कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(६०८)
कवीरपंथी—
समै--नीवके बिचले सब घर बिचला, अब कछु नहीं बसाय । कहै कवीर जो कोइ समझे, तेहिको काल न खाय ॥
रमैनी २०४--कहो पंडित तुम निगम बिचारी । काहे ते पुरुष काहे ते नारी ॥ कहाँ ते पुरुष कहाँ ते राती । काहे ते जात काहे ते पाती ॥ कहाँ ते गुरु कहाँ ते चेला । काहे ते बृच्छ काहे ते भेला ॥ काहे ते हिंदू तुर्क कहाये । काहे ते नरक सरग बतलाये ॥ कहो पंडित अनेक व्योहारा । सत् मितमें है संसारा ॥
समै--एके यह तन जीउरा, एक बृच्छ एक बेल । कहै कवीर एक जो समझे, एक अनंत अकेल ॥
रमैनी २०५--अचरज एक सुनो तुम भाई । बिंद चोराइ स्व- पचका लाई ॥ उठी बेल फल तामे लागा । माय बहिन सब गावें रागा ॥ छठी भरी तहें बाजन बाजे । बंदनवार मंडलमें छाजे ॥ पर लडका मरम काहु न पाया । तैंतिस कोट देवतन खाया ॥ जेहिका सुत तेहि राख दुराई । पर पुत्र पर तात खिलाई ॥
समै- पेडे मूल बिगाडिया, सुत आगे भरमाय । कहै कवीर जेहिका सब कीना, तेहिका कछु न बसाय ॥ आद भई अब नाही, पराबीजपर खेत । कहै कवीर समझे नहिं कोई, विरथा जीव मृग देत ॥
रमैनी २०६--भरत भूत एक खेले भाई । ऐसा भूत लखा न जाई ॥ दिवस एक भूत लपटाना । दूसर होयके पिंड समाना ॥ नावत भौहा करे दवाई । भर्म भया पै भरम न जाई ॥ नित उठ पीर वो देव मनावें । आप भरम आप थित लावें ॥ जहांते भरम उठा यह भाई । तहां भरम वह जाय समाई ॥
समै--मथुरा नगर भरम एक प्रानी, कविराके उपदेश । कहै कवीर वहां कोइ नहीं, झूठा बहुत संदेश ॥
शब्दावली
(६०९)
रमैनी २०७--पांच तत्त्व गुन एके भाई । रक्त मांस कछु भेद न पाई ॥ नासिका सरवन मुख एके बैना । रोम त्वचा पग कर नैना ॥ रक्त मांस हाड एक गूदा । ब्राह्मण क्षत्री वैश्य वो सूदा ॥ कहो पंडित तुम मोहि समझाई । बरन भेद तेहि देहु बताई ॥
समै--एक वृच्छ बहु फल लगे, कौन बड़ा को हीन । जो जाहीमें संचरे, सो ताही आधीन ॥
रमैनी २०८--पंडित खोल देख तुव ग्रंथा । जग संजोग कामिन वो कंथा ॥ नांदे बिंद समते है भाई । बालक होय विरंच बनाई ॥ नांद बिंद मिल जग भौ पाडा । ते कैसे कहे माटीको भांडा ॥ नांद बिंदकी खबर न जानी । फिर फिर धोखा कहें कहानी ॥
समै--बिन संजोग भया कछु नाहीं, ऐसा दिया संदेश । बिन संजोग जगत सब उपजा, यह आया उपदेश ॥
रमैनी २०९--बिन काजे काया जिव जारी । रट रट राम जनम सब हारी ॥ रटे रैन दिन गुरु समझाई । रटे राम पै राम न पाई ॥ रामहि जाने रहित तब होई । रामहि कहे भये जम लोई ॥
समै--बिन डाई जग हांडिया, सोरठ परिया डांड । बाटनहारा लोभिया, गुरु सो मीठी खांड ॥
रमैनी २१०--ले चोरीटा बाभन लावे । दो कर जोरके देव मनावे ॥ नारसिंह भैरोंके लाई । हनुमान देवी कहवाई ॥ पीर पैगम्बर कहें यह देवा । घर घर होय सबनकी सेवा ॥ दूध पूत मांगे जग जाई । कोई कहें कंथ सुत आई ॥ कोई कछु कोई कछु कहई । जो जो मांगे सो सो लहई ॥ सृष्टि बावरी तेहि दिल लावे । देवी देवका मरम न पावे ॥
समै--राम रहे वन भीतर, गुरुकी पूजी न आस । कहें कवीर पाखंड सब, झूठे सदा निरास ॥
कवीरपंथी-शब्दावली २०
(६१०)
कवीरपंथी—
रमैनी २११--बिस्व रूप नया न होई । बीज वृच्छ गुन नया न कोई ॥ सत मिथ्या कछु नया न जानो । मती अवस्था नया न मानो ॥ इनही निरगुन सरगुन ठहराया । इन्हि कहा इनहीं लौ लाया ॥
समै-निरगुन पुरुष सरगुनका थापा, निरगुन बसा निनार । निरगुनमें यह सब अटके, कहत कवीर पुकार ॥
रमैनी २१२--वोई नैन वो वोई बैना । वोई कंथ कामिन सुख चैना ॥ वोई गुन तत्त्व वोई सब भाई । वोई प्रकृति वोई रस आई ॥ वोई करें औरहि ठहराई । पुरुष विदेही फिर जग समझाई ॥ ऐसी तजे पुरान न पंथा । तत्त्वमा सगरे डारे कंथा ॥ प्रगट जगतमें देत दिखाई । फिर फिर गुरुवा ग्रंथ सुनाई ॥
समै--अपनी सुरत बिसारिके, पढ पढ भया निरवान । जो जौन जाके बस परा, सो ताके आधीन ॥
