कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसम्वादवली
(६३९)
... के पै कोइ न लखावे । पुरुष विदेही सबै बतावे ॥
... ... कहत पुकारा । जीमें कोई न करे विचारा ॥
... ... ... ... छीजे । माने नाता सो का कीजे ॥
समै-... ... करपूतला, करता ताहि सनेह ।
समरो जिन कबहूँ, जो है पुरुष विदेह ॥
न्यायहर्षी रत्नोत्तमा शेष ।
... बात हमारी आगम पंथा । स्त्रीके गोद खेलै कंथा ॥
वहिन ते पुत्री पुत्री भइ नारी । नारी ते फिर भई महतारी ॥
कंथ खेलावे पुत्रकै जाने । नारी पुत्र कंथकै माने ॥
पुत्र ते होय संजोगिन माता । पिता ते पुत्र पुत्र ते ताता ॥
यह अचरज कहु कासो कहिये । कहियेतो फिरकहु कहैरहिये ॥
पंडित पठ पठ वेद सुनावे । नाद बिंदकी खबर न पावे ॥
जोगी जती रंक औ राया । किनहुँ नहिं यह भेद बताया ॥
पिता छोड़िके निरगुन सेवा । ... ... ... भेवा ॥
समै-माता ते मेहरी भई, मेहरी ते भइ माय ।
जो नहिं सो सबका करता, अचरज कहा न जाय ॥
न्यायहर्षी रत्नोत्तमा बचा बुचा ॥
सुनु पंडितका वेद अरथावे । वेद पढे कछु भेद न पावे ॥
एकादशि बरतसो मन माना । पूजे देव औ पढे पुराना ॥ जिन
जिन पिताको चीन्हा भाई । थिर भया ... .. ॥ भूलत फिरी
सृष्टि सब धाई । पिता न लखा तजी न माई ॥ जेजे पुत्र पिताको
पाये । आप आपमें सबहिं समाये ॥ आपा चीन्हे सो बड ज्ञानी ।
पिता पुत्र एकै सहिदानी ॥ पिता पुत्रकी एके काया । मातु पिता
निरगुन बतलाया ॥ जो जाने यह भेद अतूपा । दुबिधा तजे ते
देख सुरूपा ॥