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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(५९०)

कवीरपंथी—

रमैनी १४८—मूसा बिलार संग चहे कुसलाई । त्रिन अगिन संग चाहे भलाई ॥ छेरी भेड़िया संग खेला । गाय करे सिंह संग मेला ॥ नारका संग मीन भलाई । सरप चहे सुख नेवरा आई ॥ काग कुही संग चहे बिसरामा । निराकार संग सब चहे सलामा ॥

समै-साञ्ज्य मुक्तिको सब चले, देख वेदकी रीत ।

गये सुन्नमें बहुरि न आये, यह मानो परतीत ॥

रमैनी १४९—ऐसा कौतुक सुनो रे भाई । बिना बृच्छ फल सब जग खाई ॥ देई हिजड़ा कामिन रितुदाना । घर घर गुंगा बांचे पुराना ॥ बिना पुरुष कामिन सुत जाया । बिन पावक बन अगिन लगाया ॥ बिना फूल सुख बास बसाई । बिन बूझे नर गये अंधाई ॥ बिन पानीके त्रिषा बुझानी । पिंड प्राण बिन बोले बानी ॥ बिना दूध घिव निकसे भाई । बिन रवि ससि रैन दिन आई ॥

समै-बिना बीज वृक्ष जग उपजा, बिन फूलन फल लाग ।

कहैं कवीर या वृक्षहिं जाने, कोइ जाननहार सुभाग ॥

ना फल खट्टा ना फल मीठा, नहिं करुवा नहिं सीठ ।

बिन देखे बिन चारखै सब, कहैं कवीरा मीठ ॥

रमैनी १५०—पांच पचीस सदा सुखदाई । नौ औ तीन मिल राज देवाई ॥ कासी नगर बसा एक राजा । राज पाट चारों जुग छाजा ॥ प्रजा लोग करे सुख बासा । नगर मांझ सब करे विलासा ॥ ठग बटपार रहे नहिं कोई । बिरला कर पुरुष औ जोई ॥ राजा परजाको सुख देई । चारों जुग सो राज करेई ॥ सुखका नगर कासी यह गाऊं । करता पुरुष बसे तेहि ठाऊं ॥

समै-पांच पचीस तीस मिल, दीना अविचल राज । इनते एक जो बिछूरे, तिनका होय अकाज ॥ तैतिस जेहिके संग नहीं, सो करता नहिं कोय । वह कविर अंग बिहूना, वहिके जीव न कोय ॥

शब्दावली

(५११)

रमैनी १५१-बीज न वृच्छ पात न फूला । साखा कनाई फल नहीं मूला ॥ धरती ऊपर विरवा न होई । विरवा अकास सीचे सब कोई ॥ तेहि विरवामें चार फल लागे । निरफलते फल चहत अभागे ॥ सो वह विरवा सकल जग छाया । साखा मूल न काहू पाया ॥ ब्रह्मा विस्तु महेश्वर सेवा । सनकादिक तैत्तिस कोट देवा ॥ नारद आदि वो जनक विदेही । वसिष्ठ आदिक राम सनेही ॥ द्वादस भगत औ सिद्ध चौरासी । नौ नाथ रिषि सहस्र अठासी ॥ यह विरवा काहू नहीं चीन्हा । परचे बिना जीव सब दीन्हा ॥

समै-प्रथमै वृच्छ विरंचिहि, तेहि पाछे संसार ।

कविर वह वृच्छ निरगुन, विरला बूझन हार ॥

रमैनी १५२-बात हमारी बूझे जोई । वह पंडित बड ज्ञानी होई ॥ बीज उठा अंकूर कहाया । पौधा भया प्रात पर लाया ॥ छोटी डारी सो भइ कनाई । बड़ी भई सो साख ठहराई ॥ मध्य पर भया फूल ठहराया । बीज भया तब फल कहलाया ॥

समै--जो बोया सोई भया, ठांव ठांव पर नाम । पिता पुत्र एके ज्ञानी, जाव न निरगुन गांव ॥ करता माया तीन गुण, पांचों सबल शरीर । न्यारे २ देत दिखाई, कहत पुकार कवीर ॥ मन माया औ जीव गुण, धोख कहें सब कोय । गये नहीं औ सब गये, कहत जगत सब रोय ॥

रमैनी १५३--वृच्छ भया बीज विन पानी । तेहिका सेवत पंडित ज्ञानी ॥ आदि अंत न काहू पाया । परिपूरन सो वृच्छ कहाया ॥ फल औ फूल मूल औ डारा । सुंधत पात चहुँ दिसि बिस्तारा ॥ तेहिका देव अदेवन ज्ञानी । ब्रह्माते कहो आद भवानी ॥

समै-वृच्छ एक तीन फल लागे, बडहर बेर मकोय ।

वृच्छ कवीरा वह अदभुत, उत्पत परले होय ॥

(५९२)

कवीरपंथी-

रमैनी १५४-बीजा एक वृच्छते आया । बीजामें वह वृच्छ समाया॥ बीज वृच्छको नास न होई । बीजे वृच्छ देखे सब कोई॥ पांच तत्त्व जीव मिलि यक रंगा । साख लिये सगरी यक संग॥ पृथ्वी अकास पवन औ पानी । आप आपमें सबहि समानी ॥ जिवको जीव मिले जब जाई । यहिके मरे मरेको भाई ॥

समै-धरती अम्बर आदि है, अम्बर है पौन । मैं तुहि पृष्ठ पंडिता, इनमें मूआ कौन ॥ पांच तत्त्वका वृच्छ है, बीज साथ अंकुर । कह कवीर तजो का जग, रहत जगत भरपूर ॥

रमैनी १५५-आदि माया पाट लिखाया । सो त्रियदेवा सबे पढ़ाया ॥ सुनके बचन समाध लगाई । अपनी प्रतिमा दीन्ह दिखाई ॥ देख प्रतिमा भये निहाला । सबको मन भये निहचाला ॥ पांच वायु ले चले अकासा । आपन आपन देख तमासा ॥ कछु एक दिवस किया विसरामा । चला बहुरि तजि अपन मुकामा ॥

