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कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

Devanagarihipublished968 पृष्ठ

(६३०)

कबीरपंथी—

आया ॥ मसजिद जाय बांग करे भाई । और ठौर अल्लह नहीं पाई ॥ मोमिन कहें दोस्त खुदाया । जिन कारण यह दुनों बनाया ॥ मक्के मदीना हज्ज कहवाई । वहां रहे सो कौन है भाई ॥ मोमिनका घर मक्का मदीना । दीन वो मजहब कुरान सफीना ॥ हिंदूका वहाँ नाहीं कामा । यही नबीका हुवा कलामा ॥

समै--मक्के भीतर सब रहे, अल्लह ते भइ ना भेट ।

किबला काबा कर मरे, मनकी परी झपेट ॥

रमैनी २६४--कुल आलमीन भया खुदाई । खुल मुसलमीन लिखा न आई ॥ क्या बूझ हिंदूको मारो । नातो मुसलमान कर डारो ॥ इसका संदेशा देय न कोई । मार घार आल है निरगम होई ॥ नाहीं अदली जो अदल चलावे । धोखा मेटि करतहिं लखावे ॥ करता आपन चीन्हों भाई । झूठी बात न जीव गंवाई ॥ रोजा नमाज औ चार मुकामा । मक्का मदीना भया विसरामा ॥ झूठा ख्याल तजे जो कोई । आप बिचारो करता सोई ॥

समै--बोलत बोलत झगडा पडा, झगड़ा बहुत बकान । कहैं कबीर भरमत फिरा, ताते तत्त्व नसान ॥ वहे वेचुन बेनमून नहीं, कहे तजल्ला नूर । कहैं कबीर नेरे बतलावे, बहुरि बतावे दूर ॥

यह अल्लह यही नूर है, यहि ते देख जमाल ।

कहे कबीर बातें असमानकी, सो है ख्वाबत ख्याल ॥

रमैनी २६५--बहु भाषा जनि बोलो भाई । बोलत बोलत तत्त्व नसाई ॥ हिंदू हद देहरा गाई । मुसलमान मक्का ठहराई ॥ तीरथ बरत उनके मन माना । रोजा नमाज इनके ठहराना ॥ बनके रसूल बखसावन हारा । इनके राम न ये करतारा ॥ राम कीन्ह पूरब विसरामा । अल्लह पश्चिम लिया मुकामा ॥

समै--करता आप न चीन्हे, झूठे लागा नेह । पूरब पश्चिम कर

शब्दावली

(६३१)

मरे, देहते भया विदेह ॥ अल्लह राम दो करता, दोउका एक सुकाम । कह कवीर जगत सब, तहाँ लिया विसराम ॥

रौनी २६६-क्योंकर भये ब्राह्मन ! ब्रह्मानी । तुम दस कर्म वह एक न जानी ॥ काजी सुनि सुन्नत करावैं । घरकी नारी क्योंकर कहवावे ॥ पुरान बेद औ शास्त्र वे देवा । जगत हीन करो फिर सेवा ॥ तुर्क नमाज कुरान भुलाना । पढ पढ सुवा मरम नहि जाना ॥ वे कहैं अल्लह वे कहैं रामा । एकही घर दोऊ विसरामा ॥

समै--जो जाके मन छपजे, सो वह चितमें देह ।

कहैं कवीर यह बातें झूठी, समुझ हमारी लेइ ॥

रौनी २६७-कंठी माला इनके मन माना । उनके तसबी पर किया ठिकाना ॥ इन देव पूजा तीरथ ठहरावा । उन नमाजके दिल लावा ॥ इन बैकुंठ किया विसरामा । उन भिस्त चल लीन सुकामा ॥ इनके अगुवा ब्राह्मण भाई । उनके महम्मद रहे ठहराई ॥ इनके धोती चौका असनाना । उनके एकेके सब माना ॥ इनके दस करम रहे विचारी । उनके खतना सुन्नत संभारी ॥

समै-दो मारग दो करता, कहो कौन केहि देस ।

कहैं कवीरा दोनों ते पूछत, उनका लावो संदेस ॥

रौनी २६८-एक बीज दो बृच्छ कहाई । एक बीज दो क्योंकर भाई ॥ बेद न काहू पेट पढाया । सुन्नत कराये तुरक नहि आया ॥ माला कंठी तिलक न संगा । तसबी वह लिया न अंगा ॥ हिंदू तुरक हो कोइ न आया । हिंदू तुरक बीच ठहराया ॥ तुरक पश्चिम दिशि चले विचारी । हिंदू पूरब चले संभारी ॥ हिंदू तुरक कहा बिनाना । यहीं भया औ यहीं समाना ॥

समै बीज बृच्छ नहि चीन्हे, मरे दोय पद सब कोय ।

कहैं कवीर दोनों पच्छ छाडो, करता चीन्हो सोय ॥

(६३२)

कवीरण्यी-

रमैनी २६९--गगन गुफा तहं राम हमारा । साध प्रान चला संसारा ॥ हिंदू चले सुन्नको भाई । ला मकान तुर्क लौ लाई ॥ पीर मुरीद दोऊ एक संगा । धोखे गये भये तेहि भंगा ॥ षट्दरशन छयानबे पारखंडा । सबे सुये चढे ब्रह्मण्डा ॥ सांचा भेद झटके माना । दोनों मिल झूठे लपटाना ॥

समै-सहकामी सेवा नहीं, सेवा सो जो निहकाम । धोखा सेवत जनम गँवाया, खोया किया न काम ॥ जहं काहूकी गम नहीं, नहीं चंद्र नहिं सेस । तहां कवीरा घर किया, सहूरुके उपदेस ॥

