भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

( ६३७ )

समै--सुत नहि माने बात, सेवे पुरुष विदेह । कहैं कवीर अबहुँ ना चेतो, छाडो झूठ सनेह ॥

छठी रमैनीमे इतना बचा--

... ... महा बलिया । एक बार छलके फिर छलिया ॥ ... ... । अष्ट भुजी माया आदि भवानी ॥ .. ... । सावित्री सती लच्छ कुमारी ॥ ... ... । तीनहु मिल संजोग कराई ॥ ... ... । सो पुत्रन ते भयी बेभिचारी ॥ ... ... । फिर मदेशते छल बल कीन्हा ॥

असँख जुग लो कहि कहि हारा । सेवै सबै सून्य निरंकारा ॥ समै--त्रिगुन हेत हती महमाया, हता न वह बिस्तार । कहैं कवीर भरसु त्रिदेवा, कीन्ह न आप बिस्तार ॥

सातवी रमैनीका बचा हुआ ।

सुनु ब्रह्माते आदि कहानी । ... .. हमहै वहि देसकी नारी । ... .. कर हम मौंजे परे त्रय छाला । ... .. हमरे पुत्र होय तिर देव । ... ..

समै--ब्रह्मा जननीसे पूछे, ... ..

कौन बरन वहि पुरुष है, ... ..

रूप नहीं रेखा नहीं, ... ..

गगन मंडलके बाहिरें, ... ..

ध्यान जु धरो गगनका, मूँदिन बप्रकिवार ।

देख परतिमा आपनी, तीनों भये निहाल ॥

त्रिदेवाके सुमरते, सबका भया अकाज ।

ब्रह्माका आसन डिगा, सुनत आपनी गाज ॥