कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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दूजा गाया ॥ तत्त्व वित्त ते गावै न्यारा । पारब्रह्मते नाम अपारा ॥ धर्मदासको बहीया कीन्हा । तेहि संग जीव पायन लीन्हा ॥ जमते तिनका टोरी भाई । सत्तलोककी पैरी पाई ॥ तब वह हँसा लोक सिधारा । भौसागरते भया निनारा ॥ यह तन झूटा काम न आवे । सुकरित मिल तब लोक सिधावे ॥ ऐसा अचरज एक अनूठा । सबका करता नाम सुरूठा ॥
समै-अर्ध उर्धमें कहु नहीं, अरध सुन्नका नाम ।
कहै कवीर आसा जनि बांधो, झूठा अधर सुकाम ॥
रमैनी २२९-अधर सुकाम जगतमें छाया । तीन छोड चौथे लौलाया ॥ अमी शरीर तेहि अगर सुवासा । अधर लोकमें करे विलासा ॥ सुच्छम शरीर औ सुच्छम अहारा । हँसा खेले पुरुष दरबारा ॥ हँसा हँसन दर्शन पाये । मिटी काग गत हँस कहाये ॥ चौबिस पारस सात सिकारी । भिन्न भिन्न तिनकी गत न्यारी ॥ बिन बूझे हुलसे सब कोई । हुलस हुलस जिय डारा खोई ॥
समै-जड काटो ता बृच्छकी, जहँ हँसाको बास । कहै कवीर हँस सब जर गये, करके सुखकी आस ॥ हँसा तुम जिन जावो, अधर दीप निज धाम । कहै कवीर उजाड पडा, बूझो आतमराम ॥
रमैनी २३०-तन चौका सतसुकरित वीरा । अधर जोत जहँ जरे कबीरा ॥ नरियर मोरा रेखा साता । तेहि नारियर कीन्ह जम घाता ॥ पांचो सीखी जर गये भाई । जरा मरण कैसे अंक मिटाई ॥ पानमें अंक लिखे कडिहारा । तेहिकी आस उतरे संसारा ॥ धर्मदास सो सुनो हमारी । हमरी गत मत सबते न्यारी ॥ चार धाम जहँ पुरुष अपारा । खोजे हँसा करें दीदारा ॥ यहि बिध भूले सब कडिहारा ॥ काया छोड मरा संसारा । गुण औ तत्त्व न तन मन भाई । सुछम रूप सो पुरुष सवाई ॥