रमैनी २७०--दुइ जगदीश जगतमें छाया । मैं नहिं जानो कहाँ ते आया ॥ हजार नाम अछ्हाह कहाया । सहस्र नाम रामके गाया ॥ एक सुन्नी एक काफ़िर भाई । अपन अपन गुरु चीन्हो धाई ॥ तीरथ मूरत राम निवासा । मक्का मदीना अछ्हको बासा ॥ आप आपको दोनों लागे । करता आप न लखे अभागे ॥

समै--गगन गुफा बैठे हते, तिरबेनीके तीर ।

कहे कवीर सबही बैठे, सुन्न सिखर गंभीर ॥

रमैनी २७१--पंद्रह तिथि पंद्रह व्रत भाई । तुर्क मास रोजा ठहराई ॥ तीज दसहरा फाग दिवारी । दाहा सुबरात औ ईद बिचारी ॥ हिंदू खाया बकरा मारी । तुर्कन बकरी गाय पछारी ॥ हिंदूके घर वेद पुराना । तुरकनके ठहरा फरमाना ॥ हिंदूके निरगुन निरंकारा । तुरकनके बेचून बिचारा ॥ हिंदू नरक सरग ठहराया । तुर्कन भिस्त दोजख बतलाया ॥

समै--एक गांव दो बहिनी, दोनोंका एक नांव ।

दोनों पर एक बालक थे, बिन बूझे छूटे गांव ॥

रमैनी २७२--एकादसी व्रत रहा लौलाई । अन्न तजे छीर गऊको खाई ॥ निराधार रहे आतम जारी । करता आप न लखे

शब्दावली

(६३३)

बिचारी ॥ रोगी रहे तदवीर कराईं । पढे नमाज मासको खाईं ॥ दो घडी रात रहे फिर जगहीं । सरगही खाय परे नर तबहीं ॥ जीव हने कहें खाया खुदाईं । उनका उलस लिया हम खाईं ॥ पीर पैगम्बर सबहीं खाया । जबह किया फातिया दिलाया ॥ साद भया तब ध्यान पर आया । सब देवनको अरप चढाया ॥ पहले भोग देवको दीन्हा । तब वह खाय आप फिर लीन्हा ॥ वैस्वदेव करे चितलाई । देव पितरको दीन खवाई ॥

समे--यहि धंधा दोनों मरे, करता चीन्हे नाहिं ।

बिन समझे जाने सुमिरे, यही भूल जग माहिं ॥

रमैनी २७३--कहो महम्मद मोहि समुझाईं । मामा होवा कहांते आईं ॥ आदम किसका पुत्र कहाया । उन कैसे विश्वरूप बनाया ॥ पंडित अपना खोल पुराना । विश्वरूपका करे व्याना ॥ ब्राह्मण ब्रह्मा कहांते आय । कैसेके यह सृष्टि उपाय ॥ लौट उमील करे बयाना । ओंकारको दीन प्रवाना ॥ कौन रूप कौनसा गाऊं । कौन देश निरगुनका नाऊं ॥

समे--पुरुष नार एक संग हैं, साथ बीज अंकूर ।

देश विलायत सुन्न पर, परिपूर्ण सदा हजूर ॥

रमैनी २७४--दोई दीन कहांते आये । कहो कैसे दो दीन चलाये ॥ वेद न काहू पेट पढाया । सुन्नत कराय तुरुक नहिं आया ॥ देव न देहरा रामउ खाये । पीर मसीत न अल्लह बनाये ॥ वेद पुरान न राम बखाना । अल्लह न पढा किताब कुराना ॥ रोजा नमाज न अल्लह पढाया । पूजा अरचा न राम बताया ॥ पूरब राम न कहा संदेशा ॥ पश्चिम अल्लह न कहा उपदसा ॥

समे--बहे लोग सब जात हैं, दो अगुवाके साथ ।

कहैं कवीर ऐसा कोइ नाहीं, जो गहि राखे हाथ ॥

(६३४)

कबीरपंथी—

रमैनी २७५—चार यार मिल किनहु न जानी। बीबी फातमा जो पहचानी ॥ दसतार महम्मदी धरा उठाई। नूर महम्मदी दीन दिखाई ॥ सकल सृष्टि जो देख न पाया। कुंती जसोदा सोइ दिखाया ॥ कृष्णमई देखा संसारा। जिसके बखनका वार न पारा ॥ तेहि कारण हिंदू तप साधी। तेहि कारण उन कीन्ह उपाधी ॥

समै—मायाके यह सब गुन, चंचल चपल व्योहार।

छल छिद्र उन्ही बन आवे, करता इनते निनार ॥

नाटक चेटक अड़त अगम, रहा चहुँदिशि पूर।

कहैं कबीर यह भिस्त नहीं है, रहा सो खालिक दूर ॥

रमैनी २७६—एक महम्मद एक खुदाई। एक निरगुन एक सरगुन भाई ॥ निरवृत साथे लोग व्योहारा। रोजा नमाज दुनी ते न्यारा ॥ चहिये भिस्त चहिये दीदारा। राम चहिये औ सरग द्वारा ॥ पीर पैगम्बर औ चार यारी। बीबी फातमा बकसावन हारी ॥ देवी देवा आदि भवानी। एक दो नाहीं बहुत जिन जानी ॥

