भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(६०८)

कवीरपंथी—

समै--नीवके बिचले सब घर बिचला, अब कछु नहीं बसाय । कहै कवीर जो कोइ समझे, तेहिको काल न खाय ॥

रमैनी २०४--कहो पंडित तुम निगम बिचारी । काहे ते पुरुष काहे ते नारी ॥ कहाँ ते पुरुष कहाँ ते राती । काहे ते जात काहे ते पाती ॥ कहाँ ते गुरु कहाँ ते चेला । काहे ते बृच्छ काहे ते भेला ॥ काहे ते हिंदू तुर्क कहाये । काहे ते नरक सरग बतलाये ॥ कहो पंडित अनेक व्योहारा । सत् मितमें है संसारा ॥

समै--एके यह तन जीउरा, एक बृच्छ एक बेल । कहै कवीर एक जो समझे, एक अनंत अकेल ॥

रमैनी २०५--अचरज एक सुनो तुम भाई । बिंद चोराइ स्व- पचका लाई ॥ उठी बेल फल तामे लागा । माय बहिन सब गावें रागा ॥ छठी भरी तहें बाजन बाजे । बंदनवार मंडलमें छाजे ॥ पर लडका मरम काहु न पाया । तैंतिस कोट देवतन खाया ॥ जेहिका सुत तेहि राख दुराई । पर पुत्र पर तात खिलाई ॥

समै- पेडे मूल बिगाडिया, सुत आगे भरमाय । कहै कवीर जेहिका सब कीना, तेहिका कछु न बसाय ॥ आद भई अब नाही, पराबीजपर खेत । कहै कवीर समझे नहिं कोई, विरथा जीव मृग देत ॥

रमैनी २०६--भरत भूत एक खेले भाई । ऐसा भूत लखा न जाई ॥ दिवस एक भूत लपटाना । दूसर होयके पिंड समाना ॥ नावत भौहा करे दवाई । भर्म भया पै भरम न जाई ॥ नित उठ पीर वो देव मनावें । आप भरम आप थित लावें ॥ जहांते भरम उठा यह भाई । तहां भरम वह जाय समाई ॥

समै--मथुरा नगर भरम एक प्रानी, कविराके उपदेश । कहै कवीर वहां कोइ नहीं, झूठा बहुत संदेश ॥