भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शम्बावली

(५८९)

असवारा ॥ ताके संग बहु चले बराती । पांत पांत सब भांतिन भांती ॥ बाज तीतर संग चला कर जोरी । सिंह गऊ संग मुख नहि मोरी ॥ बाघ संग छेरी चलि भाई । ससा स्वान संग केले कराई ॥ केचवा सर्प संग कियो व्योहारा । लोहक नाव पषाण को भारा ॥

समै-जो न हता सो ब्रह्मै कहा, जीव भया तहैं लीन ।

कह कवीर जिन ब्रह्मै जाना, भए ज्ञानी परवीन ॥

रमैनी १४६-यह अचरज तुम देखो आई । सिंह सियारते करे सगाई ॥ हंस कागते करे सनेहा । देह धरे सो होय बिदेहा ॥ मछरी बैल ते भा व्योहारा । कुकट मोर मिलि जै जै कारा ॥ गिरगिटसे करे सनेह बसंता । सरप नेवरा रचे अनंता ॥ चीता हरिन संग केले मचाई । ससा स्वान मिल बैठे भाई ॥ बगुला बाजते रहस रचाया । राजहिं वजीर पकड़ ले आया ॥

समै-धरती बेल पताल भय, फल लागे आकास ।

कह कवीर चात्रिक चारो जुग, जलमें मरा पियास ॥

रमैनी १४७-निराकारकी करे नित सेवा । करता का कछु लखे न भेवा ॥ चाहिये दाख बोवे लसोरा । चहिये अंगुर सींचे नीम सहोरा ॥ आम चहिये जग बबुर लगाई । रंभ श्रवैके चाहे मिठाई ॥ करील सींचिके चहे सुपारी । बिना पुरुष सुत जन्मे नारी ॥ नरियर चहिये तुंबरा लाई । बेंत लायके कटहर खाई ॥ चहत करोंदा नाय मकोई । बेंत लाय फल चाहैं सोई ॥ अरंड लाये सदा फल खाई । इंद्रवन लायके केरे खाई ॥ ताड़ लायके चहे छोहारा । यह देखो जगके व्योहारा ॥

समै-बेल कुटुंगी फल बुरा, फुलवा कुबुध गंधाइ । और बिनासी तूंबरी, सो पातो करवाइ ॥ उगरह धरती छोड़के, ऊसर बोधे सोय । कहैं कवीर वृच्छ है नहीं, कैसेके फल होय ॥