समै—एक साथे सब सघे, सब साथे सब जाय।

कहैं कबीर चेतो दोउ भाई, हम दीन्हो समझाय ॥

रमैनी २७७—लूटे ब्रह्मा हरि त्रिपुरारी। लूटे गौतम सुखदेव ब्रह्मचारी ॥ लूटे सनक सनंदन दोऊ। लूटे अगस्त विश्वामित्र ओऊ ॥ लूटे वशिष्ठ अत्री डुरवासा। शृंगीरिषि लूटे वन वासा ॥ पारासर लूटे माझ मंझारा। लूटे जमदग्नि औ सनतकुमारा ॥ लूटे गौस कुतुब बाबानी। लूटे औलिया अंबिया पीरानी ॥ महम्मद लूटे राह चलाई। लूटे चार यार जिनकी थी दुहाई ॥ लूटे ईसा मूसा मनसूरा। लूटे अरबहि मदीन के सूरा ॥ लूटे गोरख औ जैपाला। लूटे गोपी लूटे ग्वाला ॥ माधवाचारज लूटे जनकादे। रामानिज लूटे धर्मादे ॥ लूटे हनुवात नारद सपता।

शब्दावली

( ६३५ )

लूटे पांडव औ बलदाता ॥ लूटे नाथ मच्छंदर जोगी । लूटे युधिष्ठिर षट् रस भोगी ॥ सुर नर मुनि सब लूटे झारी । सब मिल मानो बात हमारी । अष्टभुजी माया आदि भवानी । तिन लूटे ज्ञानी विज्ञानी ॥

समै-पाया सब जग लूटिया, भरम जालमें डार । कहैं कबीर क्या कीजिये, ना समझे संसार ॥ ऐचातानी सब करें, कटे न भरमक डार । चारो जुग सबको समझाया, कहा न मान हमार ॥

रमैनी २७८-एक शब्दका सकल पसारा । एक शब्द सबहींते न्यारा ॥ एक शब्द सब जीते हारे । एक शब्द सब एक विचारे ॥ एक शब्द नित मरे औ जीवे । एक शब्द खावे औ पीवे ॥ एक शब्द सब करे करावे । एक शब्द कहुं जाय न आवे ॥ एक शब्द नित बोले चाले । एक शब्द त्रिभुवनको पाले ॥ एक शब्दके बाप न माई । एक शब्द निज रहा छिपाई ॥ एक शब्द है सर्व सनेही । एक शब्दके प्रान न देही ॥ शब्द शब्द जो कहे विचारी । तो यह आतम मरे न मारी ॥

समै--कह पंडित अस बोल तुम, क्यों भटकावो लोग । कहैं कबीर शब्द एक है, वहि क्यों करो वियोग ॥ अपनेको अपना मिला, दो दो नेना जोय । सरबंगी सबसो मिला, दिलकी दुबधा खोय ॥ तिल समान यह जगत है, काहू परा न चीन्ह । कह कबीर सद्वृत्त मिले, ज्ञानदीप जिन दीन्ह ॥ भली भयी नैनो लखा, मिट्टी दूरकी आस । जो कोई समझे भले, सोई है धर्मदास ॥

इति ज्ञानदीपककी रमैनी संपूर्ण ।

(६३६)

कवीरचंथी—

परिशिष्ट ।

ज्ञानवीपककी रसैनी जो पृष्ठ ६७३ से आरम्भ होता है, उसीका यह परिशिष्ट भाग है, जिसको सूचना उसी पृष्ठको टिप्पणीमें दिया है, । सड़े हुए पत्रोंसे जहां तक पढ़े जा सकते हैं वहां दिया जाता है— (पहली रसैनीका पत्रा एक दस नष्ट हो गया)

दूसरी रसैनीको अन्तिम साखी ।

हद हता तब आप था, सकल हता ता मांहिं । ज्यों तरवरके बीजमें, डार पात फल छांहिं ॥

रसैनी तीसरी ३.

सब गुन पूरन माया रानी । उन फिर ... .. उन फिर रचा वृच्छ औ ... ..

और सब नष्ट हो गया इसकी अंतिम कड़ी

और समें बचे हैं तो यह है—

तीन पुत्र तिर विधि गुनकारी । हरि ब्रह्मा तिनके त्रिपुरारी ॥ समै--हम संजोग गुन तीनभै, उन्ह पुनि कीन्ह पसार । हमै छोड गुन तीनते, उन कीन्हवा बेभिचार ॥

चौथी रसैनीका केवल इतनी अन्तिम कड़ी शेष है ।

ब्रह्मा भूला देख लोभाना । माताते पुत्रन छल माना ॥ सुतते मातु ते नारी । पुत्रते पिता मात ते बारी ॥ समै--माताते मेहरी भयी, भया पूत ते बाप ।

कहैं कवीर बडा अचंभा, ... ..

पांचवी रसैनीमें इतना शेष है ।

मैं कहत हौं पंडित अगम विचारा । ... .. पुत्र सीख देइ महतारी । ... .. पिता तुम्हारा रहे निरंकारा । ... .. कहे ब्रह्मा ते रूप न रेखा । ... .. अरध न उरध पुरुष ना नारी । ... .. इतना सुनके बचन भुलाना । ... .. मातुकी बात ब्रह्मा नहिं बूझे । ताते पैडा नहिं कछु सूझे ॥

शब्दावली

( ६३७ )

समै--सुत नहि माने बात, सेवे पुरुष विदेह । कहैं कवीर अबहुँ ना चेतो, छाडो झूठ सनेह ॥

छठी रमैनीमे इतना बचा--

... ... महा बलिया । एक बार छलके फिर छलिया ॥ ... ... । अष्ट भुजी माया आदि भवानी ॥ .. ... । सावित्री सती लच्छ कुमारी ॥ ... ... । तीनहु मिल संजोग कराई ॥ ... ... । सो पुत्रन ते भयी बेभिचारी ॥ ... ... । फिर मदेशते छल बल कीन्हा ॥

असँख जुग लो कहि कहि हारा । सेवै सबै सून्य निरंकारा ॥ समै--त्रिगुन हेत हती महमाया, हता न वह बिस्तार । कहैं कवीर भरसु त्रिदेवा, कीन्ह न आप बिस्तार ॥

सातवी रमैनीका बचा हुआ ।

सुनु ब्रह्माते आदि कहानी । ... .. हमहै वहि देसकी नारी । ... .. कर हम मौंजे परे त्रय छाला । ... .. हमरे पुत्र होय तिर देव । ... ..

