कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
होय काला ॥ तीनों लोक मुखमें दिखलाया । तबहीं जसोदा बहुत डराया ॥ लीला अनंत रचे यदुराई । इन्हें देख सब रहे भुलाई ॥
समै-रास मंडलकर सब जग लूटा, मथुरा नगर मँझार ।
कहैं कवीर यह बंदा बनके, बिरले बचे विचार ॥
रमैनी १४३-नगर द्वारिका रुकमिनि रानी । तिनके कंथ श्रीकृष्ण ज्ञानी ॥ तिन भर्माया सब संसारा । काशी नगरमें खलबल पारा ॥ राजा नगर कापर बैठाया । आय राज होय अदल कराया ॥ काशी नगरमें बाजे ढंढोरा । साहूका घर मूसे चोरा ॥ चहुँ दिशि फिर गई कृष्ण दोहाई । राजा रंक रुजू होय जाई ॥ सबका जियरा भरम उरझाना । करता आप न किनहु जाना ॥
समै-रैयतते राजा भया, भया साहुते चोर । राजाको वजीर गहि मारा, जोर ते भया विजोर ॥ काग हंसकी पीठपर, नित होवे असवार । भौजल सागर उतरके, भया जग खेवनहार ॥
रमैनी १४४-मथुरा नगर तेहि रास रचाय । रहसमंडलमें सब कोइ आय ॥ पचीस गोपी संग पांच गुवाला । मुकुट धरे तहैं नाचे गोपाला ॥ गावत संग सखा सब आई । सब जग देखके गया भुलाई ॥ नाचे मोर कीर्त तहैं गावे । मंजारी मृदंग बजावे ॥ बैल झालरी भैंसा मंजीरा । रोज करे तहैं जै जै कवीरा ॥ लावा थेइ २ तहाँ मचाई । मृग मसाल दिखावे भाई ॥ ससा एक तीकले आय । सकल सभाके मस्तक लाय ॥ अहिरी पांच दही ले आई । ताके पीछे फिरें कन्हाई ॥ कौतुक देख रास सुख पाया । सिंह को मच्छा गहि लाया ॥
समै-जो जन्मा दस बार प्रभु, सो मनका औतार ।
कहैं कवीर बूझो तुम पंडित, श्रीकृष्ण ब्योहार ॥
रमैनी १४५-मुन पंडित एक बचन हमारा । मूस भया बिलार