समै-ब्रह्मा करि विस्तुहि दीन्हा, विस्तु महैसे दीन्ह । शिवते पाया जगत सब, जो माया लिख दीन्ह ॥ जौन जुगत माया बतलाई, तीनों चले सो चाल । देखत प्रतिमा आपनी, तीनों भये निहाल ॥

रमैनी १५६-माता अपने सुत समझावे । लीन करे तेहि फिर उपजावे ॥ ब्रह्मा महेश आप कहाई । मातासे कन्या होय आई ॥ स्तुति करन लाग त्रिदेवा । सिद्ध समाधि लगाई सेवा ॥ उन भूलत भूला संसारा । निसदिन सेवे जोत अपारा ॥ सेवत जोत जोत मिल जाई । कंचन काया दीन गँवाई ॥ जाका बीज ताहि न जाना । निरगुनको सब जग लपटाना ॥

समै-पांच तत्त्व गुन तीन तेहि, मेट किये यह बात । वेद बिचार

शब्दावली

(५९३)

सब पंडित, कथा कहे दिन रात ॥ करता आपन न चीन्हे, नित उठ पठे पुरान । सो कविरा तत्त्व गुण नहीं, ठहरा हरि निरवान ॥

रमैनी १५७--ब्रह्माते कह आदि भवानी । हमरी बात न कोई जानी ॥ चारो जुग हमरी भइ सेवा । हम आपन तुमसों कहि भेवा ॥ सकल सृष्टि हम रचे बिचारी । हम जगकी हैं पालनहारी ॥ हम जग जीति हम जग हारें । हम जग पालें हम जग मारें ॥ नरक सरग हम दीन्ह निवासा । चारों जुग हमरी जग फाँसा ॥

समै-चार पुत्र हम जनमें, बिना पुरुष संजोग । तीन देहधर एक विदेहा, अब तुम करो सुभोग ॥ बसें तीन जग भीतरे, एक सुन्न बस गाँव । सकल सृष्टिका करता, जाके हाथ न पाँव ॥

रमैनी १५८--पृथ्वी अकास पवन नहीं पानी । तबका पृथ्वी आदि भवानी ॥ रवि ससि गन गंधर्व नहीं कोई । ये नर किन्नर पुरुष ना जोईं ॥ आश्रम सुनीश्वर हते न देवा । तब कासो कहो यह भेवा ॥ कहाँ थे ब्रह्मा विस्तु महेसा । कहाँते भयो सकल यह भेसा ॥

समै-ब्रह्मा वेद बखाने सृष्टिते, कहे बात यह आय । अपरंपार अपर गति हरिकी, कौन कहे अरथाय ॥

रमैनी १५९--आप पुरुषकी घरनी माया । तिन पापिन यह सब जग खाया ॥ तीनों सुतको लीन्हेसि खाई । भाग बचे हम हमें न पाईं ॥ सोना पहिर ठगा संसारी । रूपा पहिर रूप सिंगारी ॥ दोहुन बैठ सिंहासन कीन्हा । सब जीवनका ज्ञान हर लीन्हा ॥ लेके बैठी राज औ पाटा । भइ साँपिन जग खेदे खाता ॥ ब्रह्मा बुझे न जानत कोई । यहि ते बचा अमर भै सोईं ॥ यहि जंजाल न कोई जाना । यहिके जाल जीव अरुझाना ॥

समै-अगुआ बांधे कसकसे, हेरे करडी डीठ । ऐसा काल अपरबल, खात जगत तहँ दीठ ॥

(५९४)

कवीरपंथी-

रमैनी १६०-एक पुरुषकी हती जो नारी । एक छोड़ भई अनंत भरतारी ॥ कंथे तजे और पै जाई । अरधंगी पतिव्रता कहाई ॥ बार सो रहे नीत सँवारी । नित उठ जीव अनंत संधारी ॥ माता ते मेहरी कहवाई । फिर वह भई जगतकी माई ॥ अंग बिहूना पुरुष ठहराया । त्रि देवनको जाप बताया ॥

समै-तिरदेवाके सुमिरते, सबका भया अकाज । कहे कवीर कौन यह भुगते, ऐसा अविचल राज ॥

रमैनी १६१-सुन्न शिखर एक बसे कवीरा । रंकार धुन उठे गंभीरा ॥ माया आनके दिया संदेशा । त्रिगुनको यह भा उपदेशा ॥ ध्यान धरो तुम तीनों देवा । समाधि लायके करो तुम सेवा ॥ सुन्न नगरते हम तुम आये । निराकार रच हमें पठाये ॥

समै-जो कोइ थामे थाप आपनी, तेहिका करो विस्तार । ज्यों जाने त्यों हम आने, जेता यह संसार ॥

रमैनी १६२-पांच तत्त्व गुन हते न जहवाँ । तब काहे प्रहर रहते तहवाँ ॥ दिवस न रजनी पुरुष न जोई । गन गंधर्व रिषि हते न कोई ॥ इ नरकी नर हते न देवा । तब कासो प्रभु कहो यह भेवा ॥

समै-भयो अबूझ बूझे नहीं, जामे करे न बिचार । कहे कवीर पढ २ भूले, जेता यह संसार ॥

रमैनी १६३-जहां सृष्टि करताकी आई । सो सब सृष्टि करता कहवाई ॥ गुदरी पहिर अतीत न होई । करता चीन्हे करता सोई ॥ एक करताके पिंड न प्राना । सो वह करता सकल समाना ॥ जो करता नहिं पिंड ते न्यारा । तेहि करताका बीज विस्तारा ॥ करता एक दूसर नहिं कोई । जहां बूझ तहैं करता होई ॥ बिन बूझे करता नहिं पाई ॥ बिन बूझे तन काले खाई ॥

शब्दावली

(५९५)