रमैनी २१३--पांच तत्त्व गुण जीव औ देही । पचीस प्रकृति विकार सनेही ॥ तिनमें चार बरनको भाई । तेहि पंडित मोहि कहो समुझाई ॥ नांद बिंद जब जाय समाया । जीव सनेही भई यह काया ॥ माटीकी काया क्यों ठहरावे । अवरन बरन गुन बरन लगावे ॥ बरन लगाय गहे नोलावे । कहि कहि पंडित जग भरमावे ॥
समै-जीव ब्रह्म पर ब्रह्म ना, अरजन बरन शरीर । हिन्दू तुर्क दोळ मिल भूले, कहत पुकार कवीर ॥
रमैनी २१४--सब कोइ बात नहीं समझावे । कोइ ना मोहि वह देश दिखावे ॥ उदे अस्त लो वाहीकी बातें । हिन्दू तुर्क कहें कुसलाने ॥ सब जग वाहीते लौलाया । कर्ता न लखा जीव भर्माया ॥ षट दरसन छियानवे पारखंडा । लेके प्राण चढे ब्रह्मंडा ॥ वह देसवाकी खबर न पाई । बेद किताब सबन सुनाई ॥
समै-देव रिषी सुर औ गन गंधर्व, जच्छक किन्नर आद । कहें कवीर सब वहीं समाने, कर गुरुवा सो बाद ॥
शब्दावली
(६११)
रमैनी २१५--गुन टूटे बेडा वह जाई। टूटे डोर पतंग न आई॥ घट फूटे जल औघट जैहै। काया गये जिव सुन्न समैहै॥ कला बूके नट जीव गंवाई। आप चीन्हे विन करता न पाई॥ दूध विनासे घिव ना होई। पुरुष विना सुत जने न जोई॥
समै-विन बूझे धोखे गये, तिरदेवा तिरलोक। थित ना पकड़ी सृष्टि यह, यही भया जी सोक॥ बहते बहते औघट गये, पाया घाट ना तीर। बही सृष्टि सब जात है, कासों कहैं कवीर॥
रमैनी २१६--उतपत प्रलय वहांकी न होई। रूप न रेख पुरुष न जोई॥ सूक्ष्म स्थूल न वंहे ठाऊं। अर्थ उर्ध निर्जन नाऊं॥ निराकार निरगुन वह देवा। यह उपनिषद देत है भेवा॥ चारो जुग सेवा चित लाया। निरगुन पुरुष न काहू पाया॥ एक होय तो कह समझाई। सकल सृष्टि ते कहा न जाई॥
समै-नारि वह अंग बिहूना, सुत कन्या भइ चार। माता विगडी सुतन ते, पंडित लेहु विचार॥
रमैनी २१७--जेठ मास जल जाय सुखाई। कुम्भका नीर कहांते आई॥ कहो विष सर्प कहाँते लाया। कहो मक्खी मधु कहांते पाया॥ गये चारा भीतर घांस कराई। च्छीर कहाँते गऊ वह दुहाई॥ अगिन काठमें कहाँते आई। पुष्पमें बास कहाँते भाई॥ सरमें ज्ञान कहाँते होई। करामात कहाँते सोई॥ बनखंड माहिं परा संसारा। हैं सब नेरे कहत निनारा॥
समै-नियरे रहा दूर अब भइ, भई वहांकी आस। कहैं कवीर गया तब तहवाँ, फिरके चला निरास॥
रमैनी २१८--पांच चार बैठे एक तीरा। तहां बसे परमहंस कवीरा॥ पांच चार मिल खेले पाला। तिनका भया हंस यह बाला॥ पांच चारके है यहते जो जो। किया करे इनका वह
(६१२)
कबीरपंथी—
सो सो ॥ पांच चारके जो बस आया। ते करताको चीन्ह न पाया ॥ पांच चार बस लावें जोई। सुबस बसें सो करता होई ॥
समै—पांच चार जग लूटे, कोई लिया न भेद। जग पंडित भर्मावई, पठ पठ चारों वेद ॥ बारह मास जुग चारो, नौ नायकके साथ। कहें कबीर किनहीं नहीं चीन्हा, झगरा चला जग हाथ ॥
रमैनी २१९—बाजीगिर एक बड़ा अन्याई। आप न नाचे जगहिं नचाई ॥ सब जग करे वाहीकी सेवा। घर घर गुरु पुजावें देवा ॥ बाजीगरकी कोइ खबर न पावे। नाचे जग जो नाच नचावे ॥ बाजीगरको लखे जो कोई। सो बाजीगरका गुरु होई ॥ बाजी खेलाय रहा संसारा। बिरला बाजी बूझन हारा ॥
समै—बिना रूप बिन रेख बिन, जगत नचावे सोय। मारे जांचे जो नहीं, ताहि डरे सब कोय ॥ डर उपजा जिय माहिं डरा, डरते परा न चैन। लेखा रामै देन है, यही कहें दिन रैन ॥
रमैनी २२०—तन धरके नर सुख ना पाया। हीरा जन्म बिन काज गँवाया ॥ योगी जंगम भया सन्यासी। जती सती बैराग उदासी ॥ वनखंडी ब्रह्मचारी ग्रेही। जहां लो जीव धरे जग देही ॥ पात पात सब दुखिया भाई। सुखमें दुख जग लीन उठाई ॥
समै—सुखका सागर मैं रचा, दुख दुख मेलो पांव। थित न पकड़ी आपनी, चले रंक औ राव ॥ दुख न हता संसारमें, हता ना सोग वियोग। सुखहीमें दुख लादिया, बोली बोले लोग ॥ सुख विलसो सुख विलसो, काटो भरमकी डोर। कहें कबीर पुकारिके, जगते होर बहोर ॥
रमैनी २२१—सांच कहों तो जग दुख पाई। झूठ कहों तो कहा न जाई ॥ सत् बात झूठ जग जाने। झूठ बात सत्के माने ॥ कहा हमार न माने कोई। पूत धरै है बापकी जोई ॥ सरगुन ब्रह्म
शम्बाबली
(६२३)
