कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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समै--जहँ देखा तहँ रामको, बिन यक राम न कोय । बातन हमे जगत प्रवोये, बातन राम न होय ॥
रमैनी १८१--देखो देखो यह नर ज्ञाना । आप तजत पूजत पाषाना ॥ कोई सिद्ध करे धुन पाना । कोई रह गोड उलाटे ताना ॥ कोई बैठा तज अन्न अहारा । कोइ बैठा आसन मारा ॥ कोइ करे नित तरपन जापा । कोई धर्म करे तजि पापा ॥ कोई घर तजि भये ब्रह्मचारी । कोई अन्न तजि दूधाधारी ॥ कोइ बैठा तन खास लगाई । कोइ बैठ तन तिलक दिखाई ॥ मठ मंडपा कोइ पढ़ुंचा जाई । कोई सुन्नमें रहा समाई ॥ कोई चढावे उलटा पवना । कोइ सकल तजि भया सु मौना ॥ कोइ श्रुति स्मृति पढे पुराना । कोई तीरथ बरत जो दाना ॥ कोई देश दिसंतर जाई । हरि गुन गाई अन्न न खाई ॥ कोइ करे काया प्रछाला । कोई डाले फिरे कंठी माला ॥ कोइ करता नित राग औ रंगा । कोइ करते देव सुनीका संगा ॥
समै--देखा देखी सब जग भरमा, मिला न सद्धरु कोय । कहें कवीर कर कर नित संशय, जियरा डारा खोय ॥
रमैनी १८२--घट फूटे जल सब बह जाई । काठ जरे पावक सब जाई ॥ फूल सुखाने बास न होई । घटमें चंद न पावे कोई ॥ दूध बिनासे निकसे न घीव । बिन तन कैसेहु रहे न जीव ॥ कांसी फूटे धुन नहि आई । बिजना टूटे पवन नसाई ॥
समै--बिन तन कोई लखे न जियरा, बिन तन झूठा रूप ।
कहें कवीर झूठा किन्ह पंडित, ऐसा ल्याल अनूप ॥
रमैनी १८३--सीते सात भई सितलाई । सीते सीत रोग होय जाई ॥ सीतल मिला सो साधु कहाई । सीत बिहूना साध न पाई ॥ सीतल होय तब सीतल पावे । सीतल होय तब सीत न जावे ॥ सीते सीत अमर नर होई । सीतल राखे ज्ञानी सोई ॥