समै--ब्रह्मा जननीसे पूछे, ... ..

कौन बरन वहि पुरुष है, ... ..

रूप नहीं रेखा नहीं, ... ..

गगन मंडलके बाहिरें, ... ..

ध्यान जु धरो गगनका, मूँदिन बप्रकिवार ।

देख परतिमा आपनी, तीनों भये निहाल ॥

त्रिदेवाके सुमरते, सबका भया अकाज ।

ब्रह्माका आसन डिगा, सुनत आपनी गाज ॥

(६३८)

कबीरपंथी—

आठवीं रमनीका शेष ।

माया महा आदि भवानी । वेद पाठ शास्त्र जो बखानी ॥

... .. । छनिवंती देवी जयवंती ॥

... .. । नैनवान गहि सर्बहि पछारी ॥

... .. । सुरनर मुनि सबके घर खाया ॥

समै—केदली खंभ दोउ जंघा, छबि दोउ कुचन अनार ।

... .. आदर्श अति, झलकत चंद लिलार ॥

... .. सो छल किया, तीनों लीनसि खाय ।

... .. तीनोंके पीछे, जगको छलसि बनाय ॥

नीमी रमनीका बचा भाग ।

छलबल बहुत कीन वर नारी । दो संजोग भयी संसारी ॥

दो संजोग त्रिभुवन पर छावे । दोउ पर कीन नाहिं लखावे ॥

एक प्रान देखे दो देही । पुरुष न रहे एक सनेही ॥

बीज वृच्छ है एके संग। वृच्छ बीजका एके रंगा ॥

माया ते मन उपजा भाई । करता जिय ... .. ॥

इच्छा विपरीत भई इक संगति । ... .. ॥

बीज मंत्र सब सृष्टि करतामैं । ... .. ॥

करता फिर सबनते पुकारी । मानेसो ... .. ॥

समै—अष्ट धातका पूतला, ... .. ॥

कह कबीर सुमरो जन क ... .. ॥

दसवीं रमनीका शेष ।

सुन पंडित तैं बात हमारी । ... .. ॥

मन उपजा इच्छा भइ भारी । भौ संजोग पुरुष औ नारी ॥

ताते भये तीन यह बारा । बिन संजोग नहीं संसारा ॥

अन्तर प्राप्ति नहिं पाया । धोखा सेवा मूल गंवाया ॥

जाके प्रान नहीं है देही । रूप न रेखा प्रान विदेही ॥

सम्वादवली

(६३९)

... के पै कोइ न लखावे । पुरुष विदेही सबै बतावे ॥

... ... कहत पुकारा । जीमें कोई न करे विचारा ॥

... ... ... ... छीजे । माने नाता सो का कीजे ॥

समै-... ... करपूतला, करता ताहि सनेह ।

समरो जिन कबहूँ, जो है पुरुष विदेह ॥

न्यायहर्षी रत्नोत्तमा शेष ।

... बात हमारी आगम पंथा । स्त्रीके गोद खेलै कंथा ॥

वहिन ते पुत्री पुत्री भइ नारी । नारी ते फिर भई महतारी ॥

कंथ खेलावे पुत्रकै जाने । नारी पुत्र कंथकै माने ॥

पुत्र ते होय संजोगिन माता । पिता ते पुत्र पुत्र ते ताता ॥

यह अचरज कहु कासो कहिये । कहियेतो फिरकहु कहैरहिये ॥

पंडित पठ पठ वेद सुनावे । नाद बिंदकी खबर न पावे ॥

जोगी जती रंक औ राया । किनहुँ नहिं यह भेद बताया ॥

पिता छोड़िके निरगुन सेवा । ... ... ... भेवा ॥

समै-माता ते मेहरी भई, मेहरी ते भइ माय ।

जो नहिं सो सबका करता, अचरज कहा न जाय ॥

न्यायहर्षी रत्नोत्तमा बचा बुचा ॥

सुनु पंडितका वेद अरथावे । वेद पढे कछु भेद न पावे ॥

एकादशि बरतसो मन माना । पूजे देव औ पढे पुराना ॥ जिन

जिन पिताको चीन्हा भाई । थिर भया ... .. ॥ भूलत फिरी

सृष्टि सब धाई । पिता न लखा तजी न माई ॥ जेजे पुत्र पिताको

पाये । आप आपमें सबहिं समाये ॥ आपा चीन्हे सो बड ज्ञानी ।

पिता पुत्र एकै सहिदानी ॥ पिता पुत्रकी एके काया । मातु पिता

निरगुन बतलाया ॥ जो जाने यह भेद अतूपा । दुबिधा तजे ते

देख सुरूपा ॥

(६४०)

कवीरपंथी—

समै--जहवाँ नहीं सृष्टिका करता, तहवाँ तकु सब कोय । कह कवीर मानो नहिं ताहि, जो जिय बैरी होय ॥ पूतहु ते प्रीतम भया, प्रीतम ते भौ पूत । ... खेल तुम हमरी, चीन्हो आपन दूत ॥

इन बारह रमनियोंके पत्रे सङ्गये थे इनके आगे १३ तेरहवीं रमनो पृष्ठ ६७३ से आरम्भ होती है । बहुत स्थानोंमें दूँडनेपर भी 'ज्ञानदीपक' की रमनीकी प्रति किसीके पास नहीं मिली, इसलिये मजबूरन जो कुछ था उसेही छपवा देना पड़ा । क्योंकि, यह ग्रन्थ भी जब सङ्ग गया है तब इसके नष्ट होने भी स्थ- देरी है । सज्जनोंको चाहिये कि, इस अमूल्य अपूर्व ग्रन्थकी प्रति जहाँसे मिले उससे इसे मुद्र करने और छपाकर मुखेसी सुचित कर तो फिरसे इस रमनीकी छपवानेमें सुशीता हो ॥ श्रीयुगलानन्द विहारी.

