भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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कवीरपंथी—

अमृत निरवारो भेद । छोड़ो बाद विवाद खेद ॥ जो विष खाये सो परलय होय । विन अमृत नहीं बाँचे कोय ॥ था औसर तू मुट मान । सत शब्दको गहो प्रमान ॥ मिलि सतगुरु सो खेलो खेल । जरा मरनकी मिटे जेल ॥ कहैं कवीर गहो सत भाव । बहुरि न ऐसो पावो दाव ॥

वसंत १७—बाबासो जोगी जाके सहज भाव । अकलि प्रीति की जिच्छा खाय ॥ टेक ॥ शब्द अनहद सौगी नाद । काम क्रोध विषीयान बाद ॥ मन सुद्रा जाके गुरुका ग्यान । त्रिकुटि कोट में धरै ध्यान ॥ मन करनीको करै अस्नान । गुरुको शब्द लै धरै ध्यान ॥ काया काशी खोजौ बास । ज्योति स्वरूप जहाँ भयो परकास ॥ ग्यान मेखला सहज भाव । वंक नालि कौ रसहि खाय ॥ जोग मूलका देत बंद । कहैं कवीर थिर होय कंद ॥ १७ ॥

वसंत १८—मगन रूप निरखत वसंत । विविधि प्रकास महिमा अनंत ॥ टेक ॥ सरवन सुनत सोहं ग्यान । रसना बरनत आपु ध्यान ॥ नेत्र छकै लखि आप रूप । वरनत अमि छवि अति अनूप ॥ भोग नासिका सुखद वास । हिरदय कमलकी लै सुवास ॥ तुचा मेल कियो नासा संग । संग समान कियो परसंग ॥ ध्यान लिये है प्रेम प्रीति । सेवा बंदन संत रीति ॥ विषय पंथ नहीं चाले पाय । सुखित धाम बसि कहूं न जाय ॥ दरशन दरसत आप ब्रह्म । जल घटमें जल मध्य विम्ब ॥ तेज जोतिमें जोति तेज । विलसत सुख यह अमर सेज ॥ कहै कवीर मन मगन ग्यान । सोधि शब्द लेहु तत छान ॥ प्रान पिंडमें पिंड प्रान । शब्द रीति ब्रह्मत सुजान ॥

वसंत १९—चेतन रूप निरखत वसंत । प्रेम अमीरस आदि अंत ॥ टेक ॥ मन अज्ञा बस प्रेम संग । बुधि अस्थिर गति एक