कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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बिचारी ॥ रोगी रहे तदवीर कराईं । पढे नमाज मासको खाईं ॥ दो घडी रात रहे फिर जगहीं । सरगही खाय परे नर तबहीं ॥ जीव हने कहें खाया खुदाईं । उनका उलस लिया हम खाईं ॥ पीर पैगम्बर सबहीं खाया । जबह किया फातिया दिलाया ॥ साद भया तब ध्यान पर आया । सब देवनको अरप चढाया ॥ पहले भोग देवको दीन्हा । तब वह खाय आप फिर लीन्हा ॥ वैस्वदेव करे चितलाई । देव पितरको दीन खवाई ॥
समे--यहि धंधा दोनों मरे, करता चीन्हे नाहिं ।
बिन समझे जाने सुमिरे, यही भूल जग माहिं ॥
रमैनी २७३--कहो महम्मद मोहि समुझाईं । मामा होवा कहांते आईं ॥ आदम किसका पुत्र कहाया । उन कैसे विश्वरूप बनाया ॥ पंडित अपना खोल पुराना । विश्वरूपका करे व्याना ॥ ब्राह्मण ब्रह्मा कहांते आय । कैसेके यह सृष्टि उपाय ॥ लौट उमील करे बयाना । ओंकारको दीन प्रवाना ॥ कौन रूप कौनसा गाऊं । कौन देश निरगुनका नाऊं ॥
समे--पुरुष नार एक संग हैं, साथ बीज अंकूर ।
देश विलायत सुन्न पर, परिपूर्ण सदा हजूर ॥
रमैनी २७४--दोई दीन कहांते आये । कहो कैसे दो दीन चलाये ॥ वेद न काहू पेट पढाया । सुन्नत कराय तुरुक नहिं आया ॥ देव न देहरा रामउ खाये । पीर मसीत न अल्लह बनाये ॥ वेद पुरान न राम बखाना । अल्लह न पढा किताब कुराना ॥ रोजा नमाज न अल्लह पढाया । पूजा अरचा न राम बताया ॥ पूरब राम न कहा संदेशा ॥ पश्चिम अल्लह न कहा उपदसा ॥
समे--बहे लोग सब जात हैं, दो अगुवाके साथ ।
कहैं कवीर ऐसा कोइ नाहीं, जो गहि राखे हाथ ॥