तत्त्वदर्शन साखियाँ ।

मङ्गलाचरण ।

जाकी कृपा कटाक्षते, मोक्ष मुक्ति फल होय । सत्य कवीर बन्दन कहैँ, काया बच मन सोय ॥ १ ॥ बोधे सो गुरु देव है, सत गुरु सत्य कवीर । बोध लेह सो शिष्य है, धर्मदास मति धीर ॥ २ ॥ साधन चार सम्पन्न जो, गुरु भक्ति उर जासु । तासु हेतु वर्णन करो, दर्शनतत्त्व विकासु ॥ ३ ॥

शिष्य प्रश्न ।

साधन चार विचार जो, मोसे कहु गुरु देव । सुनत ज्ञान उरमें धसे, मनमें उपजे भेव ॥

गुरु उत्तर ।

साधन चार सु कहत हौ, प्रगट कहत वेदान्त । जाहि लहे जिव होत है, परम सुखी औ शांत ॥५॥ विवेक विचार प्रथम अहै, दूजे जानु विराग । षट सम्पति तीजे कही, चौथ मुमुक्षु बड भाग ॥६॥

शिष्य प्रश्न चार साधन ।

का विवेक वैरागका, षट सम्पतिका गुरुदेव । मुमुक्षुता कासे कहो, सो समुझावहु भेव ॥ ७ ॥

गुरु उत्तर--विवेकरूप ।

नाश मान जग देखिके, मनमें उपजे चाव । सत्य वस्तु जानन चहे, कह विवेक सो भाव ॥८॥ पांच तत्त्व गुण तीन मिलि, अछुंगी तेहि नाम । आठो आठो ते मिलयो, भयो जगत परिणाम ॥९॥

शब्दावली

(६४१)

साधारण वैराग्यस्वरूप ।

नाश मान जग जानिके, मनुवा होय उदास । मुनिजन कहत विराग सो, नासत विषय विकास ॥ १० ॥

बुद्ध वैराग्य स्वरूप ।

राग गयो मनते जबै, द्वेष न आवै पास । शुद्ध विराग ताते कहो, मिटे सकल सतभास ॥ ११ ॥

शमस्वरूप ।

भयो विराग जु मन विषै, मिटी बासना जाहि । मन रुकयो विषयानते, शम कहियत है ताहि ॥ १२ ॥

दम स्वरूप ।

मन रुकयो विषयानते, इन्द्रिय धारयो धीर । दम ताहीको कहत हैं, सत मत गहिर गंभीर ॥ १३ ॥

उपरति स्वरूप ।

मन इन्द्रियके रुकतही, छूटयो विषय विकार । सुधर्म रत तब मन भयो, उपरम ताहि विचार ॥ १४ ॥

तितिक्षा स्वरूप ।

शीत उष्ण शुधा तृषा, सुख दुख औरो आहि । इनको सहन सुभाव सो, कहत तितिक्षा ताहि ॥ १५ ॥

अदा स्वरूप ।

सत खोजनकी चाह मन, गुरु शास्त्रन ढिग जाहि । हृद विश्वास तिनके बचन, शरघा कहिये ताहि ॥ १६ ॥

समाधान स्वरूप ।

सद्गुण पा मन थिर भयो, थिरता बलकी खानि । समाधान सोई कहो, छूटे मनको मान ॥ १७ ॥ मन इन्द्री तो वश भयो, उपरम तितिक्षा लार । शरघाते मन थिर भयो, समाधान कहि सार ॥ १८ ॥

कबीरपंथी शब्दावली २१

(६४२)

कबीरपंथी—

तीसरे साधनको समझ ।

शम समाधान लो कहै, सम्पति षट है सोय । तीसर साधन ज्ञानको, चौथ सुमुखुता होय ॥ १९ ॥

सुमुखुत्व स्वरूप ।

इहै लोक परलोकलौ, बन्धन दीखे जाहि । मुक्त होनकी चाह जो, सुमुखुत्तन कहि ताहि ॥ २० ॥ साधन चार विचार भो, हिये जासु परकाश । तत दर्शनके पावते, होय अविद्या नाश ॥ २१ ॥

गुरु भक्ति शिष्य प्रश्न ।

साधन चार जान्यो भले, सुगुरु कृपा निधान । गुरु भक्ति कासे कहो, ताका करूं विधान ॥ २२ ॥

गुरु उत्तर—गुरु लक्षण ।

गू अँधियारे जानिये, रू कहिये परकास । मेटि अज्ञानहिं ज्ञानदे, गुरु नाम है तास ॥ २३ ॥ गुरु बहुत हैं जगतमें, परगट देखु विख्यात । सतगुरुके पाये विना, कबहुँ न भरम नसात ॥ २४ ॥ सत्य वस्तुको ज्ञानदे, भाने भरम संदेश । आतम तत्त्व लखावई, मेटि अविद्या लेश ॥ २५ ॥

