भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६०७)

समै-चिउँटी जहाँ न चढि सके, राई ना ठहराय । आवागमनकी गम नहीं, तहाँ सकल जग जाय ॥

रमैनी २००-वहाँकी कोई कहे न बाता । सुन्न नगर की जो कुसलाता ॥ पुरुष साथ जरे जो जोई । वहाँकी बात कहे न कोई ॥ निरगुनमें जो जीव समाया । तेहि की खबर न कोई लाया ॥

समै-स्वाद ना पाये कंदका, सब कोइ करे बखान । मीठा मीठा जग कहे, मीठेमें भइ हानि ॥ बात पराई को कहे, परदा लखे न कोय । सहना छिपा पयारमें, को कह बैरी होय ॥

रमैनी २०१-प्रेम प्रीति सुनत जग आया । सरगुन छोड़ निरगुन गुन लाया ॥ निरगुन पदमें बैठा जाई । निरगुन रहा सुन्न ठहराई ॥ निरगुनका गुन लखे न कोई । प्रेम लगाय पुरुष औ जोई ॥ प्रेम प्रेम सकल जग बंधा । प्रेमका गुन कछु लखे न अंधा ॥ प्रेम प्रेम मुवा सब कोई । प्रेम बूझ प्रीतम है सोई ॥

समै-साध बसें हरि भीतरे, हरि बस साधन मांझ । कहे कवीर देश वह ऐसा, जहां भोर नहि सांझ ॥

रमैनी २०२-सब पंडित मिल कहे विचारी । केकर बाप काकी महतारी ॥ हमना कोइके कोइ न हमारा । उड़ जैहै जब बोलन- हारा ॥ सुन्न नगरका पवन यह भाई । सुन्न नगरमें जाय समाई ॥ संग साथ नहि कोई आया । बीचहिं माया बीच मिलाया ॥ यह कह गुरुवा जग भरमावे । सहर छुटाय सुन्न ले जावे ॥

समै-वहाँ की आसा लाय ना, झूठी यहां की आस । यह तज घर बन मांडिया, जुग जुग फिरे निरास ॥

रमैनी २०३-एक दिवस वो एके राती । सात रैन दिन कहो केहि भांती ॥ एक पुरुष वो एके जोई । दो संजोग जगत सब होई ॥ एके प्रान वो एके काया । बहुत जीव घर कहां ते आया ॥ एक ऊखकी एक मिठाई । अनेक नाम कैसे घर भाई ॥

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