भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

समै--साहेब अंते है नहीं, जेहि सेवे संसार। तुझही ते साहेब तुझहीते बंदा, कहैं कवीर पुकार॥ ऊपरकी दोऊ गई, हृदयकी गई हेराय। जाके चारो लोचन गये, तासो कहा बसाय॥ सेम्हर करे सुगना, छुगले बैठा जाय। सीस पटके सिर धुने, ये उसहीका भाय॥

रमैनी २२६--अगम अगोचर कहैं सब ज्ञानी। विरला बूझे हमरी बानी॥ कवीर कवीर कहैं सब कोई। जहँ लग सृष्टि कवीरा सोई॥ तामे अनेक विवेक समाना। सो कवीर जिन रामहिं जाना॥ अल्लह राम न दो हैं भाई। अल्लह रामने सृष्टि उपाई॥ एक कवीर समुद्रके तीरा। जलहल बूड़ा एक कवीरा॥ दोनों एक कवीर कहाया। वैष्णव एक कवीरा गाया॥ एक कवीर कासीमें रहिया। अनंत कवीरको तेरा सहिया॥ अनंत बीज करता कहवावे। देश देश अपनी मत गावे॥

समै--तुर्की अरबी फारसी, संस्कृत उनमान।

अपनी अपनी भाषा, सब कोई करे बखान॥

रमैनी २२७--तीन काल बिच खेलो भाई। इक्कीस छै सोलह ठहराई॥ ताते अठोत्र जाप कहाया। नारी पुरुष यहि देख भुलाया॥ छैसौ छत्र जाप जो होई। एक एक ते अंस मिले सोई॥ यह अजपाका जाप विचारा। एक जपत हैं तत्त्व निरंकारा॥ अघर दीप तेहि साहेब खेला। वहाँ करें नर नारी मेला॥ तेहि मिल सुन्न यह सब जग धाया। तार एक बिच अगम बताया॥ अजपा अनहद रहे भुलाई। येहीकी गर्ज यहीकी झाई॥

समै--बिनरी बरसे सावन, त्रिबेनीके घाट। झाई झलके सुख करे, पाडीजीकी बाट॥ तन छूटे जो तन लहे, आवागवन न होय। कहैं कवीर यह भरम है, यह वह मेटो दोय॥

रमैनी २२८--अघर दीप तेहि नाम धराया। जीव ब्रह्म पर