भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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(६३८)

कबीरपंथी—

आठवीं रमनीका शेष ।

माया महा आदि भवानी । वेद पाठ शास्त्र जो बखानी ॥

... .. । छनिवंती देवी जयवंती ॥

... .. । नैनवान गहि सर्बहि पछारी ॥

... .. । सुरनर मुनि सबके घर खाया ॥

समै—केदली खंभ दोउ जंघा, छबि दोउ कुचन अनार ।

... .. आदर्श अति, झलकत चंद लिलार ॥

... .. सो छल किया, तीनों लीनसि खाय ।

... .. तीनोंके पीछे, जगको छलसि बनाय ॥

नीमी रमनीका बचा भाग ।

छलबल बहुत कीन वर नारी । दो संजोग भयी संसारी ॥

दो संजोग त्रिभुवन पर छावे । दोउ पर कीन नाहिं लखावे ॥

एक प्रान देखे दो देही । पुरुष न रहे एक सनेही ॥

बीज वृच्छ है एके संग। वृच्छ बीजका एके रंगा ॥

माया ते मन उपजा भाई । करता जिय ... .. ॥

इच्छा विपरीत भई इक संगति । ... .. ॥

बीज मंत्र सब सृष्टि करतामैं । ... .. ॥

करता फिर सबनते पुकारी । मानेसो ... .. ॥

समै—अष्ट धातका पूतला, ... .. ॥

कह कबीर सुमरो जन क ... .. ॥

दसवीं रमनीका शेष ।

सुन पंडित तैं बात हमारी । ... .. ॥

मन उपजा इच्छा भइ भारी । भौ संजोग पुरुष औ नारी ॥

ताते भये तीन यह बारा । बिन संजोग नहीं संसारा ॥

अन्तर प्राप्ति नहिं पाया । धोखा सेवा मूल गंवाया ॥

जाके प्रान नहीं है देही । रूप न रेखा प्रान विदेही ॥