कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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लूटे पांडव औ बलदाता ॥ लूटे नाथ मच्छंदर जोगी । लूटे युधिष्ठिर षट् रस भोगी ॥ सुर नर मुनि सब लूटे झारी । सब मिल मानो बात हमारी । अष्टभुजी माया आदि भवानी । तिन लूटे ज्ञानी विज्ञानी ॥
समै-पाया सब जग लूटिया, भरम जालमें डार । कहैं कबीर क्या कीजिये, ना समझे संसार ॥ ऐचातानी सब करें, कटे न भरमक डार । चारो जुग सबको समझाया, कहा न मान हमार ॥
रमैनी २७८-एक शब्दका सकल पसारा । एक शब्द सबहींते न्यारा ॥ एक शब्द सब जीते हारे । एक शब्द सब एक विचारे ॥ एक शब्द नित मरे औ जीवे । एक शब्द खावे औ पीवे ॥ एक शब्द सब करे करावे । एक शब्द कहुं जाय न आवे ॥ एक शब्द नित बोले चाले । एक शब्द त्रिभुवनको पाले ॥ एक शब्दके बाप न माई । एक शब्द निज रहा छिपाई ॥ एक शब्द है सर्व सनेही । एक शब्दके प्रान न देही ॥ शब्द शब्द जो कहे विचारी । तो यह आतम मरे न मारी ॥
समै--कह पंडित अस बोल तुम, क्यों भटकावो लोग । कहैं कबीर शब्द एक है, वहि क्यों करो वियोग ॥ अपनेको अपना मिला, दो दो नेना जोय । सरबंगी सबसो मिला, दिलकी दुबधा खोय ॥ तिल समान यह जगत है, काहू परा न चीन्ह । कह कबीर सद्वृत्त मिले, ज्ञानदीप जिन दीन्ह ॥ भली भयी नैनो लखा, मिट्टी दूरकी आस । जो कोई समझे भले, सोई है धर्मदास ॥
इति ज्ञानदीपककी रमैनी संपूर्ण ।