कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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जो पृच्छद्, सुकृत शिष्य सुजान । सो सब मैं तोसों कहौं, रंच न संशय आन ॥ २९ ॥
शिल्प प्रश्न ।
गुरु भक्तिको भेद अब, जानि परो गुरु देव । जाकी कृपा कटाक्षते, मिटे सकल दुख लेव ॥ ३० ॥
तत्त्व स्वरूप ।
अब आगे मोते कहो, तत्त्व अतत्त्व विचार । जाकेजाने जीव जग, लहै मुक्ति ततसार ॥ ३१ ॥ तत दर्शन काते कहो, सुनु गुरु दीन दयाल । बिलग बिलग मोसे कहो, मिटे अविद्या जाल ॥ ३२ ॥ जड़ चेतन दो वस्तु हैं, अति प्रसिद्ध जग माहिं । इनकी पारख प्राप्ति विन, बन्धन छूटत नाहिं ॥ ३३ ॥
[सत्योपदेशानभिज्ञात्मा ॥]
शिल्प प्रश्न ।
जड़ चैतन दोऊ कहो, विलग विलग गुरु राय । तुमरी कृपा टाक्षते, अम सकल नसि जाय ॥ ३४ ॥
गुरु उत्तर ।
जड़ तम पुंज प्रसुप्त सम, अप्रबोध दुख रूप । चैतन परमानन्द घन, ज्ञान स्वरूप अनूप ॥ ३५ ॥
[सत्योपदेशाभिज्ञात्मा ।]
शिल्प प्रश्न ।
अस तम पुंज सु को अहै, जड़ असत्य दुख रूप । पहिले ताहि बतावहु, गुरु ज्ञानिनको भूप ॥ ३६ ॥
गुरु उत्तर ।
पांच तत्त्व त्रिगुण सहित, अष्टंगी जेहि नाम । आद्या माया जानिये, दृश्य जगत परिणाम ॥ ३७ ॥
शिल्प प्रश्न ।
पांच तत्त्वका नाम अरु, गुन त्रयनको धाम । माया आदि अष्टंगि जो, दृश्य जगत परिणाम ॥ ३८ ॥ बार बार बन्दन करूँ,