कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
(६४२)
कबीरपंथी—
तीसरे साधनको समझ ।
शम समाधान लो कहै, सम्पति षट है सोय । तीसर साधन ज्ञानको, चौथ सुमुखुता होय ॥ १९ ॥
सुमुखुत्व स्वरूप ।
इहै लोक परलोकलौ, बन्धन दीखे जाहि । मुक्त होनकी चाह जो, सुमुखुत्तन कहि ताहि ॥ २० ॥ साधन चार विचार भो, हिये जासु परकाश । तत दर्शनके पावते, होय अविद्या नाश ॥ २१ ॥
गुरु भक्ति शिष्य प्रश्न ।
साधन चार जान्यो भले, सुगुरु कृपा निधान । गुरु भक्ति कासे कहो, ताका करूं विधान ॥ २२ ॥
गुरु उत्तर—गुरु लक्षण ।
गू अँधियारे जानिये, रू कहिये परकास । मेटि अज्ञानहिं ज्ञानदे, गुरु नाम है तास ॥ २३ ॥ गुरु बहुत हैं जगतमें, परगट देखु विख्यात । सतगुरुके पाये विना, कबहुँ न भरम नसात ॥ २४ ॥ सत्य वस्तुको ज्ञानदे, भाने भरम संदेश । आतम तत्त्व लखावई, मेटि अविद्या लेश ॥ २५ ॥
गुरु भक्ति स्वरूप ।
ताहि गुरुकी शरणमें, हिये भक्ति निज धार । अद्वा युत अर्पण करे, असत सकल संसार ॥ २६ ॥ गुरु होय प्रसन्न जबे, लहे सु आतम ज्ञान । ताते सतगुरु भक्ति करी, लीजे पद निर्वाण ॥ २७ ॥ गुरु मेहिमा अतिशय विमल, संतन कियो बखान । ताहि विचारे बहुत विधि, पावे पूर्ण विधान ॥ २८ ॥ अब आगे
१ कबीर धर्मदर्शन ग्रन्थ मालाके प्रथम भागको देखो । जिसमें गुरुमहिमा सत और सत्यसंग महिमा आदिका सुन्दर विवरण है —लिलो—स्वामी युगलानन्द बिहारी—कबीर आश्रम—गो० हरसिया जि० बिलासपुर ली० पी० ।
शब्दावली
(६४३)
जो पृच्छद्, सुकृत शिष्य सुजान । सो सब मैं तोसों कहौं, रंच न संशय आन ॥ २९ ॥
शिल्प प्रश्न ।
गुरु भक्तिको भेद अब, जानि परो गुरु देव । जाकी कृपा कटाक्षते, मिटे सकल दुख लेव ॥ ३० ॥
तत्त्व स्वरूप ।
अब आगे मोते कहो, तत्त्व अतत्त्व विचार । जाकेजाने जीव जग, लहै मुक्ति ततसार ॥ ३१ ॥ तत दर्शन काते कहो, सुनु गुरु दीन दयाल । बिलग बिलग मोसे कहो, मिटे अविद्या जाल ॥ ३२ ॥ जड़ चेतन दो वस्तु हैं, अति प्रसिद्ध जग माहिं । इनकी पारख प्राप्ति विन, बन्धन छूटत नाहिं ॥ ३३ ॥
[सत्योपदेशानभिज्ञात्मा ॥]
शिल्प प्रश्न ।
जड़ चैतन दोऊ कहो, विलग विलग गुरु राय । तुमरी कृपा टाक्षते, अम सकल नसि जाय ॥ ३४ ॥
गुरु उत्तर ।
जड़ तम पुंज प्रसुप्त सम, अप्रबोध दुख रूप । चैतन परमानन्द घन, ज्ञान स्वरूप अनूप ॥ ३५ ॥
[सत्योपदेशाभिज्ञात्मा ।]
शिल्प प्रश्न ।
अस तम पुंज सु को अहै, जड़ असत्य दुख रूप । पहिले ताहि बतावहु, गुरु ज्ञानिनको भूप ॥ ३६ ॥
गुरु उत्तर ।
पांच तत्त्व त्रिगुण सहित, अष्टंगी जेहि नाम । आद्या माया जानिये, दृश्य जगत परिणाम ॥ ३७ ॥
शिल्प प्रश्न ।
पांच तत्त्वका नाम अरु, गुन त्रयनको धाम । माया आदि अष्टंगि जो, दृश्य जगत परिणाम ॥ ३८ ॥ बार बार बन्दन करूँ,
(६४४)
कवीरपंथी—
श्रीगुरु दीन दयाल । भिन्न भिन्न वर्णन करि, हरहु अज्ञान विशाल ॥ ३९ ॥
गुरु उत्तर ।
(अष्टंगी (माया) का कर्म)
अव्याकृत अव्यक्त जो, मूल प्रकृति प्रधान । अद्या ताको कहत हैं, सुनु शिव शील निधान ॥ ४० ॥ पांच तत्त्व गुण तीन मिलि, अष्टंगी तेहि नाम । आठों आठो ते मिलो, भयो जगत परिणाम ॥ ४१ ॥
जगतका स्वरूप ।
चैतनके संयोगते, पाईं शक्ति अपेल । तनु मात्रा परगट कियो, गुण तीनन जगमेल ॥ ४२ ॥
पांच तन्मात्रा ।
शब्द स्पर्श अरु रूप है, रस अरु गन्ध अनूप । तन मात्रा यही कहत हैं, जाने सुनिवर भूप ॥ ४३ ॥
पांच तत्त्व ।
पृथ्वी अप अरु तेज है, वायू और अकाश । पांच तत्त्व यह जानिये, कारण विश्व प्रकाश ॥ ४४ ॥
तीन गुण ।
सत रज तम यह तीन जो, गुण कहियत है तात । पांच संग यह तीन मिलि, जगत सबे दरशात ॥ ४५ ॥
जगत ।
इनहीके संयोगते, भयो जगत सब आय । देह अवस्था कोश पुनि, जीव ईशलो भाव ॥ ४६ ॥ व्यष्टि समष्टिके भेदते, भया जगत प्रकास । जीव शीव सब परगटे, इनहीके हट भास ॥ ४७ ॥
