कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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दिल सदा बनीजिये, जेहि दिल दगा न होय ॥ जैसा दिल मेरा अहै, ऐसा तेरा होय। कच्चा लोहा ताय करि, संधि लखे नहिं कोय ॥
रमैनी १८७--भौजल नदी महा विकरारा। मन मलाह तहैं खेवनहारा ॥ काम क्रोध दोऊ घटवानी। ते सबकी कर ऐंचातानी ॥ मोह नाव आसा कँडिहारा। लोभ और तूज्जा लहर अपारा ॥ ऐसी नदी नाव यह आई। तेहि चढ उतरे यह जग भाई ॥ उतर उतरके गये तेहि ठाऊं। मिला संदेस न लीना नाऊं ॥
समै--गुन टूटे बेरा बहे, औघट लागे जाय।
कहैं कवार मोर यह विरवा, जड़ पातो गयो सुखाय ॥
रमैनी १८८--वचन हमार तुम सुनो कवीरा। करता सब गुन धरे शरीरा ॥ आदि माया संग केल कराई। केल करत इच्छा जिय आई ॥ दो संयोग भये तिरदेवा। तिनहिन लाई उनकी सेवा ॥ सेवा करत गये जुग चारी। किनहुं न मानी बात हमारी ॥ करताकी कछु खबर न पाई। अंग बिहूना रहा लौलाई ॥
समै--बंस बेलके कारने, करता पास उपाव।
करता छोड अकरताकी नारी, पुत्रते कीन्ह अन्याव ॥
रमैनी १८९--बचन हमारा सुनो अनूठा। वेद किताब कहेको झूठा ॥ वेदको भेद न काहू पाया। झूठा वेद पंडित ले आया ॥ वेद बिहूना न पंडित होई। वेदे जाने पंडित सोई ॥ संध्या तरपन न पंडित जानो। करता लखा सो पंडित मानो ॥ भेद न पाया जग भर्माया। झूठा झगरा पंडित लाया ॥ तेहि झगरा सब जग अरुझाना। देव आदिका मरम न जाना ॥
समै--चारो जुग झगरा गये, झगरा तऊ न छूट।
यह पंडित सब जग भर्मावे, कहे कवीर सब झूठ ॥
रमैनी १९०--बाद विवाद तजो तुम ज्ञानी। बूझो बूझो हमारी