भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-२

समै-सुछम २ जनि कहो, सुछम जीका काल । कहैं कवीर करता लखो, सुछम है जंजाल ॥ कहा दीप कहा नाम है, कहा पुरुषका गांव । कहैं कवीर जनि भरमो, वहां जीव न ठांव ॥

रमैनी २३१--ठांव ठांव सबही मिल करिया । ठांव न चीन्हा भरमि भरमि परिया ॥ जैसे कन्या गुडिया बनाई । तेहि संग बहुविध केल कराई ॥ विरहिन सुता पियाका नाऊं । दूंदत फिरी सब ठावन ठाऊं ॥ प्रेम भगति ते पिया बोलावे । पिया बोलावे पीव न आवे ॥ पिय पिय करत अपन जिव दीन्हा । पियाका दरसन कबहुं न कीन्हा ॥ आरत मंगल पिया लडावे । ब्राह्मण सो जो दास कहावे ॥ कोटिन ब्राह्मण बहे अपारा । कोटिन दास भये संसारा ॥ गत मत पुरुषकी नाहीं पाई । भगति विरहिनी प्रेम लगाई ॥

समै--विरहिन साजे आरती, कंथ पियारे आव । चाहत पिया जो ना मिले, कहो ब्राह्मणको भाव ॥ विरहिन हती तो क्यों ना गई, पिय अपनेके साथ । झूठे नेह सनेहरा, मरे मरोरे हाथ ॥ आसा ऐसी जगतकी, ज्यों विरहिन पिय आस । सेवा करे सब-नकी, सोये पियाके साथ ॥

रमैनी २३२--चंदा झलके जलके माहीं । जलमें झलके दूसर झाई ॥ दोनों झूठे साँचा चंदा । सुख तत्त्व तब होय अनंदा ॥ सुख तत्त्व रहे नहिं भाई । कीहै चंदा जो जाय समाई ॥ दुतिया भया वहे दुखदाई । सोइ वहे जो देत मिटाई ॥ जब लग चार ठौरमें खेले । तब लग भरमत फिरे अकेले ॥ तत्त्व नास जनि करो रे भाई । तत राखे बिन जम ले जाई ॥ तत्त्व बित्तका एके भावा । परब्रह्म सो ब्रह्म कहावा ॥ तत्त्व बित्त ते जो है न्यारा । सो नाहीं तुम्हारो करतारा ॥

समै-आसा झूठी मुक्तिकी, झूठा पुरुष दरबार । कहैं कवीर खोजो तुम करता, जिन दूंदो दीदार ॥