जीव—शीव ।
व्यष्टि अभिमानी जीव है, समष्टि अभिमानी शीव । ज्ञान दृष्टि करि देखहु, यही जगतके पीव ॥ ४८ ॥
शब्दावली
(६४५)
शिष्य प्रपन्न ।
देह अरु अवस्था कही, हे गुरु मुनिवर भूप । परगट आप बखानिये, दीजे ज्ञान अन्नूप ॥ ४९ ॥
गुरु उत्तर-छः प्रकारकी देह ।
हृश्यमान जो जगत है, जानो देह मुजान । तासु भेद अव कहत हौं, सुनो शिष्य दे कान ॥ ५० ॥ पट प्रकारकी देह है, जामें अरुझा जीव । जीव शीवके भेद ते, भयो दास अरु पीव ॥५१॥ स्थूल सूक्ष्म कारण अरु, महाकारण पुनि जोय । कैवल पंचम जानिये, छठी हंस कहि सोय ॥ ५२ ॥
छः अवस्थाके नाम ।
जागृति स्वप्न सुषुप्ति है, तुरिया तुरिया तीत । पूर्ण अवस्था बोध पुनि, छओं देहकी रीत ॥ ५३ ॥ निज निज कर्म प्रतापते, सुख दुख भोगन हेत । स्थूल शरीर प्रगट है, पांच पचीस गहि लेत ॥ ५४ ॥
पंचीकृत ।
तमगुणके प्रतापते, पांचों भेलम भेल । पंचीकृत सोई अहे, स्थूल जगतको खेल ॥५५॥ एक एकते पांच भई, प्रकृति पचीस निदान । ताही ते सब परगटे, पिण्ड ब्रह्माण्ड मुजान ॥५६॥
पचीस प्रकृति ।
अस्थि मांस नाडी त्वचा, रोम पाँचवों होय । पृथिवते यंह सब प्रगटे, प्रकृति कहावत सोय ॥५७॥ रक्त बीज अरु मूत्र जो, परसेवा युत लार । जल प्रकृति यह पाँच हैं, मनमें देखु विचार, ॥५८॥ आलस कांति क्षुधा तृषा, निद्रा पंचम जान । अगिन, प्रकृति यह पाँच हैं, जाने संत मुजान ॥ ५९ ॥ कटि उदर, हिरदय गला, पंचम शिर आकाश । पाँच जानु यह गगनकी, कीन प्रकृति प्रकाश ॥६०॥ भय मोह अरु क्रोध है, काम जानिये लोभ । सूक्ष्म प्रकृति आकाशकी, जाते उपजे क्षोभ ॥ ६१ ॥
(६४६)
कबीरपंथी—
सात धातु ।
स्थूल देहमें धातु है, सात कहत परमान । षट विकार पुनि याहिमें, बरनत ज्ञान निधान ॥ ६२ ॥ खाद्य अन्न परिणाम जो, सात रूप धर सोय । सप्त धातु तेहि कहत हैं, मूल देहको होय ॥ ६३ ॥ रस रक्त अरु मांस है, भेद अस्थि पुनि सोय । मजा षट बखानिये, सप्तम शुक्र सु होय ॥ ६४ ॥
चार खानि ।
चारि खानि जग विदित है, स्थूल जगत विस्तार । अचल उषमज अंडज कही, पुनि पिंडज संचार ॥ ६५ ॥
षट विचार ।
अस्ति जन्म औ वृद्धि पुनि, विपरिणाम क्षय नास । षट विकार ये देहके, स्थूल जगत परकास ॥ ६६ ॥
लिंग ।
नारि पुरुष औ नपुंसक, तीन लिंग प्रधान । स्थूल कला सो जानिये, प्रगट करे पहिचान ॥ ६७ ॥
शरीरका लक्षण ।
गोरा श्याम गोड्डुमना, काला जानु सुजान । पीत लाल रंग देहका, प्रत्यक्ष देखु प्रमान ॥ ६८ ॥
शरीरका रङ्ग ।
बौन नाट मंझोल पुनि, लम्बा चार प्रमान । गढन स्थूल विचारिये, रूप कुरुष निधान ॥ ६९ ॥
शरीरका वर्ण ।
अंधा काना पाँगुला, बहिरा गुंग बखान । लूला लंगडा कूबडा, स्थूल विशेषण जान ॥ ७० ॥
चार वर्ण ।
ब्राह्मण क्षत्री वैश्य युत, शूद्र वर्ण जो चार । स्थूल देहके कारणे, भये जगत विस्तार ॥ ७१ ॥
शब्दावली
(६४७)
चार वाक्य ।
ब्रह्मचर्य और गृहस्थ पुनि, वानप्रस्थ संन्यास । आश्रम चार बखानिये, देह स्थूल विलास ॥ ७२ ॥
स्थूल देहका प्रमाण ।
स्थूल देह परमान है, हाथ सु साढे तीन । लोक सो मृत्यु लोक है, एता वरण प्रवीन ॥ ७३ ॥
स्थूल देहको सम्बन्ध ।
जागृतमे यहि जीवको, नेत्र अहै अस्थान । गुण सु रजो गुण जानिये, सकती किया मान ॥ ७४ ॥
शिव्य प्रश्न ।
जागृतको अब भेद प्रभु, मोको देहु बताय । केहि विधि जड स्थूल सो जागृत कहु समझाय ॥ ७५ ॥
गुव उत्तर सूक्ष्म इन्द्रियोंको उत्पत्ति ।
पहिले सुनु शिष भेद अब, अपंचीकृत पसार । जाके परगट होतही, भयो जगत विस्तार ॥ ७६ ॥ अपंचीकृत भूतके, रजगुण अंश प्रपंच । पांच करम इन्द्री भये, भये प्राण सो पंच ॥ ७७ ॥ गुदा लिंग पग हाथ मुख, बिलग बिलग भय आप । कर्म इन्द्री तासों कहै, जपे कर्मको जाप ॥ ७८ ॥
पांच प्राणके नाम ।
