भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(५९३)

सब पंडित, कथा कहे दिन रात ॥ करता आपन न चीन्हे, नित उठ पठे पुरान । सो कविरा तत्त्व गुण नहीं, ठहरा हरि निरवान ॥

रमैनी १५७--ब्रह्माते कह आदि भवानी । हमरी बात न कोई जानी ॥ चारो जुग हमरी भइ सेवा । हम आपन तुमसों कहि भेवा ॥ सकल सृष्टि हम रचे बिचारी । हम जगकी हैं पालनहारी ॥ हम जग जीति हम जग हारें । हम जग पालें हम जग मारें ॥ नरक सरग हम दीन्ह निवासा । चारों जुग हमरी जग फाँसा ॥

समै-चार पुत्र हम जनमें, बिना पुरुष संजोग । तीन देहधर एक विदेहा, अब तुम करो सुभोग ॥ बसें तीन जग भीतरे, एक सुन्न बस गाँव । सकल सृष्टिका करता, जाके हाथ न पाँव ॥

रमैनी १५८--पृथ्वी अकास पवन नहीं पानी । तबका पृथ्वी आदि भवानी ॥ रवि ससि गन गंधर्व नहीं कोई । ये नर किन्नर पुरुष ना जोईं ॥ आश्रम सुनीश्वर हते न देवा । तब कासो कहो यह भेवा ॥ कहाँ थे ब्रह्मा विस्तु महेसा । कहाँते भयो सकल यह भेसा ॥

समै-ब्रह्मा वेद बखाने सृष्टिते, कहे बात यह आय । अपरंपार अपर गति हरिकी, कौन कहे अरथाय ॥

रमैनी १५९--आप पुरुषकी घरनी माया । तिन पापिन यह सब जग खाया ॥ तीनों सुतको लीन्हेसि खाई । भाग बचे हम हमें न पाईं ॥ सोना पहिर ठगा संसारी । रूपा पहिर रूप सिंगारी ॥ दोहुन बैठ सिंहासन कीन्हा । सब जीवनका ज्ञान हर लीन्हा ॥ लेके बैठी राज औ पाटा । भइ साँपिन जग खेदे खाता ॥ ब्रह्मा बुझे न जानत कोई । यहि ते बचा अमर भै सोईं ॥ यहि जंजाल न कोई जाना । यहिके जाल जीव अरुझाना ॥

समै-अगुआ बांधे कसकसे, हेरे करडी डीठ । ऐसा काल अपरबल, खात जगत तहँ दीठ ॥