भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

गावैं प्रानी ॥ क्षर अक्षर निअक्षर गावे । तत्त्व माहिं निज धर्म बतावे ॥ अमी शरीर नांद औ बिंदा । निहअच्छर पुरुष तहैं करे अनंदा ॥ सुन्न परे निज धाम बताया । निरगुन पुरुष तहां ठह- राया ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश्वर थाके । सुर नर सुनि तहां कोइ न राखे ॥ सब बातनते रहैं निनारा । निहअच्छर पुरुष जान अपारा ॥ हिंदू तुर्क दोऊ यक बानी । निहअच्छर पुरुष न कोऊ जानी ॥ निरगुन सोइ निअक्षर जोई । लखे न वाको चले सब कोई ॥ छर कहे माया अच्छर प्राना । निहअच्छर निरगुन निरवाना ॥ बस्ती उजार उजार बसावे । छर अच्छरकी खबर न पावे ॥

समै--छर अच्छर दोनों नहीं, निहअच्छर निज नाम । सुन्नके परे मुकाम है, सो जानो निज धाम ॥ सुन्न परे एक शिखर है, तापर है एक ठांव । तहांते हंसा आइके, जीव धरायो नाव ॥ शिखर परे निज धाम है, शब्द उठे गंभीर । तहांते हंसा आइके, भये वीर कवीर ॥ घरको छोड़ बाहर चले, निहअच्छर जहं नाम । कहैं कवीर पुकारके, द्वादस गये निज धाम ॥ निहअच्छर निजधाम है, तो सुन्न परे है नाहिं । सुन्न परे निज सुन्न है, निरगुन पुरुष वहां नाहिं ॥

रमैनी २२५--षट् दर्शन मिल कर बिचारा । आपन आपन मत कीने न्यारा ॥ औ पंथ अनेक हैं भाई । अपन अपन मत सबे बताई ॥ अपनी अपनी कथा बतावैं । करताका अस्थान न पावैं ॥ जोगी कहैं जोग करो भाई । अलख पुरुष तब देइ दिखाई ॥ जैन कहैं करो पारस पूजा । पारसनाथ पर देव न दूजा ॥ सन्यासी कहैं तत्त्व जो जारी । सच्चिदानन्द मिले त्रपुरारी ॥ जंगम कहैं करो शंकर सेवा । संकरनाथ पर और न देवा ॥ दरबेस कहैं चार पर आवैं । अल्लह तब लाहूत दिखावैं ॥ ब्राह्मण कहैं वेद जो जाने । वेदकी रीत ते ब्रह्म पहिचाने ॥ यहि विधि कहैं जहां लो पंथा ।