समै-बिन देखे करता भयो, बिन देखे लपटान । कहैं कबीर जगत सब वाही माहि समाहि ॥ एक समाना सकलमें, सकल समाना ताहि । कविर समाना बूझमें, जहाँ दूसरा नाहिं ॥

रमैनी १६४-आप पुजेरी आपहिं देवा । आपहिं वेद आपही भेवा ॥ आप गुरु औ आपहिं चेला । आप संयोगी आप अकेला ॥ आपहिं ठाकुर आपहिं दासू । आपहिं दाता आपहिं पासू ॥ आपहिं बीज आप वृक्ष होई । आपहिं हँसे रु आपहिं रोई ॥ आप करे औ आप निनारा । आपहिं करता सिरजनहारा ॥ आप मच्छ संखासुर मारा । आपहिं कच्छ दसधरै घारा ॥ आप प्रह्लाद हिरनाकुश आपू । आपहिं पुत्र औ आपहिं पापू ॥ आप रावना औ रामहिं रामा । आपहिं कृष्ण आप हरिनामा ॥ आप सहसा आप परसरामा । आपहिं बावन आप बलिनामा ॥ आप अवध औ आप गयासुर । आपहिं भयासुर औ असुर ॥ आप कलंकी कालीद्वार होई । आपहिं पंछी अहेरी सोई ॥ आपहिं सिंह औ आपहिं स्यारा । आपहिं हिंदू तुरुक निनारा ॥

समै--आपहिंमें यह जग उरझाना, भरम रहा यह पूर ।

कहैं कविर यह अटपटा, है नियरे पै दूर ॥

रमैनी १६५--हम करता हम सबके करैया । हम लेता हम सबके दिवैया ॥ हम शाखा हम पान औ फूला । हम सुख दुख समझ हम भूला ॥ हमही वृक्ष बीज अंकुरा । हम दाता हमही हैं सुरा ॥ हम राजा हम परजा लोगा । हमहिं करें जग सब सुख भोगा ॥ हमहीं छांछ छीर हमहीं घीवा । तत हम हम गुन हमहीं जीवा ॥

समै-हमरा यह तन जीवरा, हमरी सब है बेले । करता पुरुष अविनासी, सो वह रहा अकेल ॥ हम करता जीव जग मारे, हम करता भय काज । कहैं कबीर हम जो चीन्हे, ताका अविचल राज ॥

(५९६)

कबीरपंथी—

रमैनी १६६--राम कहत जग गया हेराई । राम कहत गये बाप औ माई॥ राम कहत तन धन खोया । राम कहत दिन रैन न सोया॥ राम कहत तज चला घर बारा । राम कहत बन आसन मारा॥ राम कहत सब जनम गँवाई । राम कहत आप फिर जाई॥ राम कहत मरा संसारा । राम कहत घर बार उजारा॥ राम कहाय राम नहि जाना । राम लखे विन भया दिवाना ॥

समै-राम राम सब कोइ कहे, रामते परिचे नाहिं ।

बांझ झुलावे पालना, कहु का सुख वहि माहिं ॥

रमैनी १६७--पूजत पूजत जन्म गँवाया । रामका खोज काहू नहिं पाया ॥ रमता राम अरमता लागा । रामका खोज न लखे अभागा ॥ बस्ती छोड़ उजार जग जाई । तौहुँ राम मिलत नहिं भाई॥ रामकी गत कोइ बिरला जाने । सो ज्ञानी जो राम पहिचाने॥ राम न जाना राम समाया । रामहिं मिला बहुरि नहिं आया ॥

समै--आँगनबेल अकास फल, अनब्याईका दूध । ससा सींगका धन ककरी, रमै बांझका पूत ॥ खोजत २ दिन गया, मिला न निर-गुन वीर । षट् दर्शन पाखंड छानवे, रहे त्रिय देवन तीर ॥

रमैनी १६८--पंडित हाथ ग्रंथ ले आया । राव रंक को पुरान सुनाया ॥ अकासके परे वैकुंठ बताया । तह भागवत रहेस रचाया ॥ मानसरोवर है तेहि ठाँय । कल्प वृक्ष एक है वहाँ गाय ॥ कामधेनु वहां एक गाई । जो चाहे सो केल कराई ॥ जप तप पूजा करे जो कोई । वैकुंठ लोक सो प्राप्त होई ॥ जो कोइ बात अधर्मकी कराई । सो प्राणी यमलोके जाई ॥

समै--लै पुरान सब को समझावै, सबहीं लीना मान ।

कहे कवीर चला सब कोई, अंधरेकी पहिचान ॥

रमैनी १६९--जनम संदेशा पंडित लाये । जमपुरका सब भेद

शब्दावली

(५१७)

सुनाये॥ जमकी कहें आन मुख चारी। नरक सरगकी बातें न्यारी॥ चित्रगोपित्र कहें समुझाय। जो कुछ सूरज चंद लखाय॥ न्याव कहत सब रिषि मुनि देवा। पावे सोई कियो जस सेवा॥ सुन यह बात सृष्टि डर खाय। निराकार परम ठहराय॥ आपाकी कछु खबर न पाई। लिखेकी बात सृष्टि भरमाई॥

समै--तीन लोक देख हम आये, पाया न जमपुर गांव। पंडित भरम उपराजिया, राखा जमपुर नाम॥ जिनते जम यह ऊपजा, तिनको लीन्हेंसि खाय। कहैं कवीर सोई जन बांचे, बापे चीन्हें धाय॥

रमैनी १७०--कहो पंडित तुम वेद विचारी। पहिले पुरुष कि पहिले नारी॥ पहले तीर्थ कि पहिले देवा। पहिले वेद कि पहले भेवा॥ पहले कर्ता कि पहले कर्मा। पहले पाप कि पहले धर्मा॥ पहले बीज कि तरवर होई। पहले ज्ञान अज्ञान कि सोई॥ पहले दिवस कि पहले राती। पहले मुख की पहिले जाती॥