निरगुन ठहराई । पिता ते पुत्र होय जग भाई ॥ ससुर बहूका भर्ता होई । बहूकी सौत ससुरकी जोई ॥ बहिन होय भैयाकी नारी । जो इला लौट होय महतारी ॥
समै--ऐसी जगकी चाल, मूल वस्तु माने नहीं । भरम परा संसार, माने जो जाही कहीं ॥
रौनी २२२--कहो पंडित तुम मोहि समझाई । छीर गऊ यह कहाँति लाई ॥ जंत्र होय सब निकसे भाई । मधको कौन दोष लगाई ॥ जहँ लग वस्तु पृथ्वी पर होई । पांच तत्त्व विन उपज न कोई ॥ सो नित खाय सकल संसारा । मद माँस दे दोष निनारा ॥ जोहिके मन जो चाल जो भाई । सोइ कछु करे वहे कराई ॥ पांच तत्त्वका यह विस्तारा । पांचो ते कछु नाहि निनारा ॥ स्वासा बिंद कहो जो नाहीं । वह संयोग वाहिके माहीं ॥
समै--आद अटकमें सब परे, अटक तजे नहीं कोय । कहँ कवीर नर बंधन भया, आवागमन न होय ॥
रौनी २२३--गुरु गुरु करे न गुरुवा पावे । सद्वरु माहीं जगत समावे ॥ सातो गुरुवा मर गये भाई । निहअच्छरमें गये समाई ॥ जब जग मर गये लोक सिधाया । निहअच्छरकी खबर न पाया ॥ यह अजपासे अजपा नियारा । तहाँ उठे अनहद झनकारा ॥ अधर दीप है वाको नामा । जगत मुवा गया उस ग्रामा ॥ बिन कर बिन पग सब कहँ जावे । नैन बिन देखे बिन मुख गावे ॥ बिन हिय बिन सरवन सुनता । रुन झुन सोहँ सोहँ झुंता ॥ बिन नासिका बिन इंद्री भोगा । बिन गुन बिन जिव जोगी जोगा ॥
समै--जोगी ऐसो जुगति बिहूना, तासों जनि करु नेह । कहँ कवीर तुम करता, खोजो काल पुरुष विदेह ॥
रौनी २२४--ऐसी सुनी अकथ कहानी । सुर नर मुनि सब
(६१४)
कवीरपंथी—
गावैं प्रानी ॥ क्षर अक्षर निअक्षर गावे । तत्त्व माहिं निज धर्म बतावे ॥ अमी शरीर नांद औ बिंदा । निहअच्छर पुरुष तहैं करे अनंदा ॥ सुन्न परे निज धाम बताया । निरगुन पुरुष तहां ठह- राया ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर थाके । सुर नर सुनि तहां कोइ न राखे ॥ सब बातनते रहैं निनारा । निहअच्छर पुरुष जान अपारा ॥ हिंदू तुर्क दोऊ यक बानी । निहअच्छर पुरुष न कोऊ जानी ॥ निरगुन सोइ निअक्षर जोई । लखे न वाको चले सब कोई ॥ छर कहे माया अच्छर प्राना । निहअच्छर निरगुन निरवाना ॥ बस्ती उजार उजार बसावे । छर अच्छरकी खबर न पावे ॥
समै--छर अच्छर दोनों नहीं, निहअच्छर निज नाम । सुन्नके परे मुकाम है, सो जानो निज धाम ॥ सुन्न परे एक शिखर है, तापर है एक ठांव । तहांते हंसा आइके, जीव धरायो नाव ॥ शिखर परे निज धाम है, शब्द उठे गंभीर । तहांते हंसा आइके, भये वीर कवीर ॥ घरको छोड़ बाहर चले, निहअच्छर जहं नाम । कहैं कवीर पुकारके, द्वादस गये निज धाम ॥ निहअच्छर निजधाम है, तो सुन्न परे है नाहिं । सुन्न परे निज सुन्न है, निरगुन पुरुष वहां नाहिं ॥
रमैनी २२५--षट् दर्शन मिल कर बिचारा । आपन आपन मत कीने न्यारा ॥ औ पंथ अनेक हैं भाई । अपन अपन मत सबे बताई ॥ अपनी अपनी कथा बतावैं । करताका अस्थान न पावैं ॥ जोगी कहैं जोग करो भाई । अलख पुरुष तब देइ दिखाई ॥ जैन कहैं करो पारस पूजा । पारसनाथ पर देव न दूजा ॥ सन्यासी कहैं तत्त्व जो जारी । सच्चिदानन्द मिले त्रपुरारी ॥ जंगम कहैं करो शंकर सेवा । संकरनाथ पर और न देवा ॥ दरबेस कहैं चार पर आवैं । अल्लह तब लाहूत दिखावैं ॥ ब्राह्मण कहैं वेद जो जाने । वेदकी रीत ते ब्रह्म पहिचाने ॥ यहि विधि कहैं जहां लो पंथा ।
शब्दावली
(६१५)
निरगुन कथ गल डारें कंथा ॥ नौधा भगतिका भेद बतावें । चौका आरति और करावें ॥ जमते तिनका बहुर तोड़ावें । शरीर अर्थ नारियर अरपावें ॥ निहअक्षर निरगुन निरवाना । लैके जाय जवे निनाना ॥ पान परवान सनंद जब पावे । अधर दीप तब जाय समावे ॥ निरगुन निराकार निज जोई । अलख निरंजन जाने सोई ॥ जो परवाना पावे भाई । अमरलोक सोह जाय समाई ॥ सोरहें भान तेज सो होई । वाकी सुरत करे सब कोई ॥ ऐसे कह कह जग भरमाया । सबै जीव यहि भांति ठगाया ॥ वे व्योहार सुने मन माना । यही कहें मोहिं वा घर जाना ॥ घर घर झालर झाझ बजावें । निहअक्षरकी लीला गावें ॥ वहांसे उतर यहां जिव आया । यहां वहां कछु भेद न पाया ॥ कहे मैं कहो सो न समझे कोई । शब्द हमार न चीन्हे लोई ॥ जो कोइ सुरतवंत होय सांचा । काल मिटावे मनसा बाचा ॥ सुवना सेम्हर बहुत दिढाया । ऐसे कह कह मान उतराया ॥ सुवना सेम्हर त्यागो भाई । यही छुगली पर बैठो आई ॥ सुगना सुरत कीन जिव सांचा । सेम्हर त्यागो मनसा बाचा ॥ उड़ सुगना छुगली पर आई । छुगली प्रीत कीन्ह चितलाई ॥ वही सेय पाई तहँ हरुना । जबहिं निरासा उड़ सुवना ॥ ऐसे जीव भूल भटकाया । आरति चौका बहुत कराया ॥ देहै त्याग जैहै यहि लोका । सत्तनाम सुमिरो नहिं सोका ॥ बारह बाट कीन जिव भाई । समता नाहीं लोग लुगाई ॥ झूठी बनिज करो मत कोई । सांचा शब्द परखो निज सोई ॥ जीवन भई भर्मकी फांसी ॥ सुये मुक्ति कौन उदासा । अच्छर अमर वो छर है माया । यहीते सब जगत डराया ॥ ज्योंका त्यों छर अक्षर भाई । बिना बूझ सब जगत डराई ॥ ये तो सबे चढे ब्रह्मण्डा । भये झूठ सबही पाखण्डा ॥
(६१६)
कवीरपंथी—
समै--साहेब अंते है नहीं, जेहि सेवे संसार। तुझही ते साहेब तुझहीते बंदा, कहैं कवीर पुकार॥ ऊपरकी दोऊ गई, हृदयकी गई हेराय। जाके चारो लोचन गये, तासो कहा बसाय॥ सेम्हर करे सुगना, छुगले बैठा जाय। सीस पटके सिर धुने, ये उसहीका भाय॥
रमैनी २२६--अगम अगोचर कहैं सब ज्ञानी। विरला बूझे हमरी बानी॥ कवीर कवीर कहैं सब कोई। जहँ लग सृष्टि कवीरा सोई॥ तामे अनेक विवेक समाना। सो कवीर जिन रामहिं जाना॥ अल्लह राम न दो हैं भाई। अल्लह रामने सृष्टि उपाई॥ एक कवीर समुद्रके तीरा। जलहल बूड़ा एक कवीरा॥ दोनों एक कवीर कहाया। वैष्णव एक कवीरा गाया॥ एक कवीर कासीमें रहिया। अनंत कवीरको तेरा सहिया॥ अनंत बीज करता कहवावे। देश देश अपनी मत गावे॥
समै--तुर्की अरबी फारसी, संस्कृत उनमान।
अपनी अपनी भाषा, सब कोई करे बखान॥
रमैनी २२७--तीन काल बिच खेलो भाई। इक्कीस छै सोलह ठहराई॥ ताते अठोत्र जाप कहाया। नारी पुरुष यहि देख भुलाया॥ छैसौ छत्र जाप जो होई। एक एक ते अंस मिले सोई॥ यह अजपाका जाप विचारा। एक जपत हैं तत्त्व निरंकारा॥ अघर दीप तेहि साहेब खेला। वहाँ करें नर नारी मेला॥ तेहि मिल सुन्न यह सब जग धाया। तार एक बिच अगम बताया॥ अजपा अनहद रहे भुलाई। येहीकी गर्ज यहीकी झाई॥
समै--बिनरी बरसे सावन, त्रिबेनीके घाट। झाई झलके सुख करे, पाडीजीकी बाट॥ तन छूटे जो तन लहे, आवागवन न होय। कहैं कवीर यह भरम है, यह वह मेटो दोय॥
रमैनी २२८--अघर दीप तेहि नाम धराया। जीव ब्रह्म पर
शब्दावली
(६१७)
दूजा गाया ॥ तत्त्व वित्त ते गावै न्यारा । पारब्रह्मते नाम अपारा ॥ धर्मदासको बहीया कीन्हा । तेहि संग जीव पायन लीन्हा ॥ जमते तिनका टोरी भाई । सत्तलोककी पैरी पाई ॥ तब वह हँसा लोक सिधारा । भौसागरते भया निनारा ॥ यह तन झूटा काम न आवे । सुकरित मिल तब लोक सिधावे ॥ ऐसा अचरज एक अनूठा । सबका करता नाम सुरूठा ॥
समै-अर्ध उर्धमें कहु नहीं, अरध सुन्नका नाम ।
कहै कवीर आसा जनि बांधो, झूठा अधर सुकाम ॥
रमैनी २२९-अधर सुकाम जगतमें छाया । तीन छोड चौथे लौलाया ॥ अमी शरीर तेहि अगर सुवासा । अधर लोकमें करे विलासा ॥ सुच्छम शरीर औ सुच्छम अहारा । हँसा खेले पुरुष दरबारा ॥ हँसा हँसन दर्शन पाये । मिटी काग गत हँस कहाये ॥ चौबिस पारस सात सिकारी । भिन्न भिन्न तिनकी गत न्यारी ॥ बिन बूझे हुलसे सब कोई । हुलस हुलस जिय डारा खोई ॥
समै-जड काटो ता बृच्छकी, जहँ हँसाको बास । कहै कवीर हँस सब जर गये, करके सुखकी आस ॥ हँसा तुम जिन जावो, अधर दीप निज धाम । कहै कवीर उजाड पडा, बूझो आतमराम ॥
रमैनी २३०-तन चौका सतसुकरित वीरा । अधर जोत जहँ जरे कबीरा ॥ नरियर मोरा रेखा साता । तेहि नारियर कीन्ह जम घाता ॥ पांचो सीखी जर गये भाई । जरा मरण कैसे अंक मिटाई ॥ पानमें अंक लिखे कडिहारा । तेहिकी आस उतरे संसारा ॥ धर्मदास सो सुनो हमारी । हमरी गत मत सबते न्यारी ॥ चार धाम जहँ पुरुष अपारा । खोजे हँसा करें दीदारा ॥ यहि बिध भूले सब कडिहारा ॥ काया छोड मरा संसारा । गुण औ तत्त्व न तन मन भाई । सुछम रूप सो पुरुष सवाई ॥
