कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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रमैनी १७५--सुन पंडित मैं पूछो तोही । निसदिन संशय व्यापे मोही ॥ चार भुजा जाके पिंड न प्राना । सो प्रभु कैसे भयो पखाना ॥ जाका यह सब कीन कराया । सो प्रभु कैसे गरभमें आया ॥ तीन सृष्टिका करता जोई । सो प्रभु कैसे बालक होई ॥ अकास सीस पाताल जेहि पाया । सो संपुट प्रभु कैसे समाया ॥ चौदह भुवन लो जो प्रभु छाया । सो अंगुल दस कैसे कहाया ॥ नित उठ जो प्रभु सबको देई । सो प्रभु कैसे तुमसो लेई ॥
समै--आगु आगु पंडित चले, पाछे लागु संसार ।
कविरा सेवक सो भया, पाया जिन निरंकार ॥
रमैनी १७६--यह तन पांच तत्त्वका भेला । इनमें कौन गुरु कौन है चेला ॥ एह तन है एक नगर अपारा । ताकी वस्तु कहो बिस्तारा ॥ कैसी बस्ती कैसी चाला । कैसे लोगवा कैसे रूयाला ॥ कैसे रैयत कैसे राजा । कैसे हरि यह जग उपराजा ॥ यहि बस्तीकी चाल जो पाई । सो अमरापुर नगर बसाई ॥
समै--काजी पंडित पच मरे, पाये गांव न ठांव । कवीरा मोहि अचंभा, नाहिं धरायो नाम ॥ नाम न पाये गांवका, रहे नाहिं ठहराय । कविरा लखे बिन हरिके, आपा दिया गंवाय ॥
रमैनी १७७--बिना विवेक जगत भरमाना । भेष किया पै राम न जाना ॥ बिना विवेक जगत भयो रोगी । भेष धरा जग भया वियोगी ॥ जेहिके घर यह बूझ न होई । तिसके बंस न तिछे कोई ॥ बिना विवेक गये त्रिदेवा । भेष धरा पै लखा न भेवा ॥ जहां विवेक तहां करतारा । भेषहिं करता रहा निनारा ॥ भेष मध्य निराकार समाना । जहाँ विवेक तहाँ आतम ज्ञाना ॥
समै--कर बंदगी विवेककी, भेष धरे सब कोय ।
वह बंदगी बहि जान दे, जहाँ शब्द विवेक न होय ॥