समै--बीज बृच्छ एक साथ है, नजहँ देखे कोय।

तैसहँ जीव रु साज सब, आग पाछ ना होय॥

रमैनी १७१--वेद बड़ा कि जिन सिरजाया। ब्रह्म बड़ा कि जहांते आया॥ तीरथ बड़े कि हरिके दासा। देह बडी कि बड़े अकासा॥ कृष्ण बड़े कि बड़े हनुमाना। राम बड़ा कि रामहँ जाना॥ देव बड़े कि बड़ करतारा। धरती बडी कि बड़े पहारा॥ देव बड़े कि पूजनहारा। विद्या बडी कि पढ़ने हारा॥

समै--तीरथ गये एक फल, साध मिले फल चार।

सद्वरु मिले अनेक फल, कहें कवीर पुकार॥

रमैनी १७२--सुन पंडित इक बात हमारी। हरि ब्रह्मा एक रची फुलवारी॥ मूल चार छे ताकी शाखा। अठारह पत्र चार फल चाखा॥ बारह कनई फूटी चहुँ ओरी। कुंचन बिरोह चहुँ दिसि

(५९८)

कवीरपंथी—

बहु तेरी ॥ सो देखनको चला संसारा । वहाँ बैठे पंडित रखवारा ॥ देख देख सब कोइ भुलाना । षट् दरशन सबके मन माना ॥ रैन औ दिन करें सब सेवा । वहि बनवारीका लखा न भेवा ॥

समै--जेहि बन सिंह न संचरे, पंछी बैठ न डार । सो बन कविरन दूढिया, सिंह समाध बिचार ॥ ओंकार नाद यक माया, तहँ लागे गुन तीन । तामे अटका जगत सब, भया वहीँ लौलीन ॥

रमैनी १७३--देखो देखो जीवके काजा । जात चले तज अविचल राजा ॥ ये देखो लोगनकी भूल । सींचत साख तजत हैं मूल ॥ मीठा फल तजि कडुवे खाता । जो नहिं तेहि जपे दिन राता ॥ बस्ती छोड़ उजार जग जाई । खांड तजिके खरी जो खाई ॥ करिके बिचार तजे जो कोई । जुग जुग यह सुख बिलसे सोई ॥ वहाँकी खबर सब ले आया । वहाँ नाहिं कछु मन भरमाया ॥

समै--साखा पात सींचे सब, हरियर होय सुखाय । कविरा सींचे मूलके, डार पात हरियाय ॥ आस लाय सिंचत विरवा, जाके फल नहिं पात । मोहि निसदिन संसा, दिन दिन सो हरियात ॥

रमैनी १७४--चारो जुग हम फिरे पुकारी । कोइ न माने बात हमारी ॥ कहत कहत मोर रसना हारी । मानत नाहिं मोर सुत नारी ॥ हम संजोग कीन्ह व्योहारा । बंस बेलको रचा संसारा ॥ जो हम हैं सो पूत हमाग । पिता पुत्र ते नाहिं निनारा ॥ हम नित बोलें हम नित चालें । हम करता त्रिभुवनको पालें ॥ हम जललें हम करें अहारा । यह सब आतम आप हमारा ॥ जो बूझे सो प्राण हमारे । जो नाहीं तिनते हम न्यारे ॥

समै--जिसका करता और है, निराकार नहिं होय । जो उपदेश दियो सद्गुरुने, जगत कहे सब रोय ॥ अमर तखत अडि आसले, पिंड झरोखे नूर । जाके दिलमें मैं बसूं, सैना लिये हजूर ॥

शब्दावली

(५९९)

रमैनी १७५--सुन पंडित मैं पूछो तोही । निसदिन संशय व्यापे मोही ॥ चार भुजा जाके पिंड न प्राना । सो प्रभु कैसे भयो पखाना ॥ जाका यह सब कीन कराया । सो प्रभु कैसे गरभमें आया ॥ तीन सृष्टिका करता जोई । सो प्रभु कैसे बालक होई ॥ अकास सीस पाताल जेहि पाया । सो संपुट प्रभु कैसे समाया ॥ चौदह भुवन लो जो प्रभु छाया । सो अंगुल दस कैसे कहाया ॥ नित उठ जो प्रभु सबको देई । सो प्रभु कैसे तुमसो लेई ॥

समै--आगु आगु पंडित चले, पाछे लागु संसार ।

कविरा सेवक सो भया, पाया जिन निरंकार ॥

रमैनी १७६--यह तन पांच तत्त्वका भेला । इनमें कौन गुरु कौन है चेला ॥ एह तन है एक नगर अपारा । ताकी वस्तु कहो बिस्तारा ॥ कैसी बस्ती कैसी चाला । कैसे लोगवा कैसे रूयाला ॥ कैसे रैयत कैसे राजा । कैसे हरि यह जग उपराजा ॥ यहि बस्तीकी चाल जो पाई । सो अमरापुर नगर बसाई ॥

समै--काजी पंडित पच मरे, पाये गांव न ठांव । कवीरा मोहि अचंभा, नाहिं धरायो नाम ॥ नाम न पाये गांवका, रहे नाहिं ठहराय । कविरा लखे बिन हरिके, आपा दिया गंवाय ॥

रमैनी १७७--बिना विवेक जगत भरमाना । भेष किया पै राम न जाना ॥ बिना विवेक जगत भयो रोगी । भेष धरा जग भया वियोगी ॥ जेहिके घर यह बूझ न होई । तिसके बंस न तिछे कोई ॥ बिना विवेक गये त्रिदेवा । भेष धरा पै लखा न भेवा ॥ जहां विवेक तहां करतारा । भेषहिं करता रहा निनारा ॥ भेष मध्य निराकार समाना । जहाँ विवेक तहाँ आतम ज्ञाना ॥

समै--कर बंदगी विवेककी, भेष धरे सब कोय ।

वह बंदगी बहि जान दे, जहाँ शब्द विवेक न होय ॥

(६००)

