कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कवीरपंथी—
बहु तेरी ॥ सो देखनको चला संसारा । वहाँ बैठे पंडित रखवारा ॥ देख देख सब कोइ भुलाना । षट् दरशन सबके मन माना ॥ रैन औ दिन करें सब सेवा । वहि बनवारीका लखा न भेवा ॥
समै--जेहि बन सिंह न संचरे, पंछी बैठ न डार । सो बन कविरन दूढिया, सिंह समाध बिचार ॥ ओंकार नाद यक माया, तहँ लागे गुन तीन । तामे अटका जगत सब, भया वहीँ लौलीन ॥
रमैनी १७३--देखो देखो जीवके काजा । जात चले तज अविचल राजा ॥ ये देखो लोगनकी भूल । सींचत साख तजत हैं मूल ॥ मीठा फल तजि कडुवे खाता । जो नहिं तेहि जपे दिन राता ॥ बस्ती छोड़ उजार जग जाई । खांड तजिके खरी जो खाई ॥ करिके बिचार तजे जो कोई । जुग जुग यह सुख बिलसे सोई ॥ वहाँकी खबर सब ले आया । वहाँ नाहिं कछु मन भरमाया ॥
समै--साखा पात सींचे सब, हरियर होय सुखाय । कविरा सींचे मूलके, डार पात हरियाय ॥ आस लाय सिंचत विरवा, जाके फल नहिं पात । मोहि निसदिन संसा, दिन दिन सो हरियात ॥
रमैनी १७४--चारो जुग हम फिरे पुकारी । कोइ न माने बात हमारी ॥ कहत कहत मोर रसना हारी । मानत नाहिं मोर सुत नारी ॥ हम संजोग कीन्ह व्योहारा । बंस बेलको रचा संसारा ॥ जो हम हैं सो पूत हमाग । पिता पुत्र ते नाहिं निनारा ॥ हम नित बोलें हम नित चालें । हम करता त्रिभुवनको पालें ॥ हम जललें हम करें अहारा । यह सब आतम आप हमारा ॥ जो बूझे सो प्राण हमारे । जो नाहीं तिनते हम न्यारे ॥
समै--जिसका करता और है, निराकार नहिं होय । जो उपदेश दियो सद्गुरुने, जगत कहे सब रोय ॥ अमर तखत अडि आसले, पिंड झरोखे नूर । जाके दिलमें मैं बसूं, सैना लिये हजूर ॥