भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

रमैनी १६०-एक पुरुषकी हती जो नारी । एक छोड़ भई अनंत भरतारी ॥ कंथे तजे और पै जाई । अरधंगी पतिव्रता कहाई ॥ बार सो रहे नीत सँवारी । नित उठ जीव अनंत संधारी ॥ माता ते मेहरी कहवाई । फिर वह भई जगतकी माई ॥ अंग बिहूना पुरुष ठहराया । त्रि देवनको जाप बताया ॥

समै-तिरदेवाके सुमिरते, सबका भया अकाज । कहे कवीर कौन यह भुगते, ऐसा अविचल राज ॥

रमैनी १६१-सुन्न शिखर एक बसे कवीरा । रंकार धुन उठे गंभीरा ॥ माया आनके दिया संदेशा । त्रिगुनको यह भा उपदेशा ॥ ध्यान धरो तुम तीनों देवा । समाधि लायके करो तुम सेवा ॥ सुन्न नगरते हम तुम आये । निराकार रच हमें पठाये ॥

समै-जो कोइ थामे थाप आपनी, तेहिका करो विस्तार । ज्यों जाने त्यों हम आने, जेता यह संसार ॥

रमैनी १६२-पांच तत्त्व गुन हते न जहवाँ । तब काहे प्रहर रहते तहवाँ ॥ दिवस न रजनी पुरुष न जोई । गन गंधर्व रिषि हते न कोई ॥ इ नरकी नर हते न देवा । तब कासो प्रभु कहो यह भेवा ॥

समै-भयो अबूझ बूझे नहीं, जामे करे न बिचार । कहे कवीर पढ २ भूले, जेता यह संसार ॥

रमैनी १६३-जहां सृष्टि करताकी आई । सो सब सृष्टि करता कहवाई ॥ गुदरी पहिर अतीत न होई । करता चीन्हे करता सोई ॥ एक करताके पिंड न प्राना । सो वह करता सकल समाना ॥ जो करता नहिं पिंड ते न्यारा । तेहि करताका बीज विस्तारा ॥ करता एक दूसर नहिं कोई । जहां बूझ तहैं करता होई ॥ बिन बूझे करता नहिं पाई ॥ बिन बूझे तन काले खाई ॥