भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

पृष्ठ 619, कुल 968 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 619

शब्दावली

(६०५)

नीवंसा ॥ पाताल भर्मे अकाश निराकारा । मृत्युलोकका झूठ षसारा ॥ घरकी नारि तज भया वियोगी । दसों दिशामें भया विरोगी॥ समाधलायजोतको ध्याया। अलख न चीन्हा जीव गँवाया॥

समै--दसों दिसा खाली परी, सुन्न ब्रह्म ठहरान ।

कहे कवीर यह बूझ जगतकी, यहि ठहरा गुरुज्ञान ॥

रमैनी १९४--देव निरंजन पुरुष न दूजा । वेद पुकारे पंडित कर पूजा ॥ मसजिद मुलना करे पुकारा । स्वास वेद करे निरं- कारा ॥ जवाब सवाल न पावे कोई । पुकार पुकार जन्म सब खोई॥

समै--आखंडिया झाई भई, पंथ निहार निहार ।

जीभड़िया छाले परे, अलख पुकार पुकार ॥

रमैनी १९५--षट दरशन मिल समझो बानी । केहि ठहराया आदि भवानी ॥ अलख बड़ा कि, जिन अलख लखाया । करम बड़ा कि जिन ककर कराया ॥ दसो दिशामें दस व्योहारा । दिशा बडीकी बूझनहारा ॥ जो सब बूझे करे करावे । तौन बड़ाकी जो नहि पावे ॥

समै- बीजक बतावे बित्तको, जो विज्ञ गुप्ता होय ।

शब्द बतावे जीवको, बिरला बूझे कोय ॥

रमैनी १९६--नरका ढाढस अगम अपारा । गहे न जाय जाय संसारा ॥ जनक आद जिव देह जराई । सनकादिक बसे बन जाई ॥ रावन आदि जिन सीस कटाया । हरनाकुस आदि जिन उदर फराया ॥ बलि आदिक जिन पीठ नपाई । कस आदि जिन कीन उपाई ॥ गौतम आदि जिन तप कियो भाई । विश्वा- मित्र आदि सृष्टि करि आई ॥ जमदग्नि आदि जिन तप कीना भाई । जड़भरत आदि जिन सरब गंवाई ॥

समै--षट दरशन ढाढस मरे, गन गंधर्व मुनि देव । कहे कवीर