कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
समै—सीतै मिल सीतल भया, सीतै सित अधिकाय । सीतल जीव विनासिया, सीतलकी दो बात ॥
रमैनी १८४—यहि बिधि बूझो पंडित ज्ञानी । हिय कपारकी दोउ हेरानी ॥ बूच्छ एक फल भये अनंता । माटी एक घर भये अतिअंता ॥ दो संजोग सृष्टि बहुतार्ई । कंचन एक भूषण बहु भाई ॥ सूत एक वस्तर बहु नामा । अन्न एक धरे बहु नामा ॥ अनेक जान जिय एके जाने । अलख पुरुषको जो पहिचाने ॥
समै—गहना एक कनकते गहना, नाम अनेक धराया । कहैं कबीर कंचनका भूषण, एक भया जब ताया ॥
रमैनी १८५—पंछी एक जाकी सब सेना । बिन तन जीव बोले मुख बैना ॥ बिना पंख उड़ सब जग जाई । बिना चोंच जग लीन्हा खाई ॥ वहि पंछीका खोज न पाया । जिन पंछी सब भरमाया ॥ अकास पताल कीन्ह वहि बासा । घट घट वाका भया निवासा ॥
समै—ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, असुर मुनी सुर देव । दृढत दृढत पच मुए, लखा न वाका भेव ॥ तिल जैसी है चिरैया, पंखा नौ नौ हाथ । बकोटन मास परोसन वाकी, पूछ अठारह हाथ ॥
रमैनी १८६—सांचा बनिज करो सब कोई । सांच बनिज लाभ बहु होई ॥ सब गुन भरे जीव सो देवा । निरफल वृक्षकी करो न सेवा ॥ बनखंड मांझ परोजन भाई । शब्द विचार रहो ठहराई ॥ करता पुरुष ते करो सनेहा । देह धरे जनि होहु बिदेहा ॥ जहां बूझ तहैं करता माना । साधते करता नाहिं भिनाना ॥ करता करे सब जीव जनंता । नित समझावे संत अनंता ॥
समै—जो दिल दगा समुद्र है, तेहि बन जाव जिन कोय । सो