गुरु भक्ति स्वरूप ।

ताहि गुरुकी शरणमें, हिये भक्ति निज धार । अद्वा युत अर्पण करे, असत सकल संसार ॥ २६ ॥ गुरु होय प्रसन्न जबे, लहे सु आतम ज्ञान । ताते सतगुरु भक्ति करी, लीजे पद निर्वाण ॥ २७ ॥ गुरु मेहिमा अतिशय विमल, संतन कियो बखान । ताहि विचारे बहुत विधि, पावे पूर्ण विधान ॥ २८ ॥ अब आगे

१ कबीर धर्मदर्शन ग्रन्थ मालाके प्रथम भागको देखो । जिसमें गुरुमहिमा सत और सत्यसंग महिमा आदिका सुन्दर विवरण है —लिलो—स्वामी युगलानन्द बिहारी—कबीर आश्रम—गो० हरसिया जि० बिलासपुर ली० पी० ।

शब्दावली

(६४३)

जो पृच्छद्, सुकृत शिष्य सुजान । सो सब मैं तोसों कहौं, रंच न संशय आन ॥ २९ ॥

शिल्प प्रश्न ।

गुरु भक्तिको भेद अब, जानि परो गुरु देव । जाकी कृपा कटाक्षते, मिटे सकल दुख लेव ॥ ३० ॥

तत्त्व स्वरूप ।

अब आगे मोते कहो, तत्त्व अतत्त्व विचार । जाकेजाने जीव जग, लहै मुक्ति ततसार ॥ ३१ ॥ तत दर्शन काते कहो, सुनु गुरु दीन दयाल । बिलग बिलग मोसे कहो, मिटे अविद्या जाल ॥ ३२ ॥ जड़ चेतन दो वस्तु हैं, अति प्रसिद्ध जग माहिं । इनकी पारख प्राप्ति विन, बन्धन छूटत नाहिं ॥ ३३ ॥

[सत्योपदेशानभिज्ञात्मा ॥]

शिल्प प्रश्न ।

जड़ चैतन दोऊ कहो, विलग विलग गुरु राय । तुमरी कृपा टाक्षते, अम सकल नसि जाय ॥ ३४ ॥

गुरु उत्तर ।

जड़ तम पुंज प्रसुप्त सम, अप्रबोध दुख रूप । चैतन परमानन्द घन, ज्ञान स्वरूप अनूप ॥ ३५ ॥

[सत्योपदेशाभिज्ञात्मा ।]

शिल्प प्रश्न ।

अस तम पुंज सु को अहै, जड़ असत्य दुख रूप । पहिले ताहि बतावहु, गुरु ज्ञानिनको भूप ॥ ३६ ॥

गुरु उत्तर ।

पांच तत्त्व त्रिगुण सहित, अष्टंगी जेहि नाम । आद्या माया जानिये, दृश्य जगत परिणाम ॥ ३७ ॥

शिल्प प्रश्न ।

पांच तत्त्वका नाम अरु, गुन त्रयनको धाम । माया आदि अष्टंगि जो, दृश्य जगत परिणाम ॥ ३८ ॥ बार बार बन्दन करूँ,

(६४४)

कवीरपंथी—

श्रीगुरु दीन दयाल । भिन्न भिन्न वर्णन करि, हरहु अज्ञान विशाल ॥ ३९ ॥

गुरु उत्तर ।

(अष्टंगी (माया) का कर्म)

अव्याकृत अव्यक्त जो, मूल प्रकृति प्रधान । अद्या ताको कहत हैं, सुनु शिव शील निधान ॥ ४० ॥ पांच तत्त्व गुण तीन मिलि, अष्टंगी तेहि नाम । आठों आठो ते मिलो, भयो जगत परिणाम ॥ ४१ ॥

जगतका स्वरूप ।

चैतनके संयोगते, पाईं शक्ति अपेल । तनु मात्रा परगट कियो, गुण तीनन जगमेल ॥ ४२ ॥

पांच तन्मात्रा ।

शब्द स्पर्श अरु रूप है, रस अरु गन्ध अनूप । तन मात्रा यही कहत हैं, जाने सुनिवर भूप ॥ ४३ ॥

पांच तत्त्व ।

पृथ्वी अप अरु तेज है, वायू और अकाश । पांच तत्त्व यह जानिये, कारण विश्व प्रकाश ॥ ४४ ॥

तीन गुण ।

सत रज तम यह तीन जो, गुण कहियत है तात । पांच संग यह तीन मिलि, जगत सबे दरशात ॥ ४५ ॥

जगत ।

इनहीके संयोगते, भयो जगत सब आय । देह अवस्था कोश पुनि, जीव ईशलो भाव ॥ ४६ ॥ व्यष्टि समष्टिके भेदते, भया जगत प्रकास । जीव शीव सब परगटे, इनहीके हट भास ॥ ४७ ॥

जीव—शीव ।

व्यष्टि अभिमानी जीव है, समष्टि अभिमानी शीव । ज्ञान दृष्टि करि देखहु, यही जगतके पीव ॥ ४८ ॥

शब्दावली

(६४५)

शिष्य प्रपन्न ।

देह अरु अवस्था कही, हे गुरु मुनिवर भूप । परगट आप बखानिये, दीजे ज्ञान अन्नूप ॥ ४९ ॥

गुरु उत्तर-छः प्रकारकी देह ।

हृश्यमान जो जगत है, जानो देह मुजान । तासु भेद अव कहत हौं, सुनो शिष्य दे कान ॥ ५० ॥ पट प्रकारकी देह है, जामें अरुझा जीव । जीव शीवके भेद ते, भयो दास अरु पीव ॥५१॥ स्थूल सूक्ष्म कारण अरु, महाकारण पुनि जोय । कैवल पंचम जानिये, छठी हंस कहि सोय ॥ ५२ ॥