प्राण अपान समान है, व्यान उदान प्रमान । पांच प्राण यहि कहत हैं, वायु प्रधान बखान ॥ ७९ ॥
पंच उपप्राणके नाम ।
नाग कूर्म किरकल कहे, देवदत्त पुनि जान । पंचवे धनञ्जय जानिये, उपप्राण तेहि मान ॥ ८० ॥
पांच अन्तःकरणके नाम ।
अपंचीकृत भूतके, सतगुन अंश मिलाप । अन्तःकरण परगट भये, अन्तर इन्द्री आप ॥ ८१ ॥ मन बुद्धि चित्त हंकाररू, अन्तः करण सुजान । यही पांच सो जानिये, अन्तर ज्ञान परमान ॥ ८२ ॥
(६४८)
कवीरपंथी—
पांच ज्ञानेन्द्रियोंके नाम ।
श्रोत्र त्वचा चक्षु कही, जिह्वा जान प्राण । पाँचों इन्द्री ज्ञानकी, साधन ज्ञान समान ॥ ८३ ॥
त्रिपुटी व्याख्या ।
अब इन्द्रिनके विषय अरु, देवहुँ कहौँ बखान । सुनियो शिष्य सु ध्यान दे, प्रत्यक्ष बचन प्रमान ॥ ८४ ॥ इन्द्रीसो अध्यात्म है, विषय जानु अधिभूत । अभिमानी अधिदेव है, सो त्रिपुटी समझत ॥ ८५ ॥ पाँच कर्म पंच ज्ञान रु अन्तःकरणहु जो पाँच । इन्द्री पन्द्रह जानिये, कहौँ त्रिपुटी सु बाच ॥ ८६ ॥
पांच कर्म इन्द्रियोंकी त्रिपुटी ।
गुदा विषय मल त्याग है, देव अहे यमराज । उपस्थ विषय सो भोग है, परजापति महाराज ॥ ८७ ॥ गमन विषय है पाँवका, वामन देव कहाय । पाणि विषय आदान है, देव इन्द्र बलराय ॥ ८८ ॥ बाक विषय है बोलना, अग्नि देव अधिकार । त्रिपुटी इन्द्री कर्मकी, मनमें राखु विचार ॥ ८९ ॥
पांच ज्ञानेन्द्रियोंकी त्रिपुटी ।
देव अश्विनी कुमार है, इन्द्री प्राण प्रमान । विषय गहत् है गंधको, इन्द्री ज्ञान समान ॥ ९० ॥ जिह्वा इन्द्री ज्ञान है, देव वरुण पहिचान । ग्रहण करै रसको विषय, अद्भुत कला निधान ॥ ९१ ॥ चक्षु देखे रूपको, देव सूर्य भगवान । इन्द्री त्वचा विषय स्पर्श, वायु देव पिछान ॥ ९२ ॥ शब्दहि गहे सो श्रोत्र है, देव अहे दिकपाल । त्रिपुटी इन्द्री ज्ञानकी, महा कठिन भ्रमजाल ॥ ९३ ॥
पांच अन्तःकरणकी त्रिपुटी ।
० अन्तःकरण अध्यात्म है, स्फुरण सो अधिभूत । महा विष्णु अधिदेव है, व्यापक विश्व विभूत ॥ ९४ ॥ मन जहाँ अध्यात्म है, अहे चन्द्र तहाँ देव । कल्प विकल्प अधिभूत है, जगका कारण भेव ॥ ९५ ॥ बुद्धि स्वतः अध्यात्म है, है निश्चय अधिभूत । ब्रह्मा तहाँ अधिदेव है, अनुभव लागू सूत ॥ ९६ ॥ चित अध्यात्म
शब्दावली
(६४९)
चित्तन करे, सो अधिभूत विचार । वासुदेव अधिदेव है, सबका मूल अधार ॥१७॥ अहंकार अध्यात्म जो, अधिभूत अभिमान । रुद्र कहो अधि देवता, सकल सृष्टि मंडान ॥ १८ ॥
त्रिपुटीकी स्पष्ट व्याख्या ।
करणसो अध्यात्म अहे, विषय अहे अविभूत । देव सोई अधिदेव है, त्रिपुटी कहै अवभूत ॥ १९ ॥
जागृत अवस्था स्वरूप ।
अपंचीकृत भूतकी, एती भई संतान । जागृत अवस्था अब कहूँ, सुनूँ शिष्य दे कान ॥ १०० ॥ इन्द्री कर्म अरु ज्ञान पुनि, मन बुधि चित्त हंकार । इनहीकी तिरपुटीसो, व्यालिस तत्त्व विचार ॥ १०१ ॥ पांच पचीसों संग मिलि, व्यालिस तत्त्व समुदाय । विश्वात्म जब कारज करे, जागृत सोई कहाय ॥ १०२ ॥
चार प्रकारकी वाणी ।
परा पश्यन्ति मध्यमा, सहित बैखरी चार । वाणी सोई पिछानिये, मूल जगत व्यवहार ॥ १०३ ॥
बैखरी स्वरूप ।
बैखरी कहिये बोल जो, मुखसे निकसे आय । स्थूल जगतमें प्रगट है, सबही देत लखाय ॥ १०४ ॥
सूक्ष्म देह वर्णन ।
सूक्ष्म देह अब कहत हौं, सुनु शिष्य दे कान । भिन्न भिन्न बरनत तेही, सज्जन बुद्धि निधान ॥ १०५ ॥
सूक्ष्म देहके तत्त्व ।
सूक्ष्म देहको कहत हैं, पन्द्रह तत्त्व प्रधान । कोइ कहत उन्नीस हैं, कोइ पचीस विधान ॥ १०६ ॥ कोइ कहत चालीस हैं, कोइ कहत हैं साठ । सत्तर कोई कहैं, कोई एक सौ आठ ॥ १०७ ॥ छियानवे कोई कहैं, नवहिं बतावे कोय । एक बातकी बात है, बहु विधि वरनत सोय ॥ १०८ ॥
पन्द्रह तत्त्वका सूक्ष्म शरीर ।
पांचो इन्द्री कर्म अरु, पांच ज्ञान समुदाय । प्राण पांच पुनि
