कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी-
रमैनी १५४-बीजा एक वृच्छते आया । बीजामें वह वृच्छ समाया॥ बीज वृच्छको नास न होई । बीजे वृच्छ देखे सब कोई॥ पांच तत्त्व जीव मिलि यक रंगा । साख लिये सगरी यक संग॥ पृथ्वी अकास पवन औ पानी । आप आपमें सबहि समानी ॥ जिवको जीव मिले जब जाई । यहिके मरे मरेको भाई ॥
समै-धरती अम्बर आदि है, अम्बर है पौन । मैं तुहि पृष्ठ पंडिता, इनमें मूआ कौन ॥ पांच तत्त्वका वृच्छ है, बीज साथ अंकुर । कह कवीर तजो का जग, रहत जगत भरपूर ॥
रमैनी १५५-आदि माया पाट लिखाया । सो त्रियदेवा सबे पढ़ाया ॥ सुनके बचन समाध लगाई । अपनी प्रतिमा दीन्ह दिखाई ॥ देख प्रतिमा भये निहाला । सबको मन भये निहचाला ॥ पांच वायु ले चले अकासा । आपन आपन देख तमासा ॥ कछु एक दिवस किया विसरामा । चला बहुरि तजि अपन मुकामा ॥
समै-ब्रह्मा करि विस्तुहि दीन्हा, विस्तु महैसे दीन्ह । शिवते पाया जगत सब, जो माया लिख दीन्ह ॥ जौन जुगत माया बतलाई, तीनों चले सो चाल । देखत प्रतिमा आपनी, तीनों भये निहाल ॥
रमैनी १५६-माता अपने सुत समझावे । लीन करे तेहि फिर उपजावे ॥ ब्रह्मा महेश आप कहाई । मातासे कन्या होय आई ॥ स्तुति करन लाग त्रिदेवा । सिद्ध समाधि लगाई सेवा ॥ उन भूलत भूला संसारा । निसदिन सेवे जोत अपारा ॥ सेवत जोत जोत मिल जाई । कंचन काया दीन गँवाई ॥ जाका बीज ताहि न जाना । निरगुनको सब जग लपटाना ॥
समै-पांच तत्त्व गुन तीन तेहि, मेट किये यह बात । वेद बिचार