कबीरपंथी-

रमैनी १७८-देखा देखी जग भर्माना । ज्ञान कथा पै राम न जाना ॥ काहू तीरथ बरत लौ लाया । कोई सुन्न मंदिलको धाया ॥ कोई पीर औलिया सेवे । कोई नित उठ पूजे देवे ॥ कोई जोग जुगति अरुझाना । कोई मंत्र जंत्र मन माना ॥ कोई सुनि जन काया मारे । कोई जटाधर ब्रह्म विचारे ॥ कोई जन्म कर्म ठहराई । कोई बौध जती कहवाई ॥ कोई सकति ते भया संचाती । कोई भगति करे दिन राती ॥ कोई ज्ञान करता ठहरावे । कोई भूत प्रेत तन धावे ॥ एक मते चले ना कोई । अपनी मत पुरुष अपनी मत जोई ॥

समै--पिता न पाया पुत्रने, परा भरम जी माहिं । बहुते चित्त लगाइबो, ताते पहुंचत नाहिं ॥ हती एककी भई अनेककी, बेस्या बहुत भतारि । कहैं कवीर काके संग जरि है, बहुत पुरुषकी नारि ॥

रमैनी १७९--नरकी टेक गही नहिं जाई । कोट कवीर रहे समझाई ॥ कैसे उन तत गुरु पढाया । गुरु मंत्र ले जी भर्माया ॥ रहन गहन जो गुरु पढाई । सो सो जीव टेक जग भाई ॥ खांड तजे खारीको खाई । आप नासि दूजा ठहराई ॥ आपनी तजि औरकी आसा । जलमैं ठाढा मरे पियासा ॥

समै--टेक न कीजे बावरे, टेक माहिं है हानि । टेक तजे सुख पाइये, कहे कवीर निदान ॥ टेक करी रावन गये, कंस भया निरबंस । कविरा छाँडो टेक तुम, बूझ बचावो हंस ॥

रमैनी १८०--सब जगका ऐसा प्रस्थावा । सब कोइ कहे राम हम पावा ॥ कोइ कहे हम जप तप कीन्हों । तहां राम मोहि दरशन दीन्हों ॥ कोइ कहे तजा अन्न अहारा । तहं पाये हम राम दिदारा ॥ कोइ कहे हम भये संन्यासी । सार्क्य जोग करि मिले अविनासी ॥ कोइ कहें कण्ठी छाप बनाई । तहैं हरि दरशन दीन्हों भाई ॥ कोइ कहें हम दीन्हों दाना । कोइ कहें हम रामहिं जाना ॥

शब्दावली

(६०१)

समै--जहँ देखा तहँ रामको, बिन यक राम न कोय । बातन हमे जगत प्रवोये, बातन राम न होय ॥

रमैनी १८१--देखो देखो यह नर ज्ञाना । आप तजत पूजत पाषाना ॥ कोई सिद्ध करे धुन पाना । कोई रह गोड उलाटे ताना ॥ कोई बैठा तज अन्न अहारा । कोइ बैठा आसन मारा ॥ कोइ करे नित तरपन जापा । कोई धर्म करे तजि पापा ॥ कोई घर तजि भये ब्रह्मचारी । कोई अन्न तजि दूधाधारी ॥ कोइ बैठा तन खास लगाई । कोइ बैठ तन तिलक दिखाई ॥ मठ मंडपा कोइ पढ़ुंचा जाई । कोई सुन्नमें रहा समाई ॥ कोई चढावे उलटा पवना । कोइ सकल तजि भया सु मौना ॥ कोइ श्रुति स्मृति पढे पुराना । कोई तीरथ बरत जो दाना ॥ कोई देश दिसंतर जाई । हरि गुन गाई अन्न न खाई ॥ कोइ करे काया प्रछाला । कोई डाले फिरे कंठी माला ॥ कोइ करता नित राग औ रंगा । कोइ करते देव सुनीका संगा ॥

समै--देखा देखी सब जग भरमा, मिला न सद्धरु कोय । कहें कवीर कर कर नित संशय, जियरा डारा खोय ॥

रमैनी १८२--घट फूटे जल सब बह जाई । काठ जरे पावक सब जाई ॥ फूल सुखाने बास न होई । घटमें चंद न पावे कोई ॥ दूध बिनासे निकसे न घीव । बिन तन कैसेहु रहे न जीव ॥ कांसी फूटे धुन नहि आई । बिजना टूटे पवन नसाई ॥

समै--बिन तन कोई लखे न जियरा, बिन तन झूठा रूप ।

कहें कवीर झूठा किन्ह पंडित, ऐसा ल्याल अनूप ॥

रमैनी १८३--सीते सात भई सितलाई । सीते सीत रोग होय जाई ॥ सीतल मिला सो साधु कहाई । सीत बिहूना साध न पाई ॥ सीतल होय तब सीतल पावे । सीतल होय तब सीत न जावे ॥ सीते सीत अमर नर होई । सीतल राखे ज्ञानी सोई ॥

(६०२)

कबीरपंथी—

समै—सीतै मिल सीतल भया, सीतै सित अधिकाय । सीतल जीव विनासिया, सीतलकी दो बात ॥

रमैनी १८४—यहि बिधि बूझो पंडित ज्ञानी । हिय कपारकी दोउ हेरानी ॥ बूच्छ एक फल भये अनंता । माटी एक घर भये अतिअंता ॥ दो संजोग सृष्टि बहुतार्ई । कंचन एक भूषण बहु भाई ॥ सूत एक वस्तर बहु नामा । अन्न एक धरे बहु नामा ॥ अनेक जान जिय एके जाने । अलख पुरुषको जो पहिचाने ॥

समै—गहना एक कनकते गहना, नाम अनेक धराया । कहैं कबीर कंचनका भूषण, एक भया जब ताया ॥

रमैनी १८५—पंछी एक जाकी सब सेना । बिन तन जीव बोले मुख बैना ॥ बिना पंख उड़ सब जग जाई । बिना चोंच जग लीन्हा खाई ॥ वहि पंछीका खोज न पाया । जिन पंछी सब भरमाया ॥ अकास पताल कीन्ह वहि बासा । घट घट वाका भया निवासा ॥