(६५०)
कवीरपंथी—
लीजिये, मन बुधि संग सहाय ॥ १०९ ॥ ऐसे सत्रह तत्त्वकी, सूक्ष्म देह परमान । औरो यहि विधि जानिये, सब जो करत बखान ॥ ११० ॥
उत्तीस तत्त्वका सूक्ष्म शरीर ।
उपर्युक्त सत्रह तत्त्वमें, अहं अरु चित्त मिलाय । उनइस इमि सो भाषते, औरो सुनो बनाय ॥ १११ ॥
पचीस तत्त्वका सूक्ष्म शरीर ।
इन्द्री ज्ञान अरु कर्म जो, विषय प्राण समुदाय । अन्तःकरण सो पाँच मिलि, कहत पचीस सुनिराय ॥ ११२ ॥
साठ तत्त्वका सूक्ष्म शरीर ।
पन्द्रह इन्द्री विषय सहित, पन्द्रह देव मिलाय । पाँच विकार दश प्राण युत, भये साठ समुदाय ॥ ११३ ॥ कारन कारज भेदते, भयो अनेक समुदाय । एक बातकी बातको, बहु विधि मानत आय ॥ ११४ ॥ हेतु सबनको एक है, होय बोध परकास । स्वप्नावस्था जानिके, छुटे अविद्या भास ॥ ११५ ॥
कारण शरीर ।
कारण शरीर अज्ञान है, सुषुप्ति अवस्था जाहि । सृष्टि मूल बखानिये, शून्य रूप जहँ आहि ॥ ११६ ॥ तत्त्व दर्शन वर्णन किये, सूक्ष्म रूप बखान । सविस्तार सो देखिये, टीका माहि निदान ॥ ११७ ॥ अध्यात्म दर्शन नाम है, पंची करन विरुध्यात । बूझे विचारे जो उसे, छुटे अविद्या घात ॥ ११८ ॥ चराचर अनुचर जानिये, युगलानन्द अविद्यान । हेतु सुमुक्षु सो लिखे, दया धर्म परधान ॥ ११९ ॥ जो चाहत जानन अधिक, पंची करन परेखु । आतम दर्शन नाम जिहिँ, लेहु सुमुक्षु सरेखु ॥ १२० ॥ कवीर आश्रम विदित है, पोस्ट खरसिया जाहि । जिला अहै विलास पुर, मध्य प्रदेशके माहि ॥ १२१ ॥
इति श्री अध्यात्मदर्शनका प्रथमखंडतत्त्वदर्शन नामक ग्रन्थ कबीराश्रमाचार्य्य स्वामी श्रीयुगलानंद बिहारी विरचित समाप्त शुभम् ।
सत्यनाम
शब्दावली-पांचवाँ खंड ।
वसंत प्रारम्भः ।
वसंत १-ऐसो वसंत नहिं बार बार । खेलि लेहु दिन चार चार ॥टेक॥ करि साथ संगति गडवा मंझारि । मन मोरि राखि जायै संभारि ॥ प्रीति वसन सो ढोंकि लेह । लै सुमति सखीकै हाथ देह ॥ सुन्न महले मैं रचो खेल । चित चोवा परमारथ फुलेल ॥ अभै अरगजा लेहु हाथ । तुम या विधि चरचा प्रान नाथ ॥ सुकृत नीरमै नहाय लेह । भरम भार टरै सुध होय देह ॥ कहैं कवीर ऐसे खेले संत । तब कुसल होयगी आदि अंत ॥
वसंत २-तुम देखो सन्तो थिर वसंत । सतगुरु संगति सुख अनंत ॥ टेक ॥ थिर वसंत नहिं जाने भेद । पार न पावे सुमृति वेद ॥ आदि विष्णु ब्रह्मा महेस । पार न पावे पुरान सेस ॥ थिर वसंत नहिं जाने सार । उपजै विनसै बारम्बार ॥ थिर नाहिं जहाँ झरै है पात । पवन सरूपी जम करै घात ॥ निरगुन सरगुन दोय उपाय । षट दर्शन सब येही लौ लाय ॥ भँवर जाल फिरि फिरि भुलाय । जंजाल रंग सब मिटि न जाय ॥ जहाँ निसि वासर नहिं चंद सूर । नहीं तीन लोक वैकुंठ सूर ॥ नहीं जहाँ सून्य नहीं जहाँ कार । नहीं जहाँ निरंजन निराकार ॥ थिर वसंत जहाँ थिर शरीर । थिर तरवर जहाँ पात थीर ॥ थिर वसंत जो जाने भेद । ताकी भवजल नहीं है खेद ॥ थिर वसंत जो जाने रहै ।
(६५२)
कवीरपंथी—
अमर होय पद अमर लहै ॥ कहै कवीर थिर कहो बुझाय । थिर समाय अमृत फल पाय ॥
वसंत ३—अनभै बसंत खेलो सुजान । भरम भाव नहि होय हानि ॥ टेक ॥ प्रथम वसंत मेल्यो शरीर । गुरु संजम मन धरो धीर ॥ पिचकारी करि हेत लीन्ह । काम कोधको टारि दीन्ह ॥ दूजे मेरो मन महामंत । ताको काहु न लह्यो अन्त ॥ कुबुधि गुलाल उड़ावै सोय । सुर नर सुनि सब गये विगोय ॥ नाद विंद तहां लागे बंद । यह वसंत थिर होय कंद ॥ थिर होय विंद प्रकासे चंद । परम ज्योति परगट अनन्द ॥ कहै कवीर यह परम खेल । सत्सुकृत सो भय मेल ॥ काल जाल सब दीन्ह मेट । तब पार ब्रह्मसो भई भेट ॥
