कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
जनवो आदम, हुकुम ते भये जग माह ॥ खबर नहीं अछाहकी, कौन रूप कौन भेष । कहैं कबीर कहे ना नाही, झूठा यह उपदेश ॥
रमैनी २५७--वहांकी खबर न कोई लाया । बातन बातन जग भरमाया ॥ महम्मद कबहुं भेद न दीन्हा । मुसलमान कुल ना नहिं कीन्हा ॥ एक कोई भया पूछनवाला । कहो वचन तुमनकी रसूला ॥ कौन हता आदमके आगे । की यह सृष्टि रही बैरागे ॥ खबर दर्ई आदम था भाई । आदम पर आदम गोहराई ॥
समे--मक्के अंदर मूसा था, बिलारका भया दीवाना ।
मूसा सबको खात है, मूसा कोइ न जाना ॥
रमैनी २५८--खबर एक ऐसी हम पाई । सो वह लिखा कुरानमें आई ॥ दोनों हद आपन कर खेला । हरगिज एक न डुइ कर मेला ॥ तिसकी खबर महम्मद दीन्हा । अछह बेहोस वाहिको कीन्हा ॥ खबरदार होय दिया संदेशा । मुसलमान सब भयो उपदेशा ॥ इसकी खबर कहे नहिं कोई । जीका भरम न डारे खोई ॥
समे--करार न था अछाहको, लोटपोट कहे बात । कहैं कबीर अछाहना तहां, जहां नहीं दिन रात ॥ अछह महम्मद दो कहे, कहे नवी अस बात । कायमको फानी कहैं, येही भूलकी बात ॥
रमैनी २५९--एक समय कुरानको खोला । आदम खता नसियाँ कर बोला ॥ येही आदम खताकी खानी । खताते भया खता यह जानी ॥ नापाक आवते पाक यह होई । अछह पहचाने औलिया सोई ॥ मनकी चाल चले सब चाला । यह मन सबहीका घर घाला ॥ यहि मनको कोई नहिं पाया । करता लखा न जीव गँवाया ॥
समे--मन सेती जियरा मिला, मन उड़ चला अकास ।
मन मिलके धोखे गया, तजिके भोग बिलास ॥
रमैनी २६०--तुर्क कहैं कलमा पठ भाई । कलमा पठा पै खोट