाने। रोवत बन बन फिरे सयाने॥ पंपानगर सुग्रीव सहाई। कनकपुरी हनुमान चढाई॥ जीते राम रावणा हारा। त्रिभुवननाथके यह व्योहारा॥

समै-करता पुरुष राम ते परे, क्यों भुले अम जाल। कहैं कवीर पूछों तोहि पंडित, काजी जीतो हाल॥

रमैनी १३७-सीताराम सुमरत सब कोई। सीताराम बिन मुक्ति न होई॥ सीतारामकी गति नहि पाई। सीताराम रहा जग छाई॥ धरती छोड़के बसे अकासा। यह गुन देखो राम तमासा॥ सीताराम रचे संसारा। कंठी माला तिलक लिलारा॥ कनकपुरीका रावन राई। सीता जीता करी लड़ाई॥

समै-आस पास घन तुलसी बिरवा, तेहि बिच सालिग्राम। हते देव पाथर भये, यह करताके काम॥

रमैनी १३८-रामचंद्रके यह व्योहारा। पिता पुत्र तिनहु रन डारा॥ बालमीक घर सिया बियानी। लव कुश भये भरत सिय पानी॥ लछमन बूझे सियासे माई। डार हडावर फिरे रघु-गई॥ रामचंद्र कारण कर रोया। दुखी भये दिन रैन न सोया॥

समै-नित बूडे नित ऊछरे, शोभा कहो निहार। आप बुढे मँझधारमें, उतरत सब संसार॥ सब जग डूबा राम नाम कहि, रामके बिन पहिचान। जो तू चाहे अमर भया, तो तैं रामहि जान॥

शब्दावली

(५८७)

रमैनी १३९-रामनाम चढ बुड़ा कवीरा । एको हंस लगा नहिं तीरा ॥ रामनाम सुमरण चित दीन्हा । रामरूप काहु नहिं चीन्हा ॥ एक रामनाम दसरथ गृह आया । सो जगते आकास सिधाया ॥ एक राम घरा घर कीन्हा । एक राम सो ना पर चीन्हा ॥ एक राम नित पीवे खावे । जगको देखे जगै दिखावे ॥

समै-इनमें राम जो सांचा, तेहि राम ले चीन्ह ।

रामनौमी भया राम कवीरा, जिसका यह तन कीन्ह ॥

रमैनी १४०- रामनौमी भया राम कवीरा । घर घर बाजे झांझ मजीरा ॥ सबके पिता पुत्र भैं आई । अजोध्या नगर करे ठकुराई ॥ उत्पत्त प्रलय जिनकी न होई । उत्पत्त प्रलय आये सोई ॥ उपजे न बिनसे आवे न जाई । अजोध्या नगर करे ठकुराई ॥ अन्न न खाय पीवे नहिं पानी । आराकार घर उतरे आनी ॥ आरति मंगल पढे पुराना । जो जन्मा सो किनहु न जाना ॥

समै-निराकार आकार भय, नाम धराया राम । राम कह कह जग गई, काहु मिला ना राम ॥ राम भगति जिन जानी, रामे चीन्हे सोय । कहैं कवीर वह भगत भय, आवा गवन न होय ॥

रमैनी १४१-मथुरा नगर सो बसे कन्हाई । गोपी ग्वाल जुरे सब आई ॥ कंसे मार जमी पर डारा । उग्रसेनको राज बैठारा ॥ करताके यह काम न होई । जो जिव मारे दूजा सोई ॥ काहुकी अङ्गिया काहुका चीरा । ऐसे काम न करे कवीरा ॥

समै-ये तो काम नहीं करताके, यह सब मनके काम ।

कह कवीर मनही जे मारा, जीते आतमराम ॥

रमैनी १४२-राम मंदिल वृन्दावन कीन्हा । दूधको दान गोपिन सो लीन्हा ॥ कहीं तरुण बालक होय जाई । कहीं वृद्ध होय देत दिखाई ॥ पलना झूलें मदन गोपाल । दूत कंसको हने

(५८८)

कवीरपंथी—

होय काला ॥ तीनों लोक मुखमें दिखलाया । तबहीं जसोदा बहुत डराया ॥ लीला अनंत रचे यदुराई । इन्हें देख सब रहे भुलाई ॥

समै-रास मंडलकर सब जग लूटा, मथुरा नगर मँझार ।

कहैं कवीर यह बंदा बनके, बिरले बचे विचार ॥

रमैनी १४३-नगर द्वारिका रुकमिनि रानी । तिनके कंथ श्रीकृष्ण ज्ञानी ॥ तिन भर्माया सब संसारा । काशी नगरमें खलबल पारा ॥ राजा नगर कापर बैठाया । आय राज होय अदल कराया ॥ काशी नगरमें बाजे ढंढोरा । साहूका घर मूसे चोरा ॥ चहुँ दिशि फिर गई कृष्ण दोहाई । राजा रंक रुजू होय जाई ॥ सबका जियरा भरम उरझाना । करता आप न किनहु जाना ॥

समै-रैयतते राजा भया, भया साहुते चोर । राजाको वजीर गहि मारा, जोर ते भया विजोर ॥ काग हंसकी पीठपर, नित होवे असवार । भौजल सागर उतरके, भया जग खेवनहार ॥

रमैनी १४४-मथुरा नगर तेहि रास रचाय । रहसमंडलमें सब कोइ आय ॥ पचीस गोपी संग पांच गुवाला । मुकुट धरे तहैं नाचे गोपाला ॥ गावत संग सखा सब आई । सब जग देखके गया भुलाई ॥ नाचे मोर कीर्त तहैं गावे । मंजारी मृदंग बजावे ॥ बैल झालरी भैंसा मंजीरा । रोज करे तहैं जै जै कवीरा ॥ लावा थेइ २ तहाँ मचाई । मृग मसाल दिखावे भाई ॥ ससा एक तीकले आय । सकल सभाके मस्तक लाय ॥ अहिरी पांच दही ले आई । ताके पीछे फिरें कन्हाई ॥ कौतुक देख रास सुख पाया । सिंह को मच्छा गहि लाया ॥

समै-जो जन्मा दस बार प्रभु, सो मनका औतार ।

कहैं कवीर बूझो तुम पंडित, श्रीकृष्ण ब्योहार ॥

रमैनी १४५-मुन पंडित एक बचन हमारा । मूस भया बिलार