वसंत ४—जहां सुरति सुहागनि खेले फाग । पार ब्रह्म तहां करै राग ॥ टेक ॥ अनहद सुरली बाजे तूर । विन रसना सुर ऊठत पूर ॥ ध्वनि सुनि सीतल भयो गात । सरवन रुचत नहीं और बात ॥ लौकर भूषन पहै अंग । सीलको सिंदुर दियो है मंग ॥ लखि दर्पन सतगुरुके बैन । ज्ञानको अंजन दियो है नैन ॥ लोक लाज सब डारि दीन्ह । प्रेम छाड़ी गह हाथि लीन्ह ॥ सुमति सखीको कियो संग । रच्यो खेल जहां विविध रंग ॥ घेरि घारि जब होरी कीन्ह । ब्रह्म अग्नि जहां लेस दीन्ह ॥ सब जरि गई उड़ानी धूरि । ब्रह्म निरंतर रह्यो पूरि ॥ गगनि गली जहां मगन रुयाल । तहां लखि पायो अलख लाल ॥ हिलि मिलिकै किन्हौ विलास । जनम जनमकी मिटी भास ॥ रसातल भूतल अरु अकास । प्रेम सुगन्धकी फैली वास ॥ कहै कवीर मोहि भावै संत । जो या विधि खेलै रिनु वसंत ॥
शब्दावली
(६५३)
वसंत ५-को का को पुरुष को काकी नारि । ये सब संगी दिवस चारि ॥ टेक ॥ को काको पिता कोउ काको पूत । जन्म जन्मके उरइयो सूत ॥ जो सुरझावै सोई सुजान । मेरि मेरि करता तजै प्रान ॥ को काकी माय को काकी धीय । समझि देखि नर अपने जीय ॥ अंत काल जब पहुँचे आय । बाँह पकड़ि जम लिये जाय ॥ को काको कुटुम्ब को काकी जाति । अंतकाल कोई संग न साथि ॥ यामैं नहीं अपनो है कोइ । सत शब्द सुनि लेहो लोइ ॥ हैर उगौरी बड़ धोखा कीन । झूठी माया संग लीन ॥ या बाजीको लखै जु कोय । कहैं कवीर जन भेदी होय ॥
वसंत ६-वन माली जाने बनकी आदि । राम भजन बिना जनम वादि ॥ टेक ॥ एक फूल जो फुल्यो रितु वसंत । जामैं मोहि रहे सब जीव जन्तु ॥ फूलनमें ज्यों वसत वास । ऐसे घट घट गोविंद निवास ॥ उड उड रे भौरा जायओ देस । मेरे हरि प्रीतम सोक हो संदेस ॥ चोली पुरानी जीवन भार । मोहि विरह सतावे बार बार ॥ ऊंचा पर्वत विषम घाट । अगम पंथ न सूझे वाट ॥ पर बेली रातयो मेरा कंत । मैं का संग खेलौं रितु वसंत ॥ रितु वसंतकी परी झूल । अंब मोरे कचनार फूल ॥ कहैं कवीर मन भयो आनंद । मोहि हरषि मिलै गुरु रामानंद ॥
वसंत ७-कोइ हैरे हमारा गांवका । जासु परचै बूझूं हाँवका ॥ टेक ॥ विन बादल बरषै अखंड धार । बिन बीज चमकै अति अपार ॥ शशि भानु बिना होय प्रकास । सतगुरुके शब्द लियो निवास ॥ वृच्छ एक जहां अति अनूप । जाके साखा पंचम छाँह धूप ॥ बिन फूलन भौरा करै गुंजार । फल लाग्यो जाके निराधार ॥ ऊंच नीच नहीं जाति पांति । जहां त्रिगुन न व्यापे सदा सांति ॥ हरष शोक नहीं राग दोष । सदा आनंद संसे न
(६५४)
कवीरपंथी-
सोग ॥ अखण्ड पूरी एक नगर नाम । जहाँ वसिये साथो सहज धाम ॥ उपजे न बिनसे आवे न जाय । कहैं कवीर तहाँ रहो समय ॥
वसंत ८-सतगुरु खेले रितु वसंत । परम पुरुष जहाँ साधु संत ॥ टेक ॥ तीन लोकते भिन्न राज । जहाँ अनहद बाजा बजे बाज ॥ जहाँ चहुँ दिशि जोति उगे अपार । तहाँ विरलो जन कोह उतरे पार ॥ जहाँ कोटि कृष्ण नवाँँ माथ । कोटि विष्णु खड़े जोड़े हाथ ॥ कोटि महादेव धैर ध्यान । कोटि ब्रह्मा जहाँ पड़े पुरान ॥ जहाँ कोटि सरस्वति करै राग । कोटि इन्द्र फिरे गोहन लाग ॥ कोटि दुरगा जहाँ करै सिंगार । कोटि कुबेर जहाँ भैर भंडार ॥ जहाँ चोवा चंदन अरु अबीर । पुहुप बासरस गहर गंभीर ॥ सुरति सुरंग सुवास लीन्ह । सत्यलोकमें वास कीन्ह ॥ अजर द्रौपमें पहुँचे जाय । अजर पुरुषको दरस पाय ॥ कहैं कवीर लीजो विचार । नरक उधारन नाम हमार ॥
वसंत ९-या सुन्दर तनमें मनुआ भुलान । जाते जम धरि करै हान ॥ टेक ॥ कुबुद्धि सखी सो ताको नेह । भरि पिचकारी कुमति देह ॥ निसि दिन भ्रमको खेले खेल । आसा तृष्णा संग मेल ॥ दम्भ कपट डफ बाजे ताल । कंठ विषयकी डारि माल ॥ नाचत गति लिये और और । करै निरति गति लहै न ठौर ॥ आप आपको जानै नाहिं । परचो भरम गति भीर माँहिं ॥ सतगुरुको जो संग होय । लहै अमरपद अमर घर सोय ॥ छाडो खेल विकार मूल । भरम माँहिं कयूँ रहे भूल ॥ कहै कवीर विचारि देख । सत शब्द गहि कर विवेक ॥
