कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 650, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें(६३६)
कवीरचंथी—
परिशिष्ट ।
ज्ञानवीपककी रसैनी जो पृष्ठ ६७३ से आरम्भ होता है, उसीका यह परिशिष्ट भाग है, जिसको सूचना उसी पृष्ठको टिप्पणीमें दिया है, । सड़े हुए पत्रोंसे जहां तक पढ़े जा सकते हैं वहां दिया जाता है— (पहली रसैनीका पत्रा एक दस नष्ट हो गया)
दूसरी रसैनीको अन्तिम साखी ।
हद हता तब आप था, सकल हता ता मांहिं । ज्यों तरवरके बीजमें, डार पात फल छांहिं ॥
रसैनी तीसरी ३.
सब गुन पूरन माया रानी । उन फिर ... .. उन फिर रचा वृच्छ औ ... ..
और सब नष्ट हो गया इसकी अंतिम कड़ी
और समें बचे हैं तो यह है—
तीन पुत्र तिर विधि गुनकारी । हरि ब्रह्मा तिनके त्रिपुरारी ॥ समै--हम संजोग गुन तीनभै, उन्ह पुनि कीन्ह पसार । हमै छोड गुन तीनते, उन कीन्हवा बेभिचार ॥
चौथी रसैनीका केवल इतनी अन्तिम कड़ी शेष है ।
ब्रह्मा भूला देख लोभाना । माताते पुत्रन छल माना ॥ सुतते मातु ते नारी । पुत्रते पिता मात ते बारी ॥ समै--माताते मेहरी भयी, भया पूत ते बाप ।
कहैं कवीर बडा अचंभा, ... ..
पांचवी रसैनीमें इतना शेष है ।
मैं कहत हौं पंडित अगम विचारा । ... .. पुत्र सीख देइ महतारी । ... .. पिता तुम्हारा रहे निरंकारा । ... .. कहे ब्रह्मा ते रूप न रेखा । ... .. अरध न उरध पुरुष ना नारी । ... .. इतना सुनके बचन भुलाना । ... .. मातुकी बात ब्रह्मा नहिं बूझे । ताते पैडा नहिं कछु सूझे ॥