भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरण्यी-

रमैनी २६९--गगन गुफा तहं राम हमारा । साध प्रान चला संसारा ॥ हिंदू चले सुन्नको भाई । ला मकान तुर्क लौ लाई ॥ पीर मुरीद दोऊ एक संगा । धोखे गये भये तेहि भंगा ॥ षट्दरशन छयानबे पारखंडा । सबे सुये चढे ब्रह्मण्डा ॥ सांचा भेद झटके माना । दोनों मिल झूठे लपटाना ॥

समै-सहकामी सेवा नहीं, सेवा सो जो निहकाम । धोखा सेवत जनम गँवाया, खोया किया न काम ॥ जहं काहूकी गम नहीं, नहीं चंद्र नहिं सेस । तहां कवीरा घर किया, सहूरुके उपदेस ॥

रमैनी २७०--दुइ जगदीश जगतमें छाया । मैं नहिं जानो कहाँ ते आया ॥ हजार नाम अछ्हाह कहाया । सहस्र नाम रामके गाया ॥ एक सुन्नी एक काफ़िर भाई । अपन अपन गुरु चीन्हो धाई ॥ तीरथ मूरत राम निवासा । मक्का मदीना अछ्हको बासा ॥ आप आपको दोनों लागे । करता आप न लखे अभागे ॥

समै--गगन गुफा बैठे हते, तिरबेनीके तीर ।

कहे कवीर सबही बैठे, सुन्न सिखर गंभीर ॥

रमैनी २७१--पंद्रह तिथि पंद्रह व्रत भाई । तुर्क मास रोजा ठहराई ॥ तीज दसहरा फाग दिवारी । दाहा सुबरात औ ईद बिचारी ॥ हिंदू खाया बकरा मारी । तुर्कन बकरी गाय पछारी ॥ हिंदूके घर वेद पुराना । तुरकनके ठहरा फरमाना ॥ हिंदूके निरगुन निरंकारा । तुरकनके बेचून बिचारा ॥ हिंदू नरक सरग ठहराया । तुर्कन भिस्त दोजख बतलाया ॥

समै--एक गांव दो बहिनी, दोनोंका एक नांव ।

दोनों पर एक बालक थे, बिन बूझे छूटे गांव ॥

रमैनी २७२--एकादसी व्रत रहा लौलाई । अन्न तजे छीर गऊको खाई ॥ निराधार रहे आतम जारी । करता आप न लखे

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