वसंत १०-जहाँ नित वसंत अमृत निधान । सतपुरुष जहाँ सत् ध्यान ॥ टेक ॥ अगम अगाध लीला अपार । सुर नर मुनि सब रहे हार ॥ पुहुप अखंडित सेत भास । सत् पुरुष तहाँ कीयो
शब्दावली
(६५५)
बास ॥ बाजै नाद अखण्ड घोर । ताल मृदंगका बहुत सोर ॥ बिन पग निरति तहाँ होय नाच । बिन मुख बोले शब्द सांच ॥ फुले वसत बिन पुष्टुप वेल । सेत भँवर तहाँ करै केल ॥ नाना वरन अरु नाना रंग । बिन सरवर तहाँ उठे तरंग ॥ उनमुनिता जो होय नैन । सो लखि पावे संत सैन ॥ कहै कबीर कोई लहै न अन्त । मुखसागरमें मुखख बसंत ॥
वसंत ११-ऐसो खेलो संतो मन भये बिसारि । जम जालमकी मेटो रागि ॥ टेक ॥ जहाँ पांच मवासी घेरै गैल । मन राजा तहाँ करै खेल ॥ सखी पञ्चीस तहाँ करै सोर । अनहद बाजा बजै घोर ॥ ज्ञान गलीमें बाढै आय । सुरति निरति कोसंग लाय ॥ करि सनेह जो खेले फाग । भवसागरका करहु त्याग ॥ होय अचिंत जो चिन्ता मिटाय । सतगुरु पद मैं रहै समाय ॥ कहै कबीर गुरु किरपा कीन । भय छूटा तब फगवा दीन ॥
वसंत १२-तुम सुनियो संतो जुग वसंत । कोई अगम विवेकी बूझै संत ॥ टेका ॥ बसे नगर तहाँ उठै घोर । पांच सखी तहाँ करै सोर ॥ रंग रंगीली नौऊ नारि । विषम सरोवर रची धमारि ॥ नाना विधि सों करै कलोल । ताल मृदंग अरु बाजै ढोल ॥ चौरासी पिचकारी हाथ । लिये सखी सब फिरै साथ ॥ अहं गुलाल लिये गोद माँहि । सुर नर मुनि कोइ बच्यो नाहि ॥ मन राजाके सबही संग । बाढे भये तहाँ जमुना गंग ॥ उततैं आये ज्ञान बीर । सुरति निरति लिये संग धीर ॥ पिचकारी हित प्रेम लीन । सुमति सखीके हाथ दीन ॥ सेत अबीर उडावै हेल । ऐसा अद्वुत अगम खेल ॥ कहै कबीर कोई लखै साथ । जिन त्रिगुन तापकी तजी उपाधि ॥
(६५६)
कबीरपंथी-
वसंत १३-खेलत वसंत मन महा मोह । विषय फाँस तन देह छोह ॥ टेक ॥ आलस महलमें करै केल । आशा तृष्णा संग मेल ॥ अहंकार मद मंत्री संग । कुबुधि सखी सुं करै रंग ॥ लिये हाथ डफ डिम्भ करै । ब्रह्मादिक जिन लिये घेरि ॥ करै उलाहल काम वीर । महादेव कौ मारचो तीर ॥ इन्द्रासन लुटचो बनाय । सुर नर मुनि सब लिये खाय ॥ नर नारी नहीं देवैं चैन । निसि दिन बोलै विषय बैन ॥ सब बन फूले विषय वसंत । ताहि जरावै विवेकी संत ॥ उग्र ज्ञान मिलि मता कीन । सुरति सखी तिहि साथ दीन ॥ ब्रह्म अग्नि औटावे रंग । विषय बान सब कीये भंग ॥ सत् शील संतोष चैन । सत् शब्द मुख बोलै बैन ॥ सत् संतोष सुखमें समाय । गुरु मुख खेलै वसंत गाय ॥ कहैं कबीर मिटचो गरभ जंत । सुख सागर सुख निधि वसंत ॥
वसंत १४-मोह निरपति खेलै वसंत । सुर नर मुनि कोइ लहै न अंत ॥ टेक ॥ काम प्रधान तिहि राव साथ । सकल सभा मिली रच्यो राथ ॥ पांच बान पिचकारी लीन । पांचू पांच मिलि खेल कीन ॥ संकट करि करि मोरचो उजासु । होय अकरण न रहचो उदासु ॥ मोहनी होय सब हरचो ज्ञान । मारचो शिवको पुहुप बान ॥ कुमति सखी तहां खेलै खेल । चौरासी सब दीये ठेल ॥ सुभ असुभ तहां गावे गीत । लालच लोभमें सबै भात ॥ जोगी वनमें करै जोग । मारे बान तहां जाय लोभ ॥ जोग जुगति कछु रहै न थीर । पुहुप बान लग्यो शरीर ॥ रावन मारचो महा मोह । भक्त जना सों कियो द्रोह ॥ माया मोह लाग्यो राय । सबकूं मोह नरेस खाय ॥ अभिमान बान डुरजोधन लीन । वचन हेत नहीं भयो अधीन ॥ ताको लालच लाग्यो बान । मोह नृपतिने मारचो तानि ॥ एक ओर भयो मोह राव । इत विवेकने लायो दाव ॥
शब्दावली
(६५७)
सुरति निरति पिचकारी प्रेम । शील संतोष अति बचन हेम ॥ खेलन लागे मगन होय । तहां मोह पुनि चलयो रोय ॥ छिकत छिमां छबीले रंग । सुमति सखि तहां लीये संग ॥ काम क्रोध तहां परे छीन । महा मोह तहां भय हीन ॥ खेलै विवेक संतोष संत । कहै कवीर सुख निधि वसंत ॥
