कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
रमैनी १४८—मूसा बिलार संग चहे कुसलाई । त्रिन अगिन संग चाहे भलाई ॥ छेरी भेड़िया संग खेला । गाय करे सिंह संग मेला ॥ नारका संग मीन भलाई । सरप चहे सुख नेवरा आई ॥ काग कुही संग चहे बिसरामा । निराकार संग सब चहे सलामा ॥
समै-साञ्ज्य मुक्तिको सब चले, देख वेदकी रीत ।
गये सुन्नमें बहुरि न आये, यह मानो परतीत ॥
रमैनी १४९—ऐसा कौतुक सुनो रे भाई । बिना बृच्छ फल सब जग खाई ॥ देई हिजड़ा कामिन रितुदाना । घर घर गुंगा बांचे पुराना ॥ बिना पुरुष कामिन सुत जाया । बिन पावक बन अगिन लगाया ॥ बिना फूल सुख बास बसाई । बिन बूझे नर गये अंधाई ॥ बिन पानीके त्रिषा बुझानी । पिंड प्राण बिन बोले बानी ॥ बिना दूध घिव निकसे भाई । बिन रवि ससि रैन दिन आई ॥
समै-बिना बीज वृक्ष जग उपजा, बिन फूलन फल लाग ।
कहैं कवीर या वृक्षहिं जाने, कोइ जाननहार सुभाग ॥
ना फल खट्टा ना फल मीठा, नहिं करुवा नहिं सीठ ।
बिन देखे बिन चारखै सब, कहैं कवीरा मीठ ॥
रमैनी १५०—पांच पचीस सदा सुखदाई । नौ औ तीन मिल राज देवाई ॥ कासी नगर बसा एक राजा । राज पाट चारों जुग छाजा ॥ प्रजा लोग करे सुख बासा । नगर मांझ सब करे विलासा ॥ ठग बटपार रहे नहिं कोई । बिरला कर पुरुष औ जोई ॥ राजा परजाको सुख देई । चारों जुग सो राज करेई ॥ सुखका नगर कासी यह गाऊं । करता पुरुष बसे तेहि ठाऊं ॥
समै-पांच पचीस तीस मिल, दीना अविचल राज । इनते एक जो बिछूरे, तिनका होय अकाज ॥ तैतिस जेहिके संग नहीं, सो करता नहिं कोय । वह कविर अंग बिहूना, वहिके जीव न कोय ॥