कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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मरे, देहते भया विदेह ॥ अल्लह राम दो करता, दोउका एक सुकाम । कह कवीर जगत सब, तहाँ लिया विसराम ॥
रौनी २६६-क्योंकर भये ब्राह्मन ! ब्रह्मानी । तुम दस कर्म वह एक न जानी ॥ काजी सुनि सुन्नत करावैं । घरकी नारी क्योंकर कहवावे ॥ पुरान बेद औ शास्त्र वे देवा । जगत हीन करो फिर सेवा ॥ तुर्क नमाज कुरान भुलाना । पढ पढ सुवा मरम नहि जाना ॥ वे कहैं अल्लह वे कहैं रामा । एकही घर दोऊ विसरामा ॥
समै--जो जाके मन छपजे, सो वह चितमें देह ।
कहैं कवीर यह बातें झूठी, समुझ हमारी लेइ ॥
रौनी २६७-कंठी माला इनके मन माना । उनके तसबी पर किया ठिकाना ॥ इन देव पूजा तीरथ ठहरावा । उन नमाजके दिल लावा ॥ इन बैकुंठ किया विसरामा । उन भिस्त चल लीन सुकामा ॥ इनके अगुवा ब्राह्मण भाई । उनके महम्मद रहे ठहराई ॥ इनके धोती चौका असनाना । उनके एकेके सब माना ॥ इनके दस करम रहे विचारी । उनके खतना सुन्नत संभारी ॥
समै-दो मारग दो करता, कहो कौन केहि देस ।
कहैं कवीरा दोनों ते पूछत, उनका लावो संदेस ॥
रौनी २६८-एक बीज दो बृच्छ कहाई । एक बीज दो क्योंकर भाई ॥ बेद न काहू पेट पढाया । सुन्नत कराये तुरक नहि आया ॥ माला कंठी तिलक न संगा । तसबी वह लिया न अंगा ॥ हिंदू तुरक हो कोइ न आया । हिंदू तुरक बीच ठहराया ॥ तुरक पश्चिम दिशि चले विचारी । हिंदू पूरब चले संभारी ॥ हिंदू तुरक कहा बिनाना । यहीं भया औ यहीं समाना ॥
समै बीज बृच्छ नहि चीन्हे, मरे दोय पद सब कोय ।
कहैं कवीर दोनों पच्छ छाडो, करता चीन्हो सोय ॥