कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 652, कुल 968 में से
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कबीरपंथी—
आठवीं रमनीका शेष ।
माया महा आदि भवानी । वेद पाठ शास्त्र जो बखानी ॥
... .. । छनिवंती देवी जयवंती ॥
... .. । नैनवान गहि सर्बहि पछारी ॥
... .. । सुरनर मुनि सबके घर खाया ॥
समै—केदली खंभ दोउ जंघा, छबि दोउ कुचन अनार ।
... .. आदर्श अति, झलकत चंद लिलार ॥
... .. सो छल किया, तीनों लीनसि खाय ।
... .. तीनोंके पीछे, जगको छलसि बनाय ॥
नीमी रमनीका बचा भाग ।
छलबल बहुत कीन वर नारी । दो संजोग भयी संसारी ॥
दो संजोग त्रिभुवन पर छावे । दोउ पर कीन नाहिं लखावे ॥
एक प्रान देखे दो देही । पुरुष न रहे एक सनेही ॥
बीज वृच्छ है एके संग। वृच्छ बीजका एके रंगा ॥
माया ते मन उपजा भाई । करता जिय ... .. ॥
इच्छा विपरीत भई इक संगति । ... .. ॥
बीज मंत्र सब सृष्टि करतामैं । ... .. ॥
करता फिर सबनते पुकारी । मानेसो ... .. ॥
समै—अष्ट धातका पूतला, ... .. ॥
कह कबीर सुमरो जन क ... .. ॥
दसवीं रमनीका शेष ।
सुन पंडित तैं बात हमारी । ... .. ॥
मन उपजा इच्छा भइ भारी । भौ संजोग पुरुष औ नारी ॥
ताते भये तीन यह बारा । बिन संजोग नहीं संसारा ॥
अन्तर प्राप्ति नहिं पाया । धोखा सेवा मूल गंवाया ॥
जाके प्रान नहीं है देही । रूप न रेखा प्रान विदेही ॥