(६१८)
कवीरपंथी-२
समै-सुछम २ जनि कहो, सुछम जीका काल । कहैं कवीर करता लखो, सुछम है जंजाल ॥ कहा दीप कहा नाम है, कहा पुरुषका गांव । कहैं कवीर जनि भरमो, वहां जीव न ठांव ॥
रमैनी २३१--ठांव ठांव सबही मिल करिया । ठांव न चीन्हा भरमि भरमि परिया ॥ जैसे कन्या गुडिया बनाई । तेहि संग बहुविध केल कराई ॥ विरहिन सुता पियाका नाऊं । दूंदत फिरी सब ठावन ठाऊं ॥ प्रेम भगति ते पिया बोलावे । पिया बोलावे पीव न आवे ॥ पिय पिय करत अपन जिव दीन्हा । पियाका दरसन कबहुं न कीन्हा ॥ आरत मंगल पिया लडावे । ब्राह्मण सो जो दास कहावे ॥ कोटिन ब्राह्मण बहे अपारा । कोटिन दास भये संसारा ॥ गत मत पुरुषकी नाहीं पाई । भगति विरहिनी प्रेम लगाई ॥
समै--विरहिन साजे आरती, कंथ पियारे आव । चाहत पिया जो ना मिले, कहो ब्राह्मणको भाव ॥ विरहिन हती तो क्यों ना गई, पिय अपनेके साथ । झूठे नेह सनेहरा, मरे मरोरे हाथ ॥ आसा ऐसी जगतकी, ज्यों विरहिन पिय आस । सेवा करे सब-नकी, सोये पियाके साथ ॥
रमैनी २३२--चंदा झलके जलके माहीं । जलमें झलके दूसर झाई ॥ दोनों झूठे साँचा चंदा । सुख तत्त्व तब होय अनंदा ॥ सुख तत्त्व रहे नहिं भाई । कीहै चंदा जो जाय समाई ॥ दुतिया भया वहे दुखदाई । सोइ वहे जो देत मिटाई ॥ जब लग चार ठौरमें खेले । तब लग भरमत फिरे अकेले ॥ तत्त्व नास जनि करो रे भाई । तत राखे बिन जम ले जाई ॥ तत्त्व बित्तका एके भावा । परब्रह्म सो ब्रह्म कहावा ॥ तत्त्व बित्त ते जो है न्यारा । सो नाहीं तुम्हारो करतारा ॥
समै-आसा झूठी मुक्तिकी, झूठा पुरुष दरबार । कहैं कवीर खोजो तुम करता, जिन दूंदो दीदार ॥
शब्दावली
(६१९)
रमैनी २३३-दीदार दीदार कहे सब कोई। दीदार कहे दीदार न होई ॥ को तुझसे दूजा है भाई। जेहि दीदार प्रेम चितलाई ॥ अलम जाहद आरफ जोई। आशक माशूक दीदारको होई ॥ आशिक इश्क समाना भाई। प्रेम समाना प्रेम समाई ॥ दूजे प्रकृति कहो जो कोई। करता माया एके होई ॥ विन माया करता नहीं भाई। विन करता नहीं माया आई ॥ जो ब्रह्मा पारब्रह्म सोई। ब्रह्माते न्यारा पुरुष न जोई ॥ सब गुन भरा यह करता तेरा। कहा मान तैं चेत सवेरा ॥ तेरी सुरत जो सुरत समाई। जरा मरन कहो को फिर आई ॥ जेहि कारन यह सब जग नाचा। ना वह मिला न वहिते बांचा ॥
समै--जो न्यारा सो बैरी तेरा, माया ब्रह्म करतार। कहे कवीर समझो तुम ज्ञानी, मानो कहा हमार ॥ तीन मारे तीन राखे, आठ मारे काठ। लौट हंसा नीर पीवे, सुखभनाके घाट ॥
रमैनी २३४--रहे समाय जो सुरता कोई। आवा-गवन न ताकर होई ॥ बाहर मरे न सुरत समावे। ताते फिर फिर आवे जावे ॥ अद्युधात ले रहे समाई। जुग जुग सो सुखराज कराई ॥ तत्त्व मध्य त्रिभुवन समाना। तत्त्व मध्य है पवन औ प्राना ॥ बिहार पवन कहाँ ते भाई। जहाँ ते पवन जीव ले आई ॥ बाहर भीतर सोई पवना। समझ न परे कहे आवागौना ॥ एक पवन ते अनेक विचारा। तत्त्व पांचका है टकसारा ॥ छत्तिस नारि पचासी पवना। आपन आपन गुन लावे तौना ॥ पंचते दूँठ कर एक निकारी। मूल तीन ऐसा टकसारी ॥
समै--समुद्र समाना बुंदमें, बूंद मध्य बिस्तार। कहे कवीर भेद करताका, बूझो यह टकसार ॥
रमैनी २३५--तत्त्व बित्त हमरी टकसारा। तेहिका सब जग
(६२०)
कवीरपंथी-
करो बिचारा॥ तत्त्व बित्त ते न्यारा जोई । जानो काल तुम्हारा सोई॥ राखे तत्त्व तो तत्त्व समाई । तत्त्व बिना जीव मर जाई॥ देखो तत्त्वमें बित्त समाना । तत्त्व बित्त काहू नहीं जाना॥ तत्त्व बित्त आगम टकसारा । तत्त्व बिना नहीं करता न्यारा॥ तत्त्व बित्तका जाने भेवा । आपहिं करता आपहिं देवा॥
समै--तत्त्व बित्त निज सार है, झूठा अपरंपार । पार उतर कोइ ना गया, परख देख टकसार॥ खंड अखंडित खंड है, खंडित दूजा खंड । कहें कवीर घरमें रहो, खाली है ब्रह्मंड॥