समै—ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, असुर मुनी सुर देव । दृढत दृढत पच मुए, लखा न वाका भेव ॥ तिल जैसी है चिरैया, पंखा नौ नौ हाथ । बकोटन मास परोसन वाकी, पूछ अठारह हाथ ॥

रमैनी १८६—सांचा बनिज करो सब कोई । सांच बनिज लाभ बहु होई ॥ सब गुन भरे जीव सो देवा । निरफल वृक्षकी करो न सेवा ॥ बनखंड मांझ परोजन भाई । शब्द विचार रहो ठहराई ॥ करता पुरुष ते करो सनेहा । देह धरे जनि होहु बिदेहा ॥ जहां बूझ तहैं करता माना । साधते करता नाहिं भिनाना ॥ करता करे सब जीव जनंता । नित समझावे संत अनंता ॥

समै—जो दिल दगा समुद्र है, तेहि बन जाव जिन कोय । सो

शब्दावली

(६०३)

दिल सदा बनीजिये, जेहि दिल दगा न होय ॥ जैसा दिल मेरा अहै, ऐसा तेरा होय। कच्चा लोहा ताय करि, संधि लखे नहिं कोय ॥

रमैनी १८७--भौजल नदी महा विकरारा। मन मलाह तहैं खेवनहारा ॥ काम क्रोध दोऊ घटवानी। ते सबकी कर ऐंचातानी ॥ मोह नाव आसा कँडिहारा। लोभ और तूज्जा लहर अपारा ॥ ऐसी नदी नाव यह आई। तेहि चढ उतरे यह जग भाई ॥ उतर उतरके गये तेहि ठाऊं। मिला संदेस न लीना नाऊं ॥

समै--गुन टूटे बेरा बहे, औघट लागे जाय।

कहैं कवार मोर यह विरवा, जड़ पातो गयो सुखाय ॥

रमैनी १८८--वचन हमार तुम सुनो कवीरा। करता सब गुन धरे शरीरा ॥ आदि माया संग केल कराई। केल करत इच्छा जिय आई ॥ दो संयोग भये तिरदेवा। तिनहिन लाई उनकी सेवा ॥ सेवा करत गये जुग चारी। किनहुं न मानी बात हमारी ॥ करताकी कछु खबर न पाई। अंग बिहूना रहा लौलाई ॥

समै--बंस बेलके कारने, करता पास उपाव।

करता छोड अकरताकी नारी, पुत्रते कीन्ह अन्याव ॥

रमैनी १८९--बचन हमारा सुनो अनूठा। वेद किताब कहेको झूठा ॥ वेदको भेद न काहू पाया। झूठा वेद पंडित ले आया ॥ वेद बिहूना न पंडित होई। वेदे जाने पंडित सोई ॥ संध्या तरपन न पंडित जानो। करता लखा सो पंडित मानो ॥ भेद न पाया जग भर्माया। झूठा झगरा पंडित लाया ॥ तेहि झगरा सब जग अरुझाना। देव आदिका मरम न जाना ॥

समै--चारो जुग झगरा गये, झगरा तऊ न छूट।

यह पंडित सब जग भर्मावे, कहे कवीर सब झूठ ॥

रमैनी १९०--बाद विवाद तजो तुम ज्ञानी। बूझो बूझो हमारी

( ६०४ )

कबीरपंथी—

बानी ॥ बिन बूझे नाहीं गुन पैहो । बिन बूझे तुम हरिहिं समेहो ॥ सत् होय तेहि तजो न भाई । औ सत् तजो जन रहो समाई ॥ तजो नहिं बाप तजो नहिं माया । तजो नहिं कर्म तजो नहिं काया ॥ छाडो न आपन लोग व्योहारा । छाडों न यह सुखको दरबारा ॥ बापहिं चीन्हों चीन्हों फिर माई । तातै चीन्हों तत्त्व समाई ॥

समे—जात पात जिन छोडो, छोडो गांव न ठांव । शब्द हमारा न छोडो, जनि फेर धरावो नाम ॥ षट् दरशन भूले जात पांत तज, मिला न सद्गुरु कोय । कहैं कबीर भर्म ऊपजा, थित काहे ते होय ॥

रमैनी १९१—यहि विध बूझो पंडित ज्ञानी । जहां अगिन तहां धूम निसानी ॥ जहां जीव तहं होइहै देही । जहां पुरुष तहं होइहै जोई ॥ घटके आधार नीर घट होय । जहैं देही तहैं जीव संजोय ॥ जहां संशय तहं होइहै रोगा । जहां प्रीत तहैं होय वियोगा ॥

समे—एक एक ते होय नहीं, जो पै दूसर नाहिं ।

दूसर मिला एकै भया, इसमें संशय नाहिं ॥

रमैनी १९२—समझो शब्द होय जिय चैना । जिन परछि पाय न देखो नेना ॥ षट् शास्त्र यह करत लड़ाई । मिमांसा रहा कर्म ठहराई ॥ वेदान्त कहे ब्रह्म जग करता । जैन मते बोध चित धरता ॥ करताको ठहराया अन्याई । मंत्र शास्त्र शिव सकती ठहराई ॥ पातंजली अनेक ठहरावे । झगरा मेटे जो न्याय चुकावे ॥

समे—न्याय करे यह सोय जिन, पाया पुरुष अलेख ।

कहैं कबीर सोई जिव मुकुत, जिन यह किया विवेक ॥

रमैनी १९३—षट् दरशन यह करें बिचारा । निराकार सो सिरजनहारा ॥ निराकार दस दिशा बनाई । दसो दिशामें रहा समाई ॥ पूरव भगति पच्छिम करे ज्ञाना । उत्तर जोग दच्छिन कर्म ठहराना ॥ अग्ने काल वायव्य भई संसा । नित नेम ईसान

