भारतकोश
कबीरपंथी शब्दावली

कबीरपंथी शब्दावली

Kabirpanthi Shabdavali

स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा

स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)

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शब्दावली

(६५९)

अंग ॥ चित अमी रस पिये अघाय । अहं कृत तब चित मिटाय ॥ सुरति लिये सोहं जाप । कुमति काम तजि भय संताप ॥ जीव सीव है ब्रह्म आप । सहज मिटि तन मनकी ताप ॥ द्वैत मिटी निज पदको पाय । यह सतगुरु सतपद लखाय ॥ तन मन मन तन रह्यो छाया । ततलौ वित वित तत समाय ॥ तूं पद ततको छुटचो धंध । पाय धाम पद नित अनंद ॥ कहै कवीर आनंद कंद । स्थिर घर मिलि भान चंद ॥

वसंत २०—सदा वसंत मन राखो थिर । मेटि कल्पना धरो धीर ॥ टेक ॥ काया नगर बसि करि विलास । आपा चिन्हो तजि सकल आस ॥ झूठी आसा तनको नास । ताते जगत है काल त्रास ॥ कहा भवर होय फिरौ उदास । यहि संपुट देखो कमल वास ॥ चारि पहरको रंग रास । सुरझत कमल करि ले हुलास ॥ केतिक है तेरे जिवको त्रास । घोखे लेत कयों अनत बास ॥ तूही फूल तूही अगर बास । का द्वंद्वै बन बन होय उदास ॥ अजहूं चेत है तन में स्वास । सुरति सुमति गुन राखि पास ॥ सकल मही गुरु है निवास । अटल राज जुग जुग विलास ॥ हरष शोक नहीं भूख प्यास । रैन दिवस नहीं सदा उजास ॥ सही धाम निरमल शरीर । सदा अखंडित कहै कवीर ॥

वसंत २१—कहा अरुझि रहै मायाके जाल । निसि दिन जीवको संशय काल ॥ टेक ॥ अनंत भूप अलेख साध । सिद्धि न पाई गये अगाध ॥ भरम मिल्यो नहीं मिटी व्याधि । ब्रह्म ब्रह्म रटि ठान्यो वाद ॥ ब्रह्म कौन कहु मन है कौन । कौन शब्द कहु कौन पौन ॥ भिनि भिनि करि त्यागये भौन । भरम रच्यौ जिमि पानी लौन ॥ प्रगट सिद्धिपात लखै जो कोइ । सर्व यथा भरि पूरि सोइ ॥ बीज विरछ यक संग जोय । जस चंदा एक संग