छः अवस्थाके नाम ।

जागृति स्वप्न सुषुप्ति है, तुरिया तुरिया तीत । पूर्ण अवस्था बोध पुनि, छओं देहकी रीत ॥ ५३ ॥ निज निज कर्म प्रतापते, सुख दुख भोगन हेत । स्थूल शरीर प्रगट है, पांच पचीस गहि लेत ॥ ५४ ॥

पंचीकृत ।

तमगुणके प्रतापते, पांचों भेलम भेल । पंचीकृत सोई अहे, स्थूल जगतको खेल ॥५५॥ एक एकते पांच भई, प्रकृति पचीस निदान । ताही ते सब परगटे, पिण्ड ब्रह्माण्ड मुजान ॥५६॥

पचीस प्रकृति ।

अस्थि मांस नाडी त्वचा, रोम पाँचवों होय । पृथिवते यंह सब प्रगटे, प्रकृति कहावत सोय ॥५७॥ रक्त बीज अरु मूत्र जो, परसेवा युत लार । जल प्रकृति यह पाँच हैं, मनमें देखु विचार, ॥५८॥ आलस कांति क्षुधा तृषा, निद्रा पंचम जान । अगिन, प्रकृति यह पाँच हैं, जाने संत मुजान ॥ ५९ ॥ कटि उदर, हिरदय गला, पंचम शिर आकाश । पाँच जानु यह गगनकी, कीन प्रकृति प्रकाश ॥६०॥ भय मोह अरु क्रोध है, काम जानिये लोभ । सूक्ष्म प्रकृति आकाशकी, जाते उपजे क्षोभ ॥ ६१ ॥

(६४६)

कबीरपंथी—

सात धातु ।

स्थूल देहमें धातु है, सात कहत परमान । षट विकार पुनि याहिमें, बरनत ज्ञान निधान ॥ ६२ ॥ खाद्य अन्न परिणाम जो, सात रूप धर सोय । सप्त धातु तेहि कहत हैं, मूल देहको होय ॥ ६३ ॥ रस रक्त अरु मांस है, भेद अस्थि पुनि सोय । मजा षट बखानिये, सप्तम शुक्र सु होय ॥ ६४ ॥

चार खानि ।

चारि खानि जग विदित है, स्थूल जगत विस्तार । अचल उषमज अंडज कही, पुनि पिंडज संचार ॥ ६५ ॥

षट विचार ।

अस्ति जन्म औ वृद्धि पुनि, विपरिणाम क्षय नास । षट विकार ये देहके, स्थूल जगत परकास ॥ ६६ ॥

लिंग ।

नारि पुरुष औ नपुंसक, तीन लिंग प्रधान । स्थूल कला सो जानिये, प्रगट करे पहिचान ॥ ६७ ॥

शरीरका लक्षण ।

गोरा श्याम गोड्डुमना, काला जानु सुजान । पीत लाल रंग देहका, प्रत्यक्ष देखु प्रमान ॥ ६८ ॥

शरीरका रङ्ग ।

बौन नाट मंझोल पुनि, लम्बा चार प्रमान । गढन स्थूल विचारिये, रूप कुरुष निधान ॥ ६९ ॥

शरीरका वर्ण ।

अंधा काना पाँगुला, बहिरा गुंग बखान । लूला लंगडा कूबडा, स्थूल विशेषण जान ॥ ७० ॥

चार वर्ण ।

ब्राह्मण क्षत्री वैश्य युत, शूद्र वर्ण जो चार । स्थूल देहके कारणे, भये जगत विस्तार ॥ ७१ ॥

शब्दावली

(६४७)

चार वाक्य ।

ब्रह्मचर्य और गृहस्थ पुनि, वानप्रस्थ संन्यास । आश्रम चार बखानिये, देह स्थूल विलास ॥ ७२ ॥

स्थूल देहका प्रमाण ।

स्थूल देह परमान है, हाथ सु साढे तीन । लोक सो मृत्यु लोक है, एता वरण प्रवीन ॥ ७३ ॥

स्थूल देहको सम्बन्ध ।

जागृतमे यहि जीवको, नेत्र अहै अस्थान । गुण सु रजो गुण जानिये, सकती किया मान ॥ ७४ ॥

शिव्य प्रश्न ।

जागृतको अब भेद प्रभु, मोको देहु बताय । केहि विधि जड स्थूल सो जागृत कहु समझाय ॥ ७५ ॥

गुव उत्तर सूक्ष्म इन्द्रियोंको उत्पत्ति ।

पहिले सुनु शिष भेद अब, अपंचीकृत पसार । जाके परगट होतही, भयो जगत विस्तार ॥ ७६ ॥ अपंचीकृत भूतके, रजगुण अंश प्रपंच । पांच करम इन्द्री भये, भये प्राण सो पंच ॥ ७७ ॥ गुदा लिंग पग हाथ मुख, बिलग बिलग भय आप । कर्म इन्द्री तासों कहै, जपे कर्मको जाप ॥ ७८ ॥

पांच प्राणके नाम ।

प्राण अपान समान है, व्यान उदान प्रमान । पांच प्राण यहि कहत हैं, वायु प्रधान बखान ॥ ७९ ॥

पंच उपप्राणके नाम ।

नाग कूर्म किरकल कहे, देवदत्त पुनि जान । पंचवे धनञ्जय जानिये, उपप्राण तेहि मान ॥ ८० ॥