शब्दावली

(६०५)

नीवंसा ॥ पाताल भर्मे अकाश निराकारा । मृत्युलोकका झूठ षसारा ॥ घरकी नारि तज भया वियोगी । दसों दिशामें भया विरोगी॥ समाधलायजोतको ध्याया। अलख न चीन्हा जीव गँवाया॥

समै--दसों दिसा खाली परी, सुन्न ब्रह्म ठहरान ।

कहे कवीर यह बूझ जगतकी, यहि ठहरा गुरुज्ञान ॥

रमैनी १९४--देव निरंजन पुरुष न दूजा । वेद पुकारे पंडित कर पूजा ॥ मसजिद मुलना करे पुकारा । स्वास वेद करे निरं- कारा ॥ जवाब सवाल न पावे कोई । पुकार पुकार जन्म सब खोई॥

समै--आखंडिया झाई भई, पंथ निहार निहार ।

जीभड़िया छाले परे, अलख पुकार पुकार ॥

रमैनी १९५--षट दरशन मिल समझो बानी । केहि ठहराया आदि भवानी ॥ अलख बड़ा कि, जिन अलख लखाया । करम बड़ा कि जिन ककर कराया ॥ दसो दिशामें दस व्योहारा । दिशा बडीकी बूझनहारा ॥ जो सब बूझे करे करावे । तौन बड़ाकी जो नहि पावे ॥

समै- बीजक बतावे बित्तको, जो विज्ञ गुप्ता होय ।

शब्द बतावे जीवको, बिरला बूझे कोय ॥

रमैनी १९६--नरका ढाढस अगम अपारा । गहे न जाय जाय संसारा ॥ जनक आद जिव देह जराई । सनकादिक बसे बन जाई ॥ रावन आदि जिन सीस कटाया । हरनाकुस आदि जिन उदर फराया ॥ बलि आदिक जिन पीठ नपाई । कस आदि जिन कीन उपाई ॥ गौतम आदि जिन तप कियो भाई । विश्वा- मित्र आदि सृष्टि करि आई ॥ जमदग्नि आदि जिन तप कीना भाई । जड़भरत आदि जिन सरब गंवाई ॥

समै--षट दरशन ढाढस मरे, गन गंधर्व मुनि देव । कहे कवीर

(६०६)

कवीरपंथी-

ढाढस तजे, लखे सो अविगत भेव ॥ जेहि करता तिन दीन ढाढस, ढाढस वहाँ न होय । अंग विहूना जो रहे, अहंकार करे सोय ॥

रमैनी १९७--नर सा चतुर न दूजा होई । चतुरे चतुर मिला सब कोई ॥ पाप न चतुर चतुर व्योहारा । चतुर चतुर ठगे संसारा ॥ चतुरे सुत चतुरे मिल जोई । चतुर विहूना मिला न कोई ॥ एक न तजे करे चतुराई । माता एक जोनि ठहराई ॥ चतुरे मिल चतुरा समझावे । चतुरको भेद चतुर होय पावे ॥ एक न चतुर चतुर संसारा । सब चतुरनते करता न्यारा ॥

समै--चतुराईको छोडदे, सद्वरुको मिल बूझ । कहैं कवीर दीपक बिना, अंधेरे परे न सूझ ॥

रमैनी १९८--यह नर उतर पारको जाई । कहो पंडित मोहिं तैं समुझाई ॥ नाव न करिया न खेवनहारा । नदी विकट जेहि बार न पारा ॥ जल अगाध तहैं लहर गंभीरा । औघट घाट सब उतर कवीरा ॥ रैन अंधेरी संग न कोई । आप आप चले सब सोई ॥ दिवस न रजनी पुरुष न नारी । हरि ब्रह्मा तहैं नहि त्रिपु- रारी ॥ सुख ना भोग गुरु ना चेला । पार उतर जग चला अकेला ॥ निरगुन ब्रह्म कछु ना भाई । सुन्न सेयके सुन्न समाई ॥

समै--गुन टूटे बेरा बहा, उठ गया खेवनहार । औघट घाटी नर गया, कासों कहों पुकार ॥ फुलवा भार न ले सके, कहैं सखिन सो रोय । ज्यों ज्यों भीजे कामरी, त्यों त्यों भारी होय ॥

रमैनी १९९--बाट विकट नहिं कोइ बटवानी । तौने बाट चले ब्रह्मज्ञानी ॥ नगर दूर तहैं संग न कोई । गैल सलसली उदो ना होई ॥ भेद अभेद न त्रिगुन माया । पांच तत्त्वकी हती न काया ॥ बोल चाल न पीव न खाई । अंकार नहिं नगरमें रहाई ॥ सुख अनंद ना निद्रा भाई । समझ भूल नहि आवे जाई ॥

शब्दावली

(६०७)

समै-चिउँटी जहाँ न चढि सके, राई ना ठहराय । आवागमनकी गम नहीं, तहाँ सकल जग जाय ॥

रमैनी २००-वहाँकी कोई कहे न बाता । सुन्न नगर की जो कुसलाता ॥ पुरुष साथ जरे जो जोई । वहाँकी बात कहे न कोई ॥ निरगुनमें जो जीव समाया । तेहि की खबर न कोई लाया ॥

समै-स्वाद ना पाये कंदका, सब कोइ करे बखान । मीठा मीठा जग कहे, मीठेमें भइ हानि ॥ बात पराई को कहे, परदा लखे न कोय । सहना छिपा पयारमें, को कह बैरी होय ॥

रमैनी २०१-प्रेम प्रीति सुनत जग आया । सरगुन छोड़ निरगुन गुन लाया ॥ निरगुन पदमें बैठा जाई । निरगुन रहा सुन्न ठहराई ॥ निरगुनका गुन लखे न कोई । प्रेम लगाय पुरुष औ जोई ॥ प्रेम प्रेम सकल जग बंधा । प्रेमका गुन कछु लखे न अंधा ॥ प्रेम प्रेम मुवा सब कोई । प्रेम बूझ प्रीतम है सोई ॥

