कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
आया ॥ मसजिद जाय बांग करे भाई । और ठौर अल्लह नहीं पाई ॥ मोमिन कहें दोस्त खुदाया । जिन कारण यह दुनों बनाया ॥ मक्के मदीना हज्ज कहवाई । वहां रहे सो कौन है भाई ॥ मोमिनका घर मक्का मदीना । दीन वो मजहब कुरान सफीना ॥ हिंदूका वहाँ नाहीं कामा । यही नबीका हुवा कलामा ॥
समै--मक्के भीतर सब रहे, अल्लह ते भइ ना भेट ।
किबला काबा कर मरे, मनकी परी झपेट ॥
रमैनी २६४--कुल आलमीन भया खुदाई । खुल मुसलमीन लिखा न आई ॥ क्या बूझ हिंदूको मारो । नातो मुसलमान कर डारो ॥ इसका संदेशा देय न कोई । मार घार आल है निरगम होई ॥ नाहीं अदली जो अदल चलावे । धोखा मेटि करतहिं लखावे ॥ करता आपन चीन्हों भाई । झूठी बात न जीव गंवाई ॥ रोजा नमाज औ चार मुकामा । मक्का मदीना भया विसरामा ॥ झूठा ख्याल तजे जो कोई । आप बिचारो करता सोई ॥
समै--बोलत बोलत झगडा पडा, झगड़ा बहुत बकान । कहैं कबीर भरमत फिरा, ताते तत्त्व नसान ॥ वहे वेचुन बेनमून नहीं, कहे तजल्ला नूर । कहैं कबीर नेरे बतलावे, बहुरि बतावे दूर ॥
यह अल्लह यही नूर है, यहि ते देख जमाल ।
कहे कबीर बातें असमानकी, सो है ख्वाबत ख्याल ॥
रमैनी २६५--बहु भाषा जनि बोलो भाई । बोलत बोलत तत्त्व नसाई ॥ हिंदू हद देहरा गाई । मुसलमान मक्का ठहराई ॥ तीरथ बरत उनके मन माना । रोजा नमाज इनके ठहराना ॥ बनके रसूल बखसावन हारा । इनके राम न ये करतारा ॥ राम कीन्ह पूरब विसरामा । अल्लह पश्चिम लिया मुकामा ॥
समै--करता आप न चीन्हे, झूठे लागा नेह । पूरब पश्चिम कर