पांच अन्तःकरणके नाम ।

अपंचीकृत भूतके, सतगुन अंश मिलाप । अन्तःकरण परगट भये, अन्तर इन्द्री आप ॥ ८१ ॥ मन बुद्धि चित्त हंकाररू, अन्तः करण सुजान । यही पांच सो जानिये, अन्तर ज्ञान परमान ॥ ८२ ॥

(६४८)

कवीरपंथी—

पांच ज्ञानेन्द्रियोंके नाम ।

श्रोत्र त्वचा चक्षु कही, जिह्वा जान प्राण । पाँचों इन्द्री ज्ञानकी, साधन ज्ञान समान ॥ ८३ ॥

त्रिपुटी व्याख्या ।

अब इन्द्रिनके विषय अरु, देवहुँ कहौँ बखान । सुनियो शिष्य सु ध्यान दे, प्रत्यक्ष बचन प्रमान ॥ ८४ ॥ इन्द्रीसो अध्यात्म है, विषय जानु अधिभूत । अभिमानी अधिदेव है, सो त्रिपुटी समझत ॥ ८५ ॥ पाँच कर्म पंच ज्ञान रु अन्तःकरणहु जो पाँच । इन्द्री पन्द्रह जानिये, कहौँ त्रिपुटी सु बाच ॥ ८६ ॥

पांच कर्म इन्द्रियोंकी त्रिपुटी ।

गुदा विषय मल त्याग है, देव अहे यमराज । उपस्थ विषय सो भोग है, परजापति महाराज ॥ ८७ ॥ गमन विषय है पाँवका, वामन देव कहाय । पाणि विषय आदान है, देव इन्द्र बलराय ॥ ८८ ॥ बाक विषय है बोलना, अग्नि देव अधिकार । त्रिपुटी इन्द्री कर्मकी, मनमें राखु विचार ॥ ८९ ॥

पांच ज्ञानेन्द्रियोंकी त्रिपुटी ।

देव अश्विनी कुमार है, इन्द्री प्राण प्रमान । विषय गहत् है गंधको, इन्द्री ज्ञान समान ॥ ९० ॥ जिह्वा इन्द्री ज्ञान है, देव वरुण पहिचान । ग्रहण करै रसको विषय, अद्भुत कला निधान ॥ ९१ ॥ चक्षु देखे रूपको, देव सूर्य भगवान । इन्द्री त्वचा विषय स्पर्श, वायु देव पिछान ॥ ९२ ॥ शब्दहि गहे सो श्रोत्र है, देव अहे दिकपाल । त्रिपुटी इन्द्री ज्ञानकी, महा कठिन भ्रमजाल ॥ ९३ ॥

पांच अन्तःकरणकी त्रिपुटी ।

० अन्तःकरण अध्यात्म है, स्फुरण सो अधिभूत । महा विष्णु अधिदेव है, व्यापक विश्व विभूत ॥ ९४ ॥ मन जहाँ अध्यात्म है, अहे चन्द्र तहाँ देव । कल्प विकल्प अधिभूत है, जगका कारण भेव ॥ ९५ ॥ बुद्धि स्वतः अध्यात्म है, है निश्चय अधिभूत । ब्रह्मा तहाँ अधिदेव है, अनुभव लागू सूत ॥ ९६ ॥ चित अध्यात्म

शब्दावली

(६४९)

चित्तन करे, सो अधिभूत विचार । वासुदेव अधिदेव है, सबका मूल अधार ॥१७॥ अहंकार अध्यात्म जो, अधिभूत अभिमान । रुद्र कहो अधि देवता, सकल सृष्टि मंडान ॥ १८ ॥

त्रिपुटीकी स्पष्ट व्याख्या ।

करणसो अध्यात्म अहे, विषय अहे अविभूत । देव सोई अधिदेव है, त्रिपुटी कहै अवभूत ॥ १९ ॥

जागृत अवस्था स्वरूप ।

अपंचीकृत भूतकी, एती भई संतान । जागृत अवस्था अब कहूँ, सुनूँ शिष्य दे कान ॥ १०० ॥ इन्द्री कर्म अरु ज्ञान पुनि, मन बुधि चित्त हंकार । इनहीकी तिरपुटीसो, व्यालिस तत्त्व विचार ॥ १०१ ॥ पांच पचीसों संग मिलि, व्यालिस तत्त्व समुदाय । विश्वात्म जब कारज करे, जागृत सोई कहाय ॥ १०२ ॥

चार प्रकारकी वाणी ।

परा पश्यन्ति मध्यमा, सहित बैखरी चार । वाणी सोई पिछानिये, मूल जगत व्यवहार ॥ १०३ ॥

बैखरी स्वरूप ।

बैखरी कहिये बोल जो, मुखसे निकसे आय । स्थूल जगतमें प्रगट है, सबही देत लखाय ॥ १०४ ॥

सूक्ष्म देह वर्णन ।

सूक्ष्म देह अब कहत हौं, सुनु शिष्य दे कान । भिन्न भिन्न बरनत तेही, सज्जन बुद्धि निधान ॥ १०५ ॥

सूक्ष्म देहके तत्त्व ।

सूक्ष्म देहको कहत हैं, पन्द्रह तत्त्व प्रधान । कोइ कहत उन्नीस हैं, कोइ पचीस विधान ॥ १०६ ॥ कोइ कहत चालीस हैं, कोइ कहत हैं साठ । सत्तर कोई कहैं, कोई एक सौ आठ ॥ १०७ ॥ छियानवे कोई कहैं, नवहिं बतावे कोय । एक बातकी बात है, बहु विधि वरनत सोय ॥ १०८ ॥

पन्द्रह तत्त्वका सूक्ष्म शरीर ।

पांचो इन्द्री कर्म अरु, पांच ज्ञान समुदाय । प्राण पांच पुनि