कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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कबीरपंथी—
तीसरे साधनको समझ ।
शम समाधान लो कहै, सम्पति षट है सोय । तीसर साधन ज्ञानको, चौथ सुमुखुता होय ॥ १९ ॥
सुमुखुत्व स्वरूप ।
इहै लोक परलोकलौ, बन्धन दीखे जाहि । मुक्त होनकी चाह जो, सुमुखुत्तन कहि ताहि ॥ २० ॥ साधन चार विचार भो, हिये जासु परकाश । तत दर्शनके पावते, होय अविद्या नाश ॥ २१ ॥
गुरु भक्ति शिष्य प्रश्न ।
साधन चार जान्यो भले, सुगुरु कृपा निधान । गुरु भक्ति कासे कहो, ताका करूं विधान ॥ २२ ॥
गुरु उत्तर—गुरु लक्षण ।
गू अँधियारे जानिये, रू कहिये परकास । मेटि अज्ञानहिं ज्ञानदे, गुरु नाम है तास ॥ २३ ॥ गुरु बहुत हैं जगतमें, परगट देखु विख्यात । सतगुरुके पाये विना, कबहुँ न भरम नसात ॥ २४ ॥ सत्य वस्तुको ज्ञानदे, भाने भरम संदेश । आतम तत्त्व लखावई, मेटि अविद्या लेश ॥ २५ ॥
गुरु भक्ति स्वरूप ।
ताहि गुरुकी शरणमें, हिये भक्ति निज धार । अद्वा युत अर्पण करे, असत सकल संसार ॥ २६ ॥ गुरु होय प्रसन्न जबे, लहे सु आतम ज्ञान । ताते सतगुरु भक्ति करी, लीजे पद निर्वाण ॥ २७ ॥ गुरु मेहिमा अतिशय विमल, संतन कियो बखान । ताहि विचारे बहुत विधि, पावे पूर्ण विधान ॥ २८ ॥ अब आगे
१ कबीर धर्मदर्शन ग्रन्थ मालाके प्रथम भागको देखो । जिसमें गुरुमहिमा सत और सत्यसंग महिमा आदिका सुन्दर विवरण है —लिलो—स्वामी युगलानन्द बिहारी—कबीर आश्रम—गो० हरसिया जि० बिलासपुर ली० पी० ।