कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 651, कुल 968 में से
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समै--सुत नहि माने बात, सेवे पुरुष विदेह । कहैं कवीर अबहुँ ना चेतो, छाडो झूठ सनेह ॥
छठी रमैनीमे इतना बचा--
... ... महा बलिया । एक बार छलके फिर छलिया ॥ ... ... । अष्ट भुजी माया आदि भवानी ॥ .. ... । सावित्री सती लच्छ कुमारी ॥ ... ... । तीनहु मिल संजोग कराई ॥ ... ... । सो पुत्रन ते भयी बेभिचारी ॥ ... ... । फिर मदेशते छल बल कीन्हा ॥
असँख जुग लो कहि कहि हारा । सेवै सबै सून्य निरंकारा ॥ समै--त्रिगुन हेत हती महमाया, हता न वह बिस्तार । कहैं कवीर भरसु त्रिदेवा, कीन्ह न आप बिस्तार ॥
सातवी रमैनीका बचा हुआ ।
सुनु ब्रह्माते आदि कहानी । ... .. हमहै वहि देसकी नारी । ... .. कर हम मौंजे परे त्रय छाला । ... .. हमरे पुत्र होय तिर देव । ... ..
समै--ब्रह्मा जननीसे पूछे, ... ..
कौन बरन वहि पुरुष है, ... ..
रूप नहीं रेखा नहीं, ... ..
गगन मंडलके बाहिरें, ... ..
ध्यान जु धरो गगनका, मूँदिन बप्रकिवार ।
देख परतिमा आपनी, तीनों भये निहाल ॥
त्रिदेवाके सुमरते, सबका भया अकाज ।
ब्रह्माका आसन डिगा, सुनत आपनी गाज ॥