कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 643, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ेंशब्दावली
(६२९)
न जाई ॥ कलमा पर साबूत ले आया। कलमाका कछु भेद न पाया ॥ जो कलमा कलमा है सोई। कलमाको चीन्हा नहीं कोई ॥ कलमा कहे भिस्तकी तारी। भिस्तकी आस दिया जिव हारी ॥ कलमा राह भिस्त ठहराई। कहे कैसे अल्लाहको पाई ॥ कलमाते किताब सब भाई। कलमाकी प्रतीत जिव आई ॥
समै-कलमा तोड़े कुफर बोले, सो जावे वहि गांव। अङ्ग बिहूना पुरुष वह, कहुँ नाहीं वह खाँव ॥ आलिम पठ पठ सब मरे, कलमाकी परतीत। कायम कोई ना हुवा, वाव जगतकी रीत ॥
रमैनी २६१-जो आया सो फेर न होई। एके दिवस पुरुष औ जोई ॥ केते रह भई हैं भाई। पैदा होत होत रह जाई ॥ करके कौल अल्लाह पठावे। काज करे दो घर ले जावे ॥ ऐसी भांति अल्लाहकी भाई। महम्मद सब उम्मत बकसाई ॥ एक बात अल्लाहकी नाहीं। भरमकी बात जगत भरमाइ ॥
समै-जिस विध पैदा सृष्टि भई, तिस विध कहे न कोय। जिस करता तस ना कहे, यही भरम जिय होय ॥ एक रीति करता करी, सकल करी सकलाय। कहें कवीर बहु विध भई, अब कछु नाहिं बसाय ॥
रमैनी २६२-मुसलमान पै फरज यह आई। रोजा नमाज निकाह पढाई ॥ ईद बकरीद जीव खंखारा। इन बातन ना रीझे करतारा ॥ दीन मजहब औ चारो यारा। ईमान भयको तुम निहारा ॥ तकवीर करी फातिहा कराई। राजी भये आप लिया खाई ॥
समै--मनकी लहर जैसी उठी, तैसी लागे करार। करार पर जो कछु मिला, सो सब ले गये झार ॥ जे समझे ते बच रहै, गये जहाँते अजान। कहें कवीर चेतो किन अबहुँ, छाडो मनका फरमान ॥
रमैनी २६३--मक्का मदीना काबा ठहराया। रहूँ अपनी काबे पर लाया ॥ तहँ अल्लाहका भया निवासा। रोजा बांग भई मन