रमैनी २३६--अच्छर पांच ब्रह्मंड अपारा । तिनही बीच कवीर बिचारा॥ तेहिमें अक्षर एक जो सुकता । तेहिका जाने कोई जुगता॥ मा-के ऊपर क-के नीचे । परखो ज्ञानी तत्त्वके बीचे॥ दूसरे ठौर न वहाँ पर कोई । यह बिध जाने सुकता सोई॥ ना जाने यह कोई भेदा । सब जग गावे चारों वेदा॥ बीजहिमें अंकूर समाया । सो अंकूर बीज ले धाया॥ करता माया बीज अंकुरा । बूझो ज्ञानी यह मत पूरा॥ बीज ते रहा अंकूर निनारा । ऐसा देखो राम बिचारा॥ है सबमें और सबते न्यारा । अगम अगोचर कथा हमारा॥
समै--सरवन्न ज्ञान प्रज्ञान नहीं, देखो तत्त्व बिचार । पछा पछीमें जन परो, मानो कहा हमार॥ आदि अंत दो मत हैं, तिनमें मता अनंत । कहें कवीर दोनोंके मध्यमें, देखो हमारा तंत॥
रमैनी २३७--तत्त्व बित्त जो हमरा पावे । चौरासीका अंक मिटावे॥ द्वादस सोडस अष्टादस सोई । सहस्र दो दल औ चतुर विगोई॥ यही नहीं और जो न्यारा । तेहि गुरुवाका झूठ बिचारा॥ झूठे झूठ मिला सब कोई । झूठी बात बहुत सुख होई॥ सांच कहो तो कहा न माने । बूझ न परे तब झगरा ठाने॥ झगड झगड सब मर गये भाई । झगड झगड सब वहीं समाई॥
शब्दावली
(६२१)
समै--मता अखंड पारखंड छियानबे, देखो अपने नैन। कहैं कवीर दृशे बिना, जनि पतियाओ बैन॥ जब आपन करता लखो, सरवह होय तब ज्ञान। कहैं कवीर करता भया, मेटा सरब व्याखान॥
रमैनी २३८--देह धरे विदेह कहावे। करम करे करता न कहावे॥ जगमैं रहे औ रहे निनारा। ब्रह्मांड मध्य है नाहिं बिचारा॥ ज्ञान ध्यानमें नाहीं आवे। इच्छा करे न इच्छा पावे॥ सब कछु करे वो नाहीं करता। ना कछु धरे वो नाहीं धरता॥ माता पिता न बंधू भाई। सुख संपतमें रहा समाई॥ है संयोगी फिरे बियोगी। सदा अनंद फिरे कह रोगी॥
समै--देखो तत्त्व विचारिके, केहि घरमा है करतार।
कहैं कवीर सदा तुझहीमें, कैसे भया निनार॥
रमैनी २३९--निनार निनार कहैं सब कोई। कोइ न देखे वह कैसे होई॥ अविगत पुरुष जो अगम अपारा। परले उतपत नाहिं दिदारा॥ अष्ट लोक सब जगत बतावे। पांच देवका भाव ले आवे॥ करनी सर ठहरावे भाई। जो नाहीं तासों लव लाई॥ दोमें अटका सब संसारा। लोकालोक जहां बिस्तारा॥ लोका लोककी गत है न्यारी। पारस पिया निरंजन धारी॥ दिरग औ बैराग अपारा। स्थूललिंग औ जोत विचारा॥ मुच्छम औ दस अंगुल कहाया। चतुरभुजी अंगुष्ठ पर लाया॥ सहस्रा रिषि औ अवगत देवा। ताते भया सकल यह भेवा॥ नेत नेत करके ठहराया। निराकार आकार बताया॥
समै--कर बियोग वहि पुरुषको, छांडो यह संसार।
कहैं कवीर न हाका गया, आपन क्यों न बिचार॥
रमैनी २४०--महम्मदका है यह फरमाना। एक दिन क्यामत होय निदाना॥ करनायत निकसे अवाज अपारा। रुईसे उड़ई
(६२२)
कवीरपंथी-
बृच्छ पहरा ॥ हफ्त जमीन हफ्त असमाना । धूमसे उडे यही फरमाना ॥ कापर तरुत रहे ठहराई । कहाँ उम्मत जो रसूल छोड़ाई ॥
समै--ले फरमान महम्मद आये, उम्मत किया कबूल । कहो अल्लह क्योंकर रहे, बिना साख बिन मूल ॥ आग दोनों घर लागी, कैसेहु नाहि बुझाई । कह कवीर ये दोनों अगुवा, दीन्हा जग भर्माई ॥ बैकुंठ धाम ब्रह्मा रचा, भिस्त महम्मद कीन्ह । ब्रह्मा दीये ब्राह्मनन, महम्मद तुर्कन दीन्ह ॥
रमैनी २४१--दीनके काजे अल्लह पठाया । ले फरमान महम्मद आया ॥ तिन फिर दुसरी राह चलाई । रोजा नमाज़ बांग ठहराई ॥ कलमा कुल मंत्र ठहराया । देहरा फोर मसजिद उठवाया ॥ तिन फिर कीन्हा मक्का मदीना । किबला कावा कुरान सफीना ॥ तिन फिर कीन्हे चार जो यारी । हराम हलाल औ पाये चारी ॥ सुरगी बकरी घोडा गाई । इनके तिन तकवीर बताई ॥ तिन फिर फिर हिंदू तुर्क बताया । हिंदू पर जजिया फरमाया ॥ तिन तन छूटे गोर गड़ाया । पीर औलिया अंबिया ठहराया ॥ तिन बेचून अल्लहको कीन्हा । आप चून हुकुम यह दीन्हा ॥
समै--अल्लहके दोस्त महम्मद, ते लाये फरमान । मुसलमान होवो सब कोई, पेट ते हो मुसलमान ॥ अल्लहका नूर पैगम्बर, नबीका नूर जहान । मुसलमान भिस्त जायगे, दोजख परे हिंदुवान ॥ खुदा महम्मद एक है, सबही कहो विचार । सबे परे भर्म जालमें, कहै कवीर पुकार ॥
रमैनी २४२--अल्लह एक महम्मद जाना । अल्लह ते दूर रहा हिंदुवाना ॥ ब्राह्मन ब्रह्म मिले सब जाई । तीन बरन अधविच रह भाई ॥ अल्लह मुकाम पश्चिमै कीन्हा । राम मुकाम पूरबमें लीन्हा ॥ दिवाले बसे चल सालिग्राम । मसजिद अल्लह किया
