भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(५८५)

चाहे करे जोई चित धरई ॥ जो कोइ मांगे सोई देई । जहाँ ते जो चाहे सो लेई ॥

समै-अस्थान न जाने जीवका, भगति परी नहीं चीन्ह। यही विडम्बना भरमके, जीव अकारथ दीन्ह ॥ स्वारथ इनमें कोइ नहीं, ताते रामहि जान। कहँ कवीर यह भगती बूझले, बहुर न रहे बंधान ॥

रमैनी १३४-जैसे खर औ तैसे गार्ई। जैसे नारी तैसे माई ॥ जैसे सोना तैसे लोहा। जैसे मोहा तैसे निरमोहा ॥ जैसे क्रूर तैसे हस्ती। जैसे ऊसर तैसे बस्ती ॥ जैसे पंडित तैसे चंडाला। जैसे करता तैसे काला ॥ जैसे मुत्र है तैसे पानी। जैसे चेरी तैसे रानी ॥ जैसे पाथर तैसे मोती। जैसे आंधर तैसे जोती ॥ जैसी नदी औ तैसे नारा। जैसे हलाल तैसे सुरदारा ॥ जैसे मीठा तैसे विष होई। जैसे अन्न तैसे मल सोई ॥ जैसे फल है तैसे माटी। जैसे सक्कर तैसे चांटी ॥ जैसे सिंह तैसे बकरी होई। जैसे गुरू तैसे सिख सोई ॥ जैसे असुर तैसे देवा। जैसा फल है तैसे देवा ॥ जैसे बास तैसे कुवासा। जैसे बरहा तैसे धरन अकाशा ॥

समै-एके भया एक कहाया, एके रहा समाय।

कहैं कवीर नहीं करता पाया, जियरा दिया गँवाय ॥

रमैनी १३५-गुन कर्म बिहुना राम न सोई। यह गुन जाने विरला कोई ॥ काया इच्छक दया सरूपा। मन उपमान स्वेत नहीं धूपा ॥ समै पाय बिन तत्त्व न देई। पर चोरी कर बस्तु न लेई ॥ सत् कहे औ धरमहि जाने। पर निंदा नहीं जीमें आने ॥ पांचो पवन एक घर लावे। नौ दस बारह तीन मिटावे ॥ तीन राखके तीनों मारे। पचीस पांच षट सात उचारे ॥ सुखमनमें जब बास कराई। प्रगट गुप्त सब अजमत पाई ॥