समै-साध बसें हरि भीतरे, हरि बस साधन मांझ । कहे कवीर देश वह ऐसा, जहां भोर नहि सांझ ॥

रमैनी २०२-सब पंडित मिल कहे विचारी । केकर बाप काकी महतारी ॥ हमना कोइके कोइ न हमारा । उड़ जैहै जब बोलन- हारा ॥ सुन्न नगरका पवन यह भाई । सुन्न नगरमें जाय समाई ॥ संग साथ नहि कोई आया । बीचहिं माया बीच मिलाया ॥ यह कह गुरुवा जग भरमावे । सहर छुटाय सुन्न ले जावे ॥

समै-वहाँ की आसा लाय ना, झूठी यहां की आस । यह तज घर बन मांडिया, जुग जुग फिरे निरास ॥

रमैनी २०३-एक दिवस वो एके राती । सात रैन दिन कहो केहि भांती ॥ एक पुरुष वो एके जोई । दो संजोग जगत सब होई ॥ एके प्रान वो एके काया । बहुत जीव घर कहां ते आया ॥ एक ऊखकी एक मिठाई । अनेक नाम कैसे घर भाई ॥

(६०८)

कवीरपंथी—

समै--नीवके बिचले सब घर बिचला, अब कछु नहीं बसाय । कहै कवीर जो कोइ समझे, तेहिको काल न खाय ॥

रमैनी २०४--कहो पंडित तुम निगम बिचारी । काहे ते पुरुष काहे ते नारी ॥ कहाँ ते पुरुष कहाँ ते राती । काहे ते जात काहे ते पाती ॥ कहाँ ते गुरु कहाँ ते चेला । काहे ते बृच्छ काहे ते भेला ॥ काहे ते हिंदू तुर्क कहाये । काहे ते नरक सरग बतलाये ॥ कहो पंडित अनेक व्योहारा । सत् मितमें है संसारा ॥

समै--एके यह तन जीउरा, एक बृच्छ एक बेल । कहै कवीर एक जो समझे, एक अनंत अकेल ॥

रमैनी २०५--अचरज एक सुनो तुम भाई । बिंद चोराइ स्व- पचका लाई ॥ उठी बेल फल तामे लागा । माय बहिन सब गावें रागा ॥ छठी भरी तहें बाजन बाजे । बंदनवार मंडलमें छाजे ॥ पर लडका मरम काहु न पाया । तैंतिस कोट देवतन खाया ॥ जेहिका सुत तेहि राख दुराई । पर पुत्र पर तात खिलाई ॥

समै- पेडे मूल बिगाडिया, सुत आगे भरमाय । कहै कवीर जेहिका सब कीना, तेहिका कछु न बसाय ॥ आद भई अब नाही, पराबीजपर खेत । कहै कवीर समझे नहिं कोई, विरथा जीव मृग देत ॥

रमैनी २०६--भरत भूत एक खेले भाई । ऐसा भूत लखा न जाई ॥ दिवस एक भूत लपटाना । दूसर होयके पिंड समाना ॥ नावत भौहा करे दवाई । भर्म भया पै भरम न जाई ॥ नित उठ पीर वो देव मनावें । आप भरम आप थित लावें ॥ जहांते भरम उठा यह भाई । तहां भरम वह जाय समाई ॥

समै--मथुरा नगर भरम एक प्रानी, कविराके उपदेश । कहै कवीर वहां कोइ नहीं, झूठा बहुत संदेश ॥

शब्दावली

(६०९)

रमैनी २०७--पांच तत्त्व गुन एके भाई । रक्त मांस कछु भेद न पाई ॥ नासिका सरवन मुख एके बैना । रोम त्वचा पग कर नैना ॥ रक्त मांस हाड एक गूदा । ब्राह्मण क्षत्री वैश्य वो सूदा ॥ कहो पंडित तुम मोहि समझाई । बरन भेद तेहि देहु बताई ॥

समै--एक वृच्छ बहु फल लगे, कौन बड़ा को हीन । जो जाहीमें संचरे, सो ताही आधीन ॥

रमैनी २०८--पंडित खोल देख तुव ग्रंथा । जग संजोग कामिन वो कंथा ॥ नांदे बिंद समते है भाई । बालक होय विरंच बनाई ॥ नांद बिंद मिल जग भौ पाडा । ते कैसे कहे माटीको भांडा ॥ नांद बिंदकी खबर न जानी । फिर फिर धोखा कहें कहानी ॥

समै--बिन संजोग भया कछु नाहीं, ऐसा दिया संदेश । बिन संजोग जगत सब उपजा, यह आया उपदेश ॥

रमैनी २०९--बिन काजे काया जिव जारी । रट रट राम जनम सब हारी ॥ रटे रैन दिन गुरु समझाई । रटे राम पै राम न पाई ॥ रामहि जाने रहित तब होई । रामहि कहे भये जम लोई ॥

समै--बिन डाई जग हांडिया, सोरठ परिया डांड । बाटनहारा लोभिया, गुरु सो मीठी खांड ॥

रमैनी २१०--ले चोरीटा बाभन लावे । दो कर जोरके देव मनावे ॥ नारसिंह भैरोंके लाई । हनुमान देवी कहवाई ॥ पीर पैगम्बर कहें यह देवा । घर घर होय सबनकी सेवा ॥ दूध पूत मांगे जग जाई । कोई कहें कंथ सुत आई ॥ कोई कछु कोई कछु कहई । जो जो मांगे सो सो लहई ॥ सृष्टि बावरी तेहि दिल लावे । देवी देवका मरम न पावे ॥

समै--राम रहे वन भीतर, गुरुकी पूजी न आस । कहें कवीर पाखंड सब, झूठे सदा निरास ॥

कवीरपंथी-शब्दावली २०