कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 629, कुल 968 में से
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निरगुन कथ गल डारें कंथा ॥ नौधा भगतिका भेद बतावें । चौका आरति और करावें ॥ जमते तिनका बहुर तोड़ावें । शरीर अर्थ नारियर अरपावें ॥ निहअक्षर निरगुन निरवाना । लैके जाय जवे निनाना ॥ पान परवान सनंद जब पावे । अधर दीप तब जाय समावे ॥ निरगुन निराकार निज जोई । अलख निरंजन जाने सोई ॥ जो परवाना पावे भाई । अमरलोक सोह जाय समाई ॥ सोरहें भान तेज सो होई । वाकी सुरत करे सब कोई ॥ ऐसे कह कह जग भरमाया । सबै जीव यहि भांति ठगाया ॥ वे व्योहार सुने मन माना । यही कहें मोहिं वा घर जाना ॥ घर घर झालर झाझ बजावें । निहअक्षरकी लीला गावें ॥ वहांसे उतर यहां जिव आया । यहां वहां कछु भेद न पाया ॥ कहे मैं कहो सो न समझे कोई । शब्द हमार न चीन्हे लोई ॥ जो कोइ सुरतवंत होय सांचा । काल मिटावे मनसा बाचा ॥ सुवना सेम्हर बहुत दिढाया । ऐसे कह कह मान उतराया ॥ सुवना सेम्हर त्यागो भाई । यही छुगली पर बैठो आई ॥ सुगना सुरत कीन जिव सांचा । सेम्हर त्यागो मनसा बाचा ॥ उड़ सुगना छुगली पर आई । छुगली प्रीत कीन्ह चितलाई ॥ वही सेय पाई तहँ हरुना । जबहिं निरासा उड़ सुवना ॥ ऐसे जीव भूल भटकाया । आरति चौका बहुत कराया ॥ देहै त्याग जैहै यहि लोका । सत्तनाम सुमिरो नहिं सोका ॥ बारह बाट कीन जिव भाई । समता नाहीं लोग लुगाई ॥ झूठी बनिज करो मत कोई । सांचा शब्द परखो निज सोई ॥ जीवन भई भर्मकी फांसी ॥ सुये मुक्ति कौन उदासा । अच्छर अमर वो छर है माया । यहीते सब जगत डराया ॥ ज्योंका त्यों छर अक्षर भाई । बिना बूझ सब जगत डराई ॥ ये तो सबे चढे ब्रह्मण्डा । भये झूठ सबही पाखण्डा ॥