वसंत १५-चल भौरा जहां नित वसंत । अवसर गये न फिर मिलंत ॥ टेक ॥ सुख सागर जहां सुख निधान । तहां ग्रीषम नहीं करत हान ॥ जहां कुमुद फूले अनंत हो । तहां भँवरा खेलत वसंत ॥ कुंज सवन तहां कुहके मोर । प्रेम बुंद सागर हिलोर ॥ स्वतः प्रकास सो बन फूलंत । सुख निधान तहां करू बसंत ॥ यहि बन विषय विकार भोग । जहां व्यापै संसै महा सोग ॥ चलो वहाँ यहां तजो संत । जहां जोग जीत खेलै बसंत ॥ तहां यह पुहप अगर महाँके सुवास । सेत गुलाल अरू सेत भास ॥ सत पुरुष जहां मिलै कंत । कहै कवीर तहां करो बसंत ॥
वसंत १६-काम कला खेलै वसंत । गिने न काहू अति मैमंत ॥ टेक ॥ नैन सैन पिचकारी लीन । ले इन्द्रिनके हाथ दीन ॥ सकल संग ये मारे खाय । सुर नर सुनि सब दिये ढाय ॥ देख रूप मन करै भंग । कुबुधि सखी लिय धावै संग ॥ बदन देखि मति भये हीन । करै क्रोध सब देह छीन ॥ गुन अवगुन कछु गिने नाहिं । सबही को करै एक राहि ॥ अन्त न जानै कहा होय । जम द्वारे ले करै विगोय ॥ मोह रूपकी कला बनाय । जहैं तहैं फंदा रह्यो फंदाय ॥ मैं तू खेलको करत रारि । बाँह पकड़ि डारे पछारि ॥ तीन लोकमें डारे रोर । व्यापित करै अधियारै घोर ॥ गति मति सबहि गई हिराय । मदन बान तन रह्यो समाय ॥ अरे नर मूरख अबकी चेत । अब जानौ कछु याको हेत ॥ विष
(६५८)
कवीरपंथी—
अमृत निरवारो भेद । छोड़ो बाद विवाद खेद ॥ जो विष खाये सो परलय होय । विन अमृत नहीं बाँचे कोय ॥ था औसर तू मुट मान । सत शब्दको गहो प्रमान ॥ मिलि सतगुरु सो खेलो खेल । जरा मरनकी मिटे जेल ॥ कहैं कवीर गहो सत भाव । बहुरि न ऐसो पावो दाव ॥
वसंत १७—बाबासो जोगी जाके सहज भाव । अकलि प्रीति की जिच्छा खाय ॥ टेक ॥ शब्द अनहद सौगी नाद । काम क्रोध विषीयान बाद ॥ मन सुद्रा जाके गुरुका ग्यान । त्रिकुटि कोट में धरै ध्यान ॥ मन करनीको करै अस्नान । गुरुको शब्द लै धरै ध्यान ॥ काया काशी खोजौ बास । ज्योति स्वरूप जहाँ भयो परकास ॥ ग्यान मेखला सहज भाव । वंक नालि कौ रसहि खाय ॥ जोग मूलका देत बंद । कहैं कवीर थिर होय कंद ॥ १७ ॥
वसंत १८—मगन रूप निरखत वसंत । विविधि प्रकास महिमा अनंत ॥ टेक ॥ सरवन सुनत सोहं ग्यान । रसना बरनत आपु ध्यान ॥ नेत्र छकै लखि आप रूप । वरनत अमि छवि अति अनूप ॥ भोग नासिका सुखद वास । हिरदय कमलकी लै सुवास ॥ तुचा मेल कियो नासा संग । संग समान कियो परसंग ॥ ध्यान लिये है प्रेम प्रीति । सेवा बंदन संत रीति ॥ विषय पंथ नहीं चाले पाय । सुखित धाम बसि कहूं न जाय ॥ दरशन दरसत आप ब्रह्म । जल घटमें जल मध्य विम्ब ॥ तेज जोतिमें जोति तेज । विलसत सुख यह अमर सेज ॥ कहै कवीर मन मगन ग्यान । सोधि शब्द लेहु तत छान ॥ प्रान पिंडमें पिंड प्रान । शब्द रीति ब्रह्मत सुजान ॥
वसंत १९—चेतन रूप निरखत वसंत । प्रेम अमीरस आदि अंत ॥ टेक ॥ मन अज्ञा बस प्रेम संग । बुधि अस्थिर गति एक
शब्दावली
(६५९)
अंग ॥ चित अमी रस पिये अघाय । अहं कृत तब चित मिटाय ॥ सुरति लिये सोहं जाप । कुमति काम तजि भय संताप ॥ जीव सीव है ब्रह्म आप । सहज मिटि तन मनकी ताप ॥ द्वैत मिटी निज पदको पाय । यह सतगुरु सतपद लखाय ॥ तन मन मन तन रह्यो छाया । ततलौ वित वित तत समाय ॥ तूं पद ततको छुटचो धंध । पाय धाम पद नित अनंद ॥ कहै कवीर आनंद कंद । स्थिर घर मिलि भान चंद ॥
वसंत २०—सदा वसंत मन राखो थिर । मेटि कल्पना धरो धीर ॥ टेक ॥ काया नगर बसि करि विलास । आपा चिन्हो तजि सकल आस ॥ झूठी आसा तनको नास । ताते जगत है काल त्रास ॥ कहा भवर होय फिरौ उदास । यहि संपुट देखो कमल वास ॥ चारि पहरको रंग रास । सुरझत कमल करि ले हुलास ॥ केतिक है तेरे जिवको त्रास । घोखे लेत कयों अनत बास ॥ तूही फूल तूही अगर बास । का द्वंद्वै बन बन होय उदास ॥ अजहूं चेत है तन में स्वास । सुरति सुमति गुन राखि पास ॥ सकल मही गुरु है निवास । अटल राज जुग जुग विलास ॥ हरष शोक नहीं भूख प्यास । रैन दिवस नहीं सदा उजास ॥ सही धाम निरमल शरीर । सदा अखंडित कहै कवीर ॥
