कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
रमैनी २७५—चार यार मिल किनहु न जानी। बीबी फातमा जो पहचानी ॥ दसतार महम्मदी धरा उठाई। नूर महम्मदी दीन दिखाई ॥ सकल सृष्टि जो देख न पाया। कुंती जसोदा सोइ दिखाया ॥ कृष्णमई देखा संसारा। जिसके बखनका वार न पारा ॥ तेहि कारण हिंदू तप साधी। तेहि कारण उन कीन्ह उपाधी ॥
समै—मायाके यह सब गुन, चंचल चपल व्योहार।
छल छिद्र उन्ही बन आवे, करता इनते निनार ॥
नाटक चेटक अड़त अगम, रहा चहुँदिशि पूर।
कहैं कबीर यह भिस्त नहीं है, रहा सो खालिक दूर ॥
रमैनी २७६—एक महम्मद एक खुदाई। एक निरगुन एक सरगुन भाई ॥ निरवृत साथे लोग व्योहारा। रोजा नमाज दुनी ते न्यारा ॥ चहिये भिस्त चहिये दीदारा। राम चहिये औ सरग द्वारा ॥ पीर पैगम्बर औ चार यारी। बीबी फातमा बकसावन हारी ॥ देवी देवा आदि भवानी। एक दो नाहीं बहुत जिन जानी ॥
समै—एक साथे सब सघे, सब साथे सब जाय।
कहैं कबीर चेतो दोउ भाई, हम दीन्हो समझाय ॥
रमैनी २७७—लूटे ब्रह्मा हरि त्रिपुरारी। लूटे गौतम सुखदेव ब्रह्मचारी ॥ लूटे सनक सनंदन दोऊ। लूटे अगस्त विश्वामित्र ओऊ ॥ लूटे वशिष्ठ अत्री डुरवासा। शृंगीरिषि लूटे वन वासा ॥ पारासर लूटे माझ मंझारा। लूटे जमदग्नि औ सनतकुमारा ॥ लूटे गौस कुतुब बाबानी। लूटे औलिया अंबिया पीरानी ॥ महम्मद लूटे राह चलाई। लूटे चार यार जिनकी थी दुहाई ॥ लूटे ईसा मूसा मनसूरा। लूटे अरबहि मदीन के सूरा ॥ लूटे गोरख औ जैपाला। लूटे गोपी लूटे ग्वाला ॥ माधवाचारज लूटे जनकादे। रामानिज लूटे धर्मादे ॥ लूटे हनुवात नारद सपता।