भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

ढाढस तजे, लखे सो अविगत भेव ॥ जेहि करता तिन दीन ढाढस, ढाढस वहाँ न होय । अंग विहूना जो रहे, अहंकार करे सोय ॥

रमैनी १९७--नर सा चतुर न दूजा होई । चतुरे चतुर मिला सब कोई ॥ पाप न चतुर चतुर व्योहारा । चतुर चतुर ठगे संसारा ॥ चतुरे सुत चतुरे मिल जोई । चतुर विहूना मिला न कोई ॥ एक न तजे करे चतुराई । माता एक जोनि ठहराई ॥ चतुरे मिल चतुरा समझावे । चतुरको भेद चतुर होय पावे ॥ एक न चतुर चतुर संसारा । सब चतुरनते करता न्यारा ॥

समै--चतुराईको छोडदे, सद्वरुको मिल बूझ । कहैं कवीर दीपक बिना, अंधेरे परे न सूझ ॥

रमैनी १९८--यह नर उतर पारको जाई । कहो पंडित मोहिं तैं समुझाई ॥ नाव न करिया न खेवनहारा । नदी विकट जेहि बार न पारा ॥ जल अगाध तहैं लहर गंभीरा । औघट घाट सब उतर कवीरा ॥ रैन अंधेरी संग न कोई । आप आप चले सब सोई ॥ दिवस न रजनी पुरुष न नारी । हरि ब्रह्मा तहैं नहि त्रिपु- रारी ॥ सुख ना भोग गुरु ना चेला । पार उतर जग चला अकेला ॥ निरगुन ब्रह्म कछु ना भाई । सुन्न सेयके सुन्न समाई ॥

समै--गुन टूटे बेरा बहा, उठ गया खेवनहार । औघट घाटी नर गया, कासों कहों पुकार ॥ फुलवा भार न ले सके, कहैं सखिन सो रोय । ज्यों ज्यों भीजे कामरी, त्यों त्यों भारी होय ॥

रमैनी १९९--बाट विकट नहिं कोइ बटवानी । तौने बाट चले ब्रह्मज्ञानी ॥ नगर दूर तहैं संग न कोई । गैल सलसली उदो ना होई ॥ भेद अभेद न त्रिगुन माया । पांच तत्त्वकी हती न काया ॥ बोल चाल न पीव न खाई । अंकार नहिं नगरमें रहाई ॥ सुख अनंद ना निद्रा भाई । समझ भूल नहि आवे जाई ॥

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