कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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तर्क दुनियाकी करे बिचारी । तर्क आखिर करे नर नारी ॥ दो वजूद आदमके गावे । बाज बिलवजूद सुमकीन बतलावे ॥ सुमकिन छोड वाजिबमें जाई । वाजिब जाके फेर न आई ॥
समै-बैठ सुकाम लाहूतके, बेचून दिया उपदेश । करता परा न चीन्हके, झूठा दिया संदेस ॥ झूठे संदेस बहुत सुख उपजा, करके गरव गुमान । कहें कवीर गये सब धोखे, फिरी मुहम्मद आन ॥
रमैनी २५५-तिहेत्तर फिरके करे विचारा । लामान लाहेको वारा ॥ आप आपमें झगरा ठाना । अल्लहका भेद काहु न जाना ॥ झगरा करत गये जुग चारी । किनहु न मानी बात हमारी ॥ रुह नफस निदी मारक आई । रुह इनसान खेतलाफ कहाई ॥ रुह नवाती लिया अरथाई । जमाती हिया बसाया गार्ई ॥ दिलमें बसे रुह हैवानी । ले किताब वह कहे कहानी ॥ लामातते आया जब रूत । जबरूत ते फिर आया मलकूत ॥ मलकूत ते लाहूत हिराना । लाहूत ते आया नासूत पयाना ॥ अर्जर भया फिर फकरमें आया । फकरे सुवा न करता पाया ॥
समै-पीर पैगम्बर सब चले, जहं लाहूत सुकाम । कहें कवीर उपदेश नवीके, जीव गये बेकाम ॥ रसूल गया लाहूतको, उमत्ता पाछे लाग । जीव करताके सब मरे, बिरले बांचे भाग ॥
रमैनी २५६-आदम सबका पिता कहाया । तीन गेहूँ भिस्तमें खाया ॥ किया गुनाह जमीं पर डारा । आदम दौवा हुवा कर- तारा ॥ तिसके भये दो बेटे भाई । एक सुन्नी एक कुफर चलाई ॥ ऐहमकाथ जो किया अजावा । यही खबर दिया कुरानकी तावा ॥ वही असमानते जबरील ले आया । तिनको नवीने जन्म कराया ॥ कुल आलमको दिया उपदेश । दुनिया चली वाहिके भेषा ॥
समै-आदम अल्लह दो कहे, आव अनासर नाह । रुह फिरस्ते