भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी-

जगत बताई ॥ बीज दरुक्त का है लाहूता । साखा वृच्छ कहे जबरूता ॥ मलकूत तिसका पल्लव लिख आया । फलवृच्छका नासूत कहाया ॥ नासूत अछहकी कहे जवाना । सो नासूत अटका तुरकाना ॥ ऐसी खबर जबरईल ले आया । पट पट सुलना सब भरमाया ॥

समै--वृच्छ नहीं डार फल लागे, चाखत सब संसार । कहैं कवीर वृच्छ वह अविगत, नाना फल अधिकार ॥ बीज वृच्छ दोनों नहीं, धरती नहीं गाँव । तेहि वृच्छ ते वृच्छ ऊपजे, सो फैले सब ठाँव ॥

रमैनी २५२--ले किताब काजी समझावे । रुह चार अछाहकी बतावे ॥ जमाती एक दूजे हैवानी । नवाती बहुर भये इनसानी ॥ अजब रूयाल अल्लह जब कीन्हा । जीव एक चार जिव दीन्हा ॥ पानी ते जीव रुह नावाती । जीव पवनते रुह जमाती ॥ दौडत जीव रुह हैवानी । लकम खुदाये रुह इंसानी ॥

समै--महम्मद बैठे मक्केपर, दिया यही उपदेश ।

सब जीवनमें खाकी प्यारा, दूर बंदगी भेस ॥

रमैनी २५३--नासूत मुकाम सरेका भाई । मलकूत तरीकत सब समझाई ॥ जबरूत हकीक भया संदेशा । लाहूत मारफत भया उपदेशा ॥ जिक्र तरीकत शुक्र शरीकत । फकर मारफत फिकर हकीकत ॥ प्रथम मुकाम सरेका भाई । दुसरी हकीकत लिया अर्थाई ॥ तिसरा मारफत कहे सब कोई । चौथा हकीकत दिया सोई ॥ इनकी बातनमें सब भूला । भया न लाभ गंवाया मूला ॥

समै--करता अपनेको नहीं चीन्हा, चला जहाँ नहीं कोय ।

बूझ समानी नाहिमें, डारा यह जिव खोय ॥

रमैनी २५४--यह सब कोई कहैं संदेशा । चार चार का दिया उपदेशा ॥ पहले तर्क नफसकी करे । तर्क खलक दूजी दिल धरे ॥