वसंत २१—कहा अरुझि रहै मायाके जाल । निसि दिन जीवको संशय काल ॥ टेक ॥ अनंत भूप अलेख साध । सिद्धि न पाई गये अगाध ॥ भरम मिल्यो नहीं मिटी व्याधि । ब्रह्म ब्रह्म रटि ठान्यो वाद ॥ ब्रह्म कौन कहु मन है कौन । कौन शब्द कहु कौन पौन ॥ भिनि भिनि करि त्यागये भौन । भरम रच्यौ जिमि पानी लौन ॥ प्रगट सिद्धिपात लखै जो कोइ । सर्व यथा भरि पूरि सोइ ॥ बीज विरछ यक संग जोय । जस चंदा एक संग
( ६६० )
कवीरपंथी—
लोय ॥ ब्रह्म वदन धुनि तत रूप । सकल साज सरगुन सरूप ॥ उदित भान यक संग धूप । सरब मूल यक बीज रूप ॥ सोई दृष्टि है सोई नैन । सोई तेज तन मनमें सैन ॥ सोई पेड फल सोई कैन । सुख निधान आनंद चैन ॥ यही जम करताको साज । मरम मिलै तो सरे काज ॥ विना मरम गुरु देत राज । भेद न पायो भयो अकाज ॥ अगम ग्यान चित भरम जान । लख सरूप तजिदूरि ध्यान ॥ कहै कवीर गहो सत्त जान । अमीतत गुरु पान पान ॥
वसंत २२—देखो देखो रे या नरकी भूल । सींचत साखा तजत मूल ॥ टेक ॥ प्रगट ब्रह्म है घट समान । ताहि छांड़ि पूजे पखान ॥ जल पीवै पाषाण धोय । सो तो आदि अंत पाषाण होय ॥ स्वर्ग सीस पाताल पाय । सो कैसे सम्पुट समय ॥ अलख पुरुष आवे न जाय । सो कैसे दिये तुम्हारो खाय ॥ जुगन जुगन मैं कहो पुकारि । नर शब्द न चीन्हे करे रागि ॥ कहै कवीर नर कियो न खोज । भटकि मन्यो जैसे वनकी रोज ॥
वसंत २३—कोई संत विवेकी मनही जान । जामें अरुझि रहो सगरी जहान ॥ टेक ॥ मन पंछी होय उड़ै अकास । मनही जल थल सकल बास ॥ मनही चहुँ दिशि रहो छाय । कोइ न चिन्हे मन सबको खाय ॥ मनही पाप अरु मनही पूजा । मनही रूप धन्यो यह इजा ॥ मन मध्य मन आदि अंत । मनही लीला रची अनंत ॥ मनके बस सुर सकल देव । मनहीकी सब करै सेव ॥ मनही धाम जो रच्यो बनाय । मन जनम्यो नौ बेर आय ॥ ब्रह्म फूटि मन भयो अंस । तीन लोक मन कियो विध्वंस ॥ कहै कवीर जो मनही जान । सत शब्द गहि ले पहिचान ॥
वसंत २४—खेलत वसंत तन मन विरह रंग । भव सागर नाना तरंग ॥ टेक ॥ कोई जोग करे कोइ जज्ञ दान । कोई नेम धर्म
शब्दावली
(६६१)
पूजे पषान ॥ कोई गिरही कोई फिरै उदास । कोइ नग्र त्वचा गुफामें वास ॥ कोई डंड कमंडल धूमपान । कोई उरध तपस्या गोड तान ॥ कोई दूधारी पवन आस । कोई अग्नि जराचे चहुँ पास ॥ कोई छत्र धारी धज निशान । कोइ सुरासन मुख खेत ठान ॥ कोई पीर औलिया करै मिजाद । कोई षट् दरसनमें करै बाद ॥ कोइ उदय अस्त दहना वल देय । कोई चारि मास जल सैन लेय ॥ कोई बहुत भेष धरि करै स्वांग । कोई साधे धतूरा पोस्त भांग ॥ कोई उरध कपाली आसन राधि । कोई निशि वासरकी निद्रा साधि ॥ कोई रिद्धि सिद्धि करामाति जान । कोई जोगी सुद्रा पहिरै कान ॥ कोई अलह कहै कोई कहे राम । हिन्दू तुर्क दोय धर नाम ॥ सकल ब्रह्म समान एक । कहैं कवीर लीला अनेक ॥
वसंत २५-ऐसे सबै मद माते कोई न जाग । संगहि चार घर मूसन लाग ॥ टेक ॥ जोगी माते जोग ध्यान । पंडित माते पंडि पुरान ॥ तपसी माते तपके भेव । संन्यासी माते अह भेव ॥ माते ऊधो औ अकरूर । हनुमत माते लिये लंगूर ॥ शिव माते हरि चरन सवे । कलि माते नामा जय देव ॥ जैनी माते करम बाद । जंगम माते घंट नाद ॥ सुल्या माते देदे बांग । राम विमुख सब भूले सांग ॥ राजा माते भरि भंडार । रानी माती करि सिंगार ॥ दानी माते दे दे दान । प्रजा माती विषया पान ॥ ब्रह्म रटत है चारों वेद । रावन गइयो घरके भेद ॥ या मनुवाको अध्यक्षम काम । ताते कहै कवीर भजु सत्त नाम ॥
वसंत २६-नारि नाहि संतो हरि तुम्हार । बिना मूल जैहो जनम हार ॥ टेक ॥ हरिश्र्वंद समान नहि दानी आन । निज रानी सहित पुत्र विकान ॥ विन विचार चित लियो है मानि । हरिचंद भरो डोम घर पानि ॥ पांडव कहिये सब सौ जोर । तिनका पाँव