भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कबीरपंथी-

वसंत १३-खेलत वसंत मन महा मोह । विषय फाँस तन देह छोह ॥ टेक ॥ आलस महलमें करै केल । आशा तृष्णा संग मेल ॥ अहंकार मद मंत्री संग । कुबुधि सखी सुं करै रंग ॥ लिये हाथ डफ डिम्भ करै । ब्रह्मादिक जिन लिये घेरि ॥ करै उलाहल काम वीर । महादेव कौ मारचो तीर ॥ इन्द्रासन लुटचो बनाय । सुर नर मुनि सब लिये खाय ॥ नर नारी नहीं देवैं चैन । निसि दिन बोलै विषय बैन ॥ सब बन फूले विषय वसंत । ताहि जरावै विवेकी संत ॥ उग्र ज्ञान मिलि मता कीन । सुरति सखी तिहि साथ दीन ॥ ब्रह्म अग्नि औटावे रंग । विषय बान सब कीये भंग ॥ सत् शील संतोष चैन । सत् शब्द मुख बोलै बैन ॥ सत् संतोष सुखमें समाय । गुरु मुख खेलै वसंत गाय ॥ कहैं कबीर मिटचो गरभ जंत । सुख सागर सुख निधि वसंत ॥

वसंत १४-मोह निरपति खेलै वसंत । सुर नर मुनि कोइ लहै न अंत ॥ टेक ॥ काम प्रधान तिहि राव साथ । सकल सभा मिली रच्यो राथ ॥ पांच बान पिचकारी लीन । पांचू पांच मिलि खेल कीन ॥ संकट करि करि मोरचो उजासु । होय अकरण न रहचो उदासु ॥ मोहनी होय सब हरचो ज्ञान । मारचो शिवको पुहुप बान ॥ कुमति सखी तहां खेलै खेल । चौरासी सब दीये ठेल ॥ सुभ असुभ तहां गावे गीत । लालच लोभमें सबै भात ॥ जोगी वनमें करै जोग । मारे बान तहां जाय लोभ ॥ जोग जुगति कछु रहै न थीर । पुहुप बान लग्यो शरीर ॥ रावन मारचो महा मोह । भक्त जना सों कियो द्रोह ॥ माया मोह लाग्यो राय । सबकूं मोह नरेस खाय ॥ अभिमान बान डुरजोधन लीन । वचन हेत नहीं भयो अधीन ॥ ताको लालच लाग्यो बान । मोह नृपतिने मारचो तानि ॥ एक ओर भयो मोह राव । इत विवेकने लायो दाव ॥