कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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(५११)
रमैनी १५१-बीज न वृच्छ पात न फूला । साखा कनाई फल नहीं मूला ॥ धरती ऊपर विरवा न होई । विरवा अकास सीचे सब कोई ॥ तेहि विरवामें चार फल लागे । निरफलते फल चहत अभागे ॥ सो वह विरवा सकल जग छाया । साखा मूल न काहू पाया ॥ ब्रह्मा विस्तु महेश्वर सेवा । सनकादिक तैत्तिस कोट देवा ॥ नारद आदि वो जनक विदेही । वसिष्ठ आदिक राम सनेही ॥ द्वादस भगत औ सिद्ध चौरासी । नौ नाथ रिषि सहस्र अठासी ॥ यह विरवा काहू नहीं चीन्हा । परचे बिना जीव सब दीन्हा ॥
समै-प्रथमै वृच्छ विरंचिहि, तेहि पाछे संसार ।
कविर वह वृच्छ निरगुन, विरला बूझन हार ॥
रमैनी १५२-बात हमारी बूझे जोई । वह पंडित बड ज्ञानी होई ॥ बीज उठा अंकूर कहाया । पौधा भया प्रात पर लाया ॥ छोटी डारी सो भइ कनाई । बड़ी भई सो साख ठहराई ॥ मध्य पर भया फूल ठहराया । बीज भया तब फल कहलाया ॥
समै--जो बोया सोई भया, ठांव ठांव पर नाम । पिता पुत्र एके ज्ञानी, जाव न निरगुन गांव ॥ करता माया तीन गुण, पांचों सबल शरीर । न्यारे २ देत दिखाई, कहत पुकार कवीर ॥ मन माया औ जीव गुण, धोख कहें सब कोय । गये नहीं औ सब गये, कहत जगत सब रोय ॥
रमैनी १५३--वृच्छ भया बीज विन पानी । तेहिका सेवत पंडित ज्ञानी ॥ आदि अंत न काहू पाया । परिपूरन सो वृच्छ कहाया ॥ फल औ फूल मूल औ डारा । सुंधत पात चहुँ दिसि बिस्तारा ॥ तेहिका देव अदेवन ज्ञानी । ब्रह्माते कहो आद भवानी ॥
समै-वृच्छ एक तीन फल लागे, बडहर बेर मकोय ।
वृच्छ कवीरा वह अदभुत, उत्पत परले होय ॥