कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
बानी ॥ बिन बूझे नाहीं गुन पैहो । बिन बूझे तुम हरिहिं समेहो ॥ सत् होय तेहि तजो न भाई । औ सत् तजो जन रहो समाई ॥ तजो नहिं बाप तजो नहिं माया । तजो नहिं कर्म तजो नहिं काया ॥ छाडो न आपन लोग व्योहारा । छाडों न यह सुखको दरबारा ॥ बापहिं चीन्हों चीन्हों फिर माई । तातै चीन्हों तत्त्व समाई ॥
समे—जात पात जिन छोडो, छोडो गांव न ठांव । शब्द हमारा न छोडो, जनि फेर धरावो नाम ॥ षट् दरशन भूले जात पांत तज, मिला न सद्गुरु कोय । कहैं कबीर भर्म ऊपजा, थित काहे ते होय ॥
रमैनी १९१—यहि विध बूझो पंडित ज्ञानी । जहां अगिन तहां धूम निसानी ॥ जहां जीव तहं होइहै देही । जहां पुरुष तहं होइहै जोई ॥ घटके आधार नीर घट होय । जहैं देही तहैं जीव संजोय ॥ जहां संशय तहं होइहै रोगा । जहां प्रीत तहैं होय वियोगा ॥
समे—एक एक ते होय नहीं, जो पै दूसर नाहिं ।
दूसर मिला एकै भया, इसमें संशय नाहिं ॥
रमैनी १९२—समझो शब्द होय जिय चैना । जिन परछि पाय न देखो नेना ॥ षट् शास्त्र यह करत लड़ाई । मिमांसा रहा कर्म ठहराई ॥ वेदान्त कहे ब्रह्म जग करता । जैन मते बोध चित धरता ॥ करताको ठहराया अन्याई । मंत्र शास्त्र शिव सकती ठहराई ॥ पातंजली अनेक ठहरावे । झगरा मेटे जो न्याय चुकावे ॥
समे—न्याय करे यह सोय जिन, पाया पुरुष अलेख ।
कहैं कबीर सोई जिव मुकुत, जिन यह किया विवेक ॥
रमैनी १९३—षट् दरशन यह करें बिचारा । निराकार सो सिरजनहारा ॥ निराकार दस दिशा बनाई । दसो दिशामें रहा समाई ॥ पूरव भगति पच्छिम करे ज्ञाना । उत्तर जोग दच्छिन कर्म ठहराना ॥ अग्ने काल वायव्य भई संसा । नित नेम ईसान