शब्दावली
(६२३)
मुकाम ॥ पूरब राम पश्चिम रहिमाना । और मुलक किसका अस्थाना ॥ पूजा रचा बहुत चितलाई । राम न कबहुँ दृष्टि दिखाई ॥ रोजा निमाज मरा तुर्काना । कबहुँ न मिला नबी रहमाना ॥
समै--धोखे धोखे सब जग बीता, दो अगुवाके साथ ।
कहैं कवीर पड़े जो विगारी, अब काहे न आवे हाथ ॥
रमैनी २४३--वेदका भेद न काहू पाया । कहो पंडित जीव कहाँ ते आया ॥ करताका किस घर विसरामा । काया छूटे कहाँ मुकामा ॥ काजी मुलना पढे कुराना । ब्राह्मन भुले पढे पुराना ॥ अपने करताकी खबर न पाई । माया भरम रहा लौ लाई ॥ कर्मके बंधन तजे न कोई । ताते बिनसे पुरुष औ जोई ॥
समै--लिखा पठीमें सब परे, यह गुन तजे न कोय । सब परे भरमजालमें, डारा यह जिव खोय ॥ कुसल बिनासी सब दुनिया, दुनिया कुसले लाग । कहैं कवीर अब ना बूझे, घर घर लागी आग ॥
रमैनी २४४--सब तुर्कन मिल कीन्ह विचारा । लाख पैगम्बर भये असी हजारा ॥ तिन पर स्वतंम महम्मद पाई । किताब कुरान अल्लाह पठाई ॥ अमर नाहीं औ चार मुकामा । वस्ती छोड़ उजार विसरामा ॥ जबरील हुवा उनका दरमानी । यहाँ वहाँकी कहे कहानी ॥ दो इमाम भमे चार यारा । लौलाकलमाका भया षसारा ॥ जग करता बेचन कहायो । बीच कुरानके यह लिख आयो ॥ यहाँकी आस झूठी सब भाई । वहाँकी आस लिया तिन खाई ॥
समै- सबके पीर महम्मद, मोमन तिनके सुरीद ।
दोस्त अल्लहके ये भये, और जहान नादीद ॥
रमैनी २४५--काजी एक रवायत लाया । अजरोस सो बुत त्रास कहाया ॥ तिसका बेटा हुवा खलीला । मुसलमान भया कहे दलीला ॥ यह देखो भूलनकी बात । एक घरमें दो धरे जाता ॥ आगमें परा भया गुलजारा । गिरोह ले गया दरिया पारा ॥
(६२४)
कबीरपंथी-
इदेहद मरा सब भाई ॥ अल्लहकी गत किनहुँ न पाई ॥
समै--कहते कहते वह गये, मिला न बहुरि संदेश ।
वाही संधिमें सब परे, अगुवाके उपदेश ॥
रमैनी २४६--जब अल्लाह तूफान उठाया । तबहिँ महम्मद किस्ती लाया ॥ बैठ किस्ती सब उतरे पारा । तूह भया सो खेवनहारा ॥ पुत्र भया उसका अन्याई । तूफान उठा तेहि दिया जुवाई ॥ कहर खुदाका जिस पर आवे । तिस बंदेको कौन बचावे ॥ यह आयेत कुरानमें आई । मुसलमान सब रहो लौलाई ॥
समै--इनही बातन सब जग भूला, करता परा न चीन्ह । पढ पढ बहुत किताबें जोही, अपना जी पै दीन ॥ जिस वृच्छका बीज था, लखावृच्छनहिं सोय । अकरताकरता सब मिले, डारा जियरा खोय ॥
रमैनी २४७--यह आयत कुरानमें आई । जहांते आया तहां समाई ॥ वह साहेब हम बंदा भाई । लाहुत ते सृष्टि किया पैदाई ॥ लम यलद व लम युलद कहाया । वह बेचून न लखे लखाया ॥ उसका नूर सकल पर छाया । वहांका थाहिं न किनहुँ पाया ॥ बहुर वहांकी हुकुम ते आया । कुन फैकुन कर पैद कराया ॥
समै--बाहर कोई ना हता, जो कछु लखे नमून । कहें कवीर वह भटकके, नाम धरा बेचून ॥ सब कहते बेचून है, नाहिं बसे वह सुन्न । कहें कवीर कहत न बने, यासे गुन गुन ॥
रमैनी २४८--ऐसी सुनी अकथ हम बानी । काजी मुलना कहें कहानी ॥ यह बेटा अल्लहको कहाया । कुमबइ जनी कहि सुवा जिलाया ॥ सो बहगये चौथे असमाना । खात मुलना करें बखाना ॥ मूसाते नूर अल्लह छिपाया । लितरानीका नूर दिखलाया ॥ देख नूर भया बेहोसा । अकल फहम सब भूले मूसा ॥ जो अल्लहका बंदा कहाई । सो बंदा वह भिस्तमें जाई ॥ यही बात तुरुक सब गावें । करताका कछु भेद न पावें ॥
शब्दावली
(६२५)
समै--एकके ऊपर एक भया, अपनी चलावे चाल । कहें कवीर किन्हू नाहैं भेजा, यह है अद्वुत रुयाल ॥
रमैनी २४९--तालिव पूजे देव औ देवा । वह परतीत करें नित सेवा ॥ खतमुन्नबी भये तेहि ठाई । सात तवककी छवीना भाई ॥ जाही खतना सब कछु जानी । दिलते बाहर कछु न आनी ॥ जब जबरईल अल्लहने पठाया । महम्मद सोई आयत ले आया ॥ और हुकुम अछाहने दीन्हा । खतामन्नबी बूझ तब लीन्हा ॥ अब प्रगट होय खेलो भाई । किताब कुरान मददकी आई ॥ हिंदू मार करो तुरकाना । करामात सो तन्द ठहराना ॥ यह अल्लह फरमान पठाया । लायहला कलमा लिय आया ॥ एत काद सबे मिल कीन्हा । अकलका कलमा महम्मद दीन्हा ॥
