कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
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सुरति निरति पिचकारी प्रेम । शील संतोष अति बचन हेम ॥ खेलन लागे मगन होय । तहां मोह पुनि चलयो रोय ॥ छिकत छिमां छबीले रंग । सुमति सखि तहां लीये संग ॥ काम क्रोध तहां परे छीन । महा मोह तहां भय हीन ॥ खेलै विवेक संतोष संत । कहै कवीर सुख निधि वसंत ॥
वसंत १५-चल भौरा जहां नित वसंत । अवसर गये न फिर मिलंत ॥ टेक ॥ सुख सागर जहां सुख निधान । तहां ग्रीषम नहीं करत हान ॥ जहां कुमुद फूले अनंत हो । तहां भँवरा खेलत वसंत ॥ कुंज सवन तहां कुहके मोर । प्रेम बुंद सागर हिलोर ॥ स्वतः प्रकास सो बन फूलंत । सुख निधान तहां करू बसंत ॥ यहि बन विषय विकार भोग । जहां व्यापै संसै महा सोग ॥ चलो वहाँ यहां तजो संत । जहां जोग जीत खेलै बसंत ॥ तहां यह पुहप अगर महाँके सुवास । सेत गुलाल अरू सेत भास ॥ सत पुरुष जहां मिलै कंत । कहै कवीर तहां करो बसंत ॥
वसंत १६-काम कला खेलै वसंत । गिने न काहू अति मैमंत ॥ टेक ॥ नैन सैन पिचकारी लीन । ले इन्द्रिनके हाथ दीन ॥ सकल संग ये मारे खाय । सुर नर सुनि सब दिये ढाय ॥ देख रूप मन करै भंग । कुबुधि सखी लिय धावै संग ॥ बदन देखि मति भये हीन । करै क्रोध सब देह छीन ॥ गुन अवगुन कछु गिने नाहिं । सबही को करै एक राहि ॥ अन्त न जानै कहा होय । जम द्वारे ले करै विगोय ॥ मोह रूपकी कला बनाय । जहैं तहैं फंदा रह्यो फंदाय ॥ मैं तू खेलको करत रारि । बाँह पकड़ि डारे पछारि ॥ तीन लोकमें डारे रोर । व्यापित करै अधियारै घोर ॥ गति मति सबहि गई हिराय । मदन बान तन रह्यो समाय ॥ अरे नर मूरख अबकी चेत । अब जानौ कछु याको हेत ॥ विष