कबीरपंथी शब्दावली
Kabirpanthi Shabdavali
स्वामी श्री युगलानन्द विहारी द्वारा
स्रोत: Kabirpanthi Shabdavali - Yugalanand Vihari · श्री युगलानन्द विहारी (उद्गम)
पृष्ठ 674, कुल 968 में से
संदर्भ में पढ़ें( ६६० )
कवीरपंथी—
लोय ॥ ब्रह्म वदन धुनि तत रूप । सकल साज सरगुन सरूप ॥ उदित भान यक संग धूप । सरब मूल यक बीज रूप ॥ सोई दृष्टि है सोई नैन । सोई तेज तन मनमें सैन ॥ सोई पेड फल सोई कैन । सुख निधान आनंद चैन ॥ यही जम करताको साज । मरम मिलै तो सरे काज ॥ विना मरम गुरु देत राज । भेद न पायो भयो अकाज ॥ अगम ग्यान चित भरम जान । लख सरूप तजिदूरि ध्यान ॥ कहै कवीर गहो सत्त जान । अमीतत गुरु पान पान ॥
वसंत २२—देखो देखो रे या नरकी भूल । सींचत साखा तजत मूल ॥ टेक ॥ प्रगट ब्रह्म है घट समान । ताहि छांड़ि पूजे पखान ॥ जल पीवै पाषाण धोय । सो तो आदि अंत पाषाण होय ॥ स्वर्ग सीस पाताल पाय । सो कैसे सम्पुट समय ॥ अलख पुरुष आवे न जाय । सो कैसे दिये तुम्हारो खाय ॥ जुगन जुगन मैं कहो पुकारि । नर शब्द न चीन्हे करे रागि ॥ कहै कवीर नर कियो न खोज । भटकि मन्यो जैसे वनकी रोज ॥
वसंत २३—कोई संत विवेकी मनही जान । जामें अरुझि रहो सगरी जहान ॥ टेक ॥ मन पंछी होय उड़ै अकास । मनही जल थल सकल बास ॥ मनही चहुँ दिशि रहो छाय । कोइ न चिन्हे मन सबको खाय ॥ मनही पाप अरु मनही पूजा । मनही रूप धन्यो यह इजा ॥ मन मध्य मन आदि अंत । मनही लीला रची अनंत ॥ मनके बस सुर सकल देव । मनहीकी सब करै सेव ॥ मनही धाम जो रच्यो बनाय । मन जनम्यो नौ बेर आय ॥ ब्रह्म फूटि मन भयो अंस । तीन लोक मन कियो विध्वंस ॥ कहै कवीर जो मनही जान । सत शब्द गहि ले पहिचान ॥
वसंत २४—खेलत वसंत तन मन विरह रंग । भव सागर नाना तरंग ॥ टेक ॥ कोई जोग करे कोइ जज्ञ दान । कोई नेम धर्म