समै--यह सब काम मूसाके जानो, बूझे बिरला कोय । सही बात सबे पतियाना, जीव अमर कैसे होय ॥ तौरीत अंजील मंस्ख करी, ठहरा एक कुरान । ता घर अल्लहको ठहराया, जो है यही इमान ॥ अल्लह पैदा करनेहारा, सो बेचून निदान । कहें कवीर अल्लह यह नाहीं, ठहरा मकां लामकान ॥
रमैनी २५०--रोसन किताब किताब कुराना । सीसी पारेकी आना ॥ अलाह संवासी तहां लिख आई । रोजा नमाज और कछु भाई ॥ सरीयत मिछत नासूत तरीका । हकीकत मारफत लाहूत जबहूता ॥ एक मकानके मकान बहु कीन्हे । नबी खुदाके पाट लिख दीन्हे ॥ तिनमें अटका सब तुरकाना । मूसक भेद विलार न जाना ॥
समै--ठौर ठौर सब छोडके, गया जहां लाहूत । कहें कवीर दोनों पछ लूटे, अंसा अंतमें दूत ॥
रमैनी २५१--यह देखो अचरज तुम भाई । किताब कुरान ले
(६२६)
कवीरपंथी-
जगत बताई ॥ बीज दरुक्त का है लाहूता । साखा वृच्छ कहे जबरूता ॥ मलकूत तिसका पल्लव लिख आया । फलवृच्छका नासूत कहाया ॥ नासूत अछहकी कहे जवाना । सो नासूत अटका तुरकाना ॥ ऐसी खबर जबरईल ले आया । पट पट सुलना सब भरमाया ॥
समै--वृच्छ नहीं डार फल लागे, चाखत सब संसार । कहैं कवीर वृच्छ वह अविगत, नाना फल अधिकार ॥ बीज वृच्छ दोनों नहीं, धरती नहीं गाँव । तेहि वृच्छ ते वृच्छ ऊपजे, सो फैले सब ठाँव ॥
रमैनी २५२--ले किताब काजी समझावे । रुह चार अछाहकी बतावे ॥ जमाती एक दूजे हैवानी । नवाती बहुर भये इनसानी ॥ अजब रूयाल अल्लह जब कीन्हा । जीव एक चार जिव दीन्हा ॥ पानी ते जीव रुह नावाती । जीव पवनते रुह जमाती ॥ दौडत जीव रुह हैवानी । लकम खुदाये रुह इंसानी ॥
समै--महम्मद बैठे मक्केपर, दिया यही उपदेश ।
सब जीवनमें खाकी प्यारा, दूर बंदगी भेस ॥
रमैनी २५३--नासूत मुकाम सरेका भाई । मलकूत तरीकत सब समझाई ॥ जबरूत हकीक भया संदेशा । लाहूत मारफत भया उपदेशा ॥ जिक्र तरीकत शुक्र शरीकत । फकर मारफत फिकर हकीकत ॥ प्रथम मुकाम सरेका भाई । दुसरी हकीकत लिया अर्थाई ॥ तिसरा मारफत कहे सब कोई । चौथा हकीकत दिया सोई ॥ इनकी बातनमें सब भूला । भया न लाभ गंवाया मूला ॥
समै--करता अपनेको नहीं चीन्हा, चला जहाँ नहीं कोय ।
बूझ समानी नाहिमें, डारा यह जिव खोय ॥
रमैनी २५४--यह सब कोई कहैं संदेशा । चार चार का दिया उपदेशा ॥ पहले तर्क नफसकी करे । तर्क खलक दूजी दिल धरे ॥
शब्दावली
(६२७)
तर्क दुनियाकी करे बिचारी । तर्क आखिर करे नर नारी ॥ दो वजूद आदमके गावे । बाज बिलवजूद सुमकीन बतलावे ॥ सुमकिन छोड वाजिबमें जाई । वाजिब जाके फेर न आई ॥
समै-बैठ सुकाम लाहूतके, बेचून दिया उपदेश । करता परा न चीन्हके, झूठा दिया संदेस ॥ झूठे संदेस बहुत सुख उपजा, करके गरव गुमान । कहें कवीर गये सब धोखे, फिरी मुहम्मद आन ॥
रमैनी २५५-तिहेत्तर फिरके करे विचारा । लामान लाहेको वारा ॥ आप आपमें झगरा ठाना । अल्लहका भेद काहु न जाना ॥ झगरा करत गये जुग चारी । किनहु न मानी बात हमारी ॥ रुह नफस निदी मारक आई । रुह इनसान खेतलाफ कहाई ॥ रुह नवाती लिया अरथाई । जमाती हिया बसाया गार्ई ॥ दिलमें बसे रुह हैवानी । ले किताब वह कहे कहानी ॥ लामातते आया जब रूत । जबरूत ते फिर आया मलकूत ॥ मलकूत ते लाहूत हिराना । लाहूत ते आया नासूत पयाना ॥ अर्जर भया फिर फकरमें आया । फकरे सुवा न करता पाया ॥
समै-पीर पैगम्बर सब चले, जहं लाहूत सुकाम । कहें कवीर उपदेश नवीके, जीव गये बेकाम ॥ रसूल गया लाहूतको, उमत्ता पाछे लाग । जीव करताके सब मरे, बिरले बांचे भाग ॥
रमैनी २५६-आदम सबका पिता कहाया । तीन गेहूँ भिस्तमें खाया ॥ किया गुनाह जमीं पर डारा । आदम दौवा हुवा कर- तारा ॥ तिसके भये दो बेटे भाई । एक सुन्नी एक कुफर चलाई ॥ ऐहमकाथ जो किया अजावा । यही खबर दिया कुरानकी तावा ॥ वही असमानते जबरील ले आया । तिनको नवीने जन्म कराया ॥ कुल आलमको दिया उपदेश । दुनिया चली वाहिके भेषा ॥
समै-आदम अल्लह दो कहे